भारत में फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। इस कानून को लेकर समय-समय पर यह बहस होती रही है कि विदेशी फंडिंग की निगरानी और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) व अन्य सिविल सोसाइटी संगठनों की स्वायत्तता के बीच किस तरह संतुलन बनाया जाए।
नई दिल्ली: भारत में विदेशी चंदे (Foreign Contribution) को नियंत्रित करने वाले कानून फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) में प्रस्तावित संशोधन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। FCRA Amendment Bill 2026 में विदेशी योगदान और उससे जुड़ी संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नया कानूनी ढांचा प्रस्तावित किया गया है। इस प्रस्ताव के तहत यदि किसी संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, वह खुद इसे सरेंडर करता है या उसका पंजीकरण समाप्त हो जाता है, तो विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन की जिम्मेदारी एक विशेष प्राधिकरण को दी जा सकती है।
सरकार का कहना है कि यह बदलाव विदेशी फंडिंग व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए जरूरी है। वहीं, विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का आरोप है कि यह कानून सरकार को गैर-सरकारी संगठनों (NGO) और चैरिटेबल संस्थानों की संपत्तियों पर ज्यादा अधिकार दे सकता है।
FCRA क्या है और क्यों है यह कानून महत्वपूर्ण?
Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) भारत में विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन, सिक्योरिटीज और अन्य योगदान को नियंत्रित करता है। यह कानून तय करता है कि कौन व्यक्ति, संस्था, ट्रस्ट, NGO या संगठन विदेशों से धन प्राप्त कर सकता है और उसका इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा। FCRA विदेशी चंदे पर पूरी तरह रोक नहीं लगाता है। इसका उद्देश्य विदेशी धन के प्रवाह को नियंत्रित करना और यह सुनिश्चित करना है कि उसका उपयोग पारदर्शी और कानूनी तरीके से हो।
विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों को गृह मंत्रालय से FCRA पंजीकरण लेना होता है। इसके अलावा उन्हें खातों का रिकॉर्ड रखना, ऑडिट कराना और हर साल सरकार को वित्तीय रिपोर्ट जमा करनी होती है। कानून के तहत राजनीतिक दलों, चुनावी उम्मीदवारों, सरकारी कर्मचारियों, जजों और कुछ अन्य श्रेणियों के लोगों को विदेशी योगदान लेने से प्रतिबंधित किया गया है।
FCRA Bill 2026 में क्या नया प्रस्ताव है?
FCRA Amendment Bill 2026 का सबसे बड़ा बदलाव उन संगठनों से जुड़ा है जिनका FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाता है। किसी संगठन का FCRA सर्टिफिकेट कई कारणों से खत्म हो सकता है:
- सरकार द्वारा नियमों के उल्लंघन पर रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाना।
- संगठन द्वारा खुद पंजीकरण सरेंडर करना।
- समय पर नवीनीकरण (Renewal) नहीं कराना।
- नवीनीकरण आवेदन अस्वीकार होना।
नए बिल में FCRA सर्टिफिकेट के समाप्त होने की स्थिति को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि अगर कोई संगठन समय पर अपना लाइसेंस रिन्यू नहीं कराता या उसका आवेदन खारिज हो जाता है, तो विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियों के भविष्य को लेकर नई व्यवस्था लागू हो सकती है।
विदेशी फंड से बनी संपत्तियों का क्या होगा?
प्रस्तावित कानून के अनुसार, एक विशेष अथॉरिटी बनाई जा सकती है जो ऐसे मामलों में विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्तियों की निगरानी करेगी।
शुरुआत में संपत्तियों का नियंत्रण अस्थायी रूप से इस अथॉरिटी के पास जाएगा। यदि संगठन बाद में अपना FCRA पंजीकरण बहाल कराने में सफल होता है, तो इस्तेमाल नहीं किया गया विदेशी योगदान और संबंधित संपत्तियां वापस की जा सकती हैं।
लेकिन यदि संगठन तय समय सीमा के भीतर अपना पंजीकरण वापस हासिल नहीं कर पाता, तो संपत्तियों का हस्तांतरण स्थायी हो सकता है। ऐसी स्थिति में अथॉरिटी को इन संपत्तियों के प्रबंधन, सरकारी विभागों को हस्तांतरण या बिक्री का अधिकार दिया जा सकता है। संपत्ति बेचने से मिली राशि और बचा हुआ विदेशी योगदान भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा किया जा सकता है।
सरकार का तर्क क्या है?
केंद्र सरकार का कहना है कि नए संशोधन का उद्देश्य किसी संगठन को निशाना बनाना नहीं, बल्कि कानूनी अस्पष्टता को दूर करना है। सरकार के अनुसार, मौजूदा कानून में यह स्पष्ट प्रक्रिया नहीं थी कि किसी संगठन का FCRA पंजीकरण समाप्त होने के बाद विदेशी धन और उससे बनी संपत्तियों का प्रबंधन कैसे किया जाए।
गृह मंत्रालय का तर्क है कि नया ढांचा यह सुनिश्चित करेगा कि विदेशी फंड का इस्तेमाल केवल वैध और सार्वजनिक हित से जुड़े कार्यों में हो। सरकार ने यह भी कहा है कि दुनिया के कई देशों में विदेशी प्रभाव और विदेशी फंडिंग की निगरानी के लिए नियम मौजूद हैं। हालांकि, अलग-अलग देशों में इन नियमों का स्वरूप और दायरा अलग है।

विपक्ष और आलोचकों की आपत्तियां
विपक्ष का कहना है कि प्रस्तावित बदलाव सरकार को जरूरत से ज्यादा अधिकार दे सकते हैं। आलोचकों के अनुसार, कई NGO और सामाजिक संस्थाओं ने दशकों पहले विदेशी सहायता से स्कूल, अस्पताल, अनाथालय, लाइब्रेरी और अन्य सार्वजनिक संस्थान बनाए हैं। यदि किसी कारण से उनका FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाता है, तो इन संपत्तियों पर उनका नियंत्रण खत्म हो सकता है।
विरोध करने वाले संगठनों का तर्क है कि किसी संस्था द्वारा बनाई गई संपत्ति केवल इसलिए सरकारी नियंत्रण में नहीं जानी चाहिए क्योंकि उसका विदेशी फंडिंग लाइसेंस समाप्त हो गया।
FCRA कानून कैसे हुआ सख्त?
भारत में FCRA कानून की शुरुआत वर्ष 1976 में हुई थी। उस समय मुख्य चिंता देश की राजनीति और संस्थानों पर विदेशी प्रभाव को लेकर थी। वर्ष 2010 में FCRA में बड़ा बदलाव किया गया और नया कानून लागू हुआ। इसमें संगठनों के लिए पांच साल की अवधि वाला पंजीकरण सिस्टम शुरू किया गया, जिसके बाद उन्हें लाइसेंस का नवीनीकरण कराना होता था।
वर्ष 2020 में कानून को और सख्त बनाया गया। इसके तहत विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए नई दिल्ली स्थित भारतीय स्टेट बैंक की एक विशेष शाखा में खाता खोलना अनिवार्य किया गया। प्रशासनिक खर्च की सीमा भी 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दी गई और विदेशी फंड को दूसरे NGO को ट्रांसफर करने पर रोक लगा दी गई।
ईसाई संगठनों में क्यों बढ़ी चिंता?
हालांकि प्रस्तावित कानून सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होगा, लेकिन इसका विरोध कुछ चर्च समूहों और ईसाई संस्थानों ने अधिक किया है। कई ईसाई चैरिटेबल संस्थान विदेशी सहायता से स्कूल, अस्पताल, अनाथालय और सामाजिक कल्याण परियोजनाएं संचालित करते हैं। इन संगठनों को आशंका है कि यदि उनका FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाता है, तो विदेशी योगदान से बनाई गई संपत्तियां उनके नियंत्रण से बाहर जा सकती हैं। पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्यों, खासकर मिजोरम में, इस मुद्दे को लेकर चिंता अधिक व्यक्त की गई है।
आगे क्या होगा?
FCRA Bill 2026 विदेशी फंडिंग व्यवस्था को केवल रिपोर्टिंग और निगरानी तक सीमित नहीं रखता, बल्कि पंजीकरण समाप्त होने के बाद संपत्तियों के भविष्य को भी प्रभावित करता है। सरकार इसे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाला कदम बता रही है, जबकि आलोचक इसे NGO और सामाजिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर मुद्दा मान रहे हैं।











