भारत में पैकेटबंद खाने पर चेतावनी लेबल की जंग, FSSAI के प्रस्ताव से पीछे हटने पर उठे सवाल

भारत में पैकेटबंद खाने पर चेतावनी लेबल को लेकर विवाद बढ़ रहा है। FSSAI के प्रस्ताव से पीछे हटने के फैसले पर सवाल उठ रहे हैं और हेल्थ लेबलिंग पर बहस तेज है।

भारत और ब्रिटेन में बिकने वाले फैंटा के एक ही फ्लेवर वाले उत्पाद की सामग्री और पोषण संरचना में अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्रिटेन में बिकने वाले फैंटा के एक कैन में करीब 63 कैलोरी होती हैं, जबकि भारत में उपलब्ध संस्करण में चीनी की मात्रा काफी अधिक बताई जाती है।

Food Warning Labels in India: भारत में पैकेटबंद खाद्य और पेय पदार्थों पर चीनी, नमक और वसा की अधिक मात्रा को लेकर चेतावनी लेबल लगाने की बहस तेज हो गई है। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ जहां ऐसे लेबल को उपभोक्ताओं को बेहतर विकल्प चुनने में मददगार मानते हैं, वहीं खाद्य उद्योग से जुड़ी कंपनियां प्रस्तावित रंगीन चेतावनी व्यवस्था की प्रभावशीलता और व्यावहारिकता पर सवाल उठा रही हैं।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का पैकेटबंद खाद्य और पेय बाजार तेजी से बढ़ रहा है। इसी के साथ मोटापा, अधिक वजन और जीवनशैली से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर चिंता भी बढ़ रही है।

पैकेट पर चेतावनी लेबल को लेकर क्या है विवाद?

भारत में खाद्य सुरक्षा नियामक FSSAI ने पैकेट के सामने चीनी, नमक और वसा की मात्रा को अधिक स्पष्ट तरीके से दिखाने की व्यवस्था पर विचार किया था। प्रस्ताव में रंगों के माध्यम से उपभोक्ताओं को यह संकेत देने की बात थी कि किसी उत्पाद में पोषक तत्वों की मात्रा कितनी अधिक है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का तर्क है कि पैकेट के पीछे लिखी लंबी पोषण तालिका पढ़ना हर उपभोक्ता के लिए आसान नहीं होता। इसके मुकाबले सामने लगा स्पष्ट चेतावनी चिह्न ग्राहक को खरीदारी के समय तुरंत जानकारी दे सकता है।

इसी तरह की व्यवस्था दुनिया के कई देशों में लागू है। कुछ देशों में अधिक चीनी, नमक या संतृप्त वसा वाले उत्पादों के सामने स्पष्ट प्रतीक या रंगीन चेतावनी दिखाई जाती है।

FSSAI के रुख पर उठे सवाल

रिपोर्ट के मुताबिक, FSSAI ने सामने रंगीन चेतावनी लेबल के प्रस्ताव से पीछे हटते हुए पैकेट पर काले-सफेद प्रारूप में चीनी, नमक और वसा की मात्रा दिखाने वाली जानकारी देने का विकल्प आगे बढ़ाया। नियामक और उद्योग से जुड़े लोगों की ओर से यह तर्क दिया गया कि केवल चेतावनी प्रतीक उपभोक्ताओं के व्यवहार में जरूरी बदलाव नहीं ला सकते। हालांकि, सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि स्पष्ट फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग उपभोक्ताओं को कम समय में उत्पाद की पोषण संबंधी स्थिति समझने में मदद कर सकती है।

मामला अब न्यायिक जांच के दायरे में भी आ चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने खाद्य उत्पादों पर चेतावनी लेबल की व्यवस्था पर विचार करने और अंतरराष्ट्रीय मॉडलों का अध्ययन करने की दिशा में नियामक का ध्यान खींचा है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका पर भी सवाल

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू बहुराष्ट्रीय खाद्य कंपनियों की अलग-अलग देशों में अपनाई जाने वाली नीतियां हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कई कंपनियां यूरोप और अन्य विकसित बाजारों में अधिक सख्त लेबलिंग नियमों का पालन करती हैं, जबकि भारत में ऐसी व्यवस्था का विरोध करती हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, कोका-कोला और नेस्ले जैसी कंपनियां भारत में प्रस्तावित चेतावनी लेबल व्यवस्था को लेकर उद्योग की चर्चाओं में शामिल रही हैं। कंपनियों का तर्क है कि केवल रंगीन प्रतीक उपभोक्ता के व्यवहार में बदलाव की गारंटी नहीं देते और पोषण संबंधी जानकारी पहले से पैकेट पर उपलब्ध होती है।हालांकि, आलोचकों का कहना है कि उपभोक्ताओं को जानकारी देना और उसे आसानी से समझने योग्य बनाना दो अलग बातें हैं। उनका मानना है कि पैकेट के सामने स्पष्ट संकेत होने से खरीदारी के समय निर्णय लेना आसान हो सकता है।

क्या भारत में बिकते हैं अलग फॉर्मूले वाले उत्पाद?

भारत और दूसरे देशों में एक ही ब्रांड के उत्पादों की सामग्री अलग होने का मुद्दा भी इस बहस में सामने आया है। कुछ रिपोर्टों में अलग-अलग बाजारों में चॉकलेट, इंस्टेंट नूडल्स और पेय पदार्थों की सामग्री में अंतर का उल्लेख किया गया है। आलोचक इसे 'डबल स्टैंडर्ड' के रूप में देखते हैं और सवाल करते हैं कि क्या भारतीय उपभोक्ताओं को वही पोषण और गुणवत्ता मानक मिल रहे हैं जो यूरोप या अन्य विकसित बाजारों में लागू हैं।

कंपनियों की ओर से आम तौर पर कहा जाता है कि अलग-अलग देशों में उत्पाद स्थानीय नियमों, उपभोक्ता पसंद, उपलब्ध कच्चे माल और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार तैयार किए जाते हैं।

भारत में बढ़ रही है हेल्थ अवेयरनेस

भारत में स्वास्थ्य को लेकर उपभोक्ताओं की जागरूकता भी तेजी से बढ़ रही है। सोशल मीडिया पर पोषण, चीनी और जंक फूड को लेकर चर्चा बढ़ी है। लोग अब पैकेट पर मौजूद सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी को पहले की तुलना में अधिक ध्यान से देखने लगे हैं। ऐसे में फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल की मांग को सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी बहस से जोड़कर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि लेबलिंग के साथ-साथ स्कूलों, परिवारों और स्वास्थ्य व्यवस्था के स्तर पर पोषण शिक्षा भी जरूरी है।

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