फ्रांस के एवियां शहर में G7 समिट शुरू हो गई है। अमेरिका, इटली, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के नेता पहुंच चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी आज शामिल होंगे। सम्मेलन में ईरान, यूक्रेन, वैश्विक अर्थव्यवस्था और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रमुख मुद्दे हैं।
पेरिस: दुनिया की प्रमुख औद्योगिक और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के संगठन G7 का 52वां शिखर सम्मेलन फ्रांस के एवियन शहर में शुरू हो गया है। 16 से 17 जून तक चलने वाली इस बैठक में वैश्विक राजनीति, आर्थिक सहयोग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है।
समिट में हिस्सा लेने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन फ्रांस पहुंच चुके हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी विशेष आमंत्रित नेता के रूप में सम्मेलन में शामिल होने के लिए पहुंच रहे हैं।
ट्रम्प और मैक्रों की द्विपक्षीय बैठक
फ्रांस पहुंचने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ द्विपक्षीय बैठक की। दोनों नेताओं के बीच वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और हाल ही में हुए अमेरिका-ईरान समझौते पर चर्चा हुई।
मैक्रों ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते का स्वागत करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि इस समझौते से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर निगरानी बढ़ेगी और क्षेत्रीय तनाव कम करने में मदद मिल सकती है।
ईरान, यूक्रेन और मध्य पूर्व रहेंगे प्रमुख मुद्दे
इस वर्ष की G7 बैठक ऐसे समय हो रही है जब दुनिया कई बड़े भू-राजनीतिक संकटों का सामना कर रही है। यूक्रेन में जारी युद्ध, ईरान और इजराइल के बीच तनाव, गाजा की स्थिति, लेबनान में सुरक्षा चुनौतियां और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रम वैश्विक चिंता के विषय बने हुए हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि G7 देशों के नेता इन मुद्दों पर साझा रणनीति तैयार करने और कूटनीतिक प्रयासों को मजबूत करने पर चर्चा करेंगे। इसके अलावा ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन की चुनौतियां भी एजेंडे में शामिल हैं।
G7 क्या है और इसकी शुरुआत कैसे हुई?
G7 यानी "ग्रुप ऑफ सेवन" दुनिया की सात प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। इसमें अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा शामिल हैं। इन देशों को वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला माना जाता है।
इस समूह की शुरुआत 1975 में G6 के रूप में हुई थी, जिसमें अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और जापान शामिल थे। 1976 में कनाडा के जुड़ने के बाद यह G7 बन गया। 1998 में रूस को शामिल कर इसका नाम G8 कर दिया गया था, लेकिन 2014 में यूक्रेन के क्रीमिया क्षेत्र पर रूस के नियंत्रण के बाद उसे समूह से बाहर कर दिया गया। इसके बाद संगठन फिर से G7 के रूप में कार्य करने लगा।
भारत की बढ़ती भूमिका और PM मोदी की भागीदारी
हालांकि भारत G7 का सदस्य नहीं है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसकी बढ़ती भूमिका के कारण उसे लगातार विशेष आमंत्रित देश के रूप में बुलाया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस वर्ष लगातार सातवीं बार G7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। इससे पहले भी भारत को कई बार इस मंच पर आमंत्रित किया गया है, जहां उसने विकासशील देशों, वैश्विक दक्षिण (Global South), जलवायु परिवर्तन और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर अपनी बात रखी है।
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पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी 2005 से 2013 के बीच कई बार G7 और G8 बैठकों में शामिल हो चुके हैं। हाल के वर्षों में भारत की मौजूदगी ने इस मंच को अधिक व्यापक और प्रतिनिधिक बनाने में योगदान दिया है।
इस बार के एजेंडे में AI और वैश्विक अर्थव्यवस्था भी शामिल
G7 समिट का एजेंडा केवल राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों तक सीमित नहीं है। इस वर्ष कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के नियमन और उसके सुरक्षित उपयोग पर भी व्यापक चर्चा होने की संभावना है। AI तकनीक के तेजी से विस्तार ने डेटा सुरक्षा, रोजगार, साइबर सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जुड़े कई नए प्रश्न खड़े किए हैं। G7 देश इन चुनौतियों से निपटने के लिए साझा नीतिगत ढांचा तैयार करने पर विचार कर सकते हैं।
इसके अलावा वैश्विक आर्थिक असंतुलन, मुद्रास्फीति, व्यापारिक बाधाएं और विकासशील देशों की वित्तीय चुनौतियां भी चर्चा के केंद्र में रहेंगी।
वैश्विक फैसलों पर G7 का प्रभाव
हालांकि G7 कोई औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संस्था नहीं है और इसके पास कानूनी रूप से बाध्यकारी निर्णय लागू करने की शक्ति नहीं है, फिर भी इसके फैसलों का वैश्विक स्तर पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। पिछले दशकों में G7 ने कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय पहलों को समर्थन दिया है। स्वास्थ्य संकटों से निपटने के लिए वैश्विक फंडिंग, वित्तीय संकटों के दौरान आर्थिक सहायता और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद प्रतिबंधों से जुड़े फैसलों में G7 देशों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही कारण है कि दुनिया भर के नीति निर्माता और निवेशक इस मंच की बैठकों पर करीबी नजर रखते हैं।
G7 और G20 में क्या अंतर है?
G7 और G20 दोनों वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करने वाले मंच हैं, लेकिन इनके दायरे और सदस्यता में महत्वपूर्ण अंतर है। G7 केवल सात विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समूह है, जबकि G20 में विकसित और विकासशील दोनों प्रकार की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। G20 में भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और अन्य प्रमुख देश भी सदस्य हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में G20 वैश्विक अर्थव्यवस्था का अधिक व्यापक प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि इसमें दुनिया की अधिकांश आबादी और आर्थिक गतिविधियां शामिल हैं। वहीं G7 को विकसित देशों के नीति समन्वय मंच के रूप में देखा जाता है।
दुनिया की निगाहें G7 शिखर सम्मेलन पर
फ्रांस में आयोजित यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया कई मोर्चों पर अनिश्चितता का सामना कर रही है। युद्ध, आर्थिक चुनौतियां, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी बदलाव और जलवायु संकट जैसे मुद्दे वैश्विक नेतृत्व से सामूहिक समाधान की मांग कर रहे हैं।
ऐसे में G7 नेताओं की चर्चाओं और घोषणाओं पर दुनिया भर की नजरें टिकी हुई हैं। सम्मेलन से निकलने वाले संदेश आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक संबंधों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।








