गयाजी में ‘भूतों का पहाड़ पिंडदान से मिलता है मोक्ष ब्रह्मकुंड के पास है भगवान राम से जुड़ा रामकुंड

गयाजी की प्रेतशिला को ‘भूतों का पहाड़’ कहा जाता है। ब्रह्मकुंड और रामकुंड से जुड़ी मान्यताओं के बीच विष्णुपद मंदिर पिंडदान का प्रमुख केंद्र है।
गयाजी में ‘भूतों का पहाड़ पिंडदान से मिलता है मोक्ष ब्रह्मकुंड के पास है भगवान राम से जुड़ा रामकुंड
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गयाजी यानी गया धाम को पितरों के श्राद्ध और पिंडदान के लिए देश के सबसे प्रमुख तीर्थस्थलों में गिना जाता है। पितृपक्ष के दौरान यहां का धार्मिक वातावरण और भी विशेष हो जाता है। फल्गु नदी के तट से लेकर विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट, रामशिला और प्रेतशिला तक श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई देती है। मान्यता है कि गयाजी की पवित्र भूमि पर विधि-विधान से पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी आस्था के कारण हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध कर्म करने गयाजी पहुंचते हैं।

गयाजी की धार्मिक पहचान केवल विष्णुपद मंदिर तक सीमित नहीं है। यहां कई ऐसी पिंडवेदियां, पहाड़ियां, कुंड और धार्मिक स्थल हैं, जिनका संबंध अलग-अलग पौराणिक मान्यताओं से जोड़ा जाता है। इन्हीं में प्रेतशिला पहाड़ी भी शामिल है। स्थानीय धार्मिक परंपरा में इसे ‘भूतों का पहाड़’ या ‘भूतों वाली पहाड़ी’ कहा जाता है। प्रेतशिला पहाड़ी तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को सैकड़ों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। हाल की रिपोर्टों के अनुसार यहां करीब 676 सीढ़ियां चढ़कर श्रद्धालु ऊपर पहुंचते हैं। पितृपक्ष के दौरान इस स्थान पर भी बड़ी संख्या में लोग अपने पितरों के लिए कर्मकांड करते हैं।

प्रेतशिला पहाड़ी के नीचे ब्रह्मकुंड स्थित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पिंडदान से पहले यहां स्नान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार प्रेतशिला पहाड़ी के नीचे स्थित ब्रह्मकुंड पिंडदान की परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल है। इसी क्षेत्र में भगवान यम को समर्पित मंदिर भी स्थित है। वर्तमान मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई से जोड़ा जाता है।

प्रेतशिला से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं गयाजी की पिंडदान परंपरा को और विशिष्ट बनाती हैं। मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से पितरों को शांति मिलती है और उनके मोक्ष की कामना पूरी होती है। श्रद्धालुओं के लिए यह केवल पूजा या कर्मकांड का स्थान नहीं है, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का महत्वपूर्ण केंद्र भी माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान यहां पहुंचने वाले लोग अपने परिवार के दिवंगत सदस्यों के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करते हैं।

ब्रह्मकुंड के पास स्थित रामकुंड भी गयाजी के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने यहां स्नान किया था। इसी वजह से इसे रामकुंड कहा जाता है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर भी रामकुंड को उस स्थान के रूप में बताया गया है जहां भगवान राम के स्नान करने की मान्यता है। श्रद्धालुओं के बीच इस कुंड की विशेष धार्मिक प्रतिष्ठा है और गयाजी आने वाले कई लोग यहां भी दर्शन और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

गयाजी में भगवान राम के पिंडदान से जुड़ी मान्यता भी बेहद प्रसिद्ध है। धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान श्रीराम ने अपने पिता राजा दशरथ और पूर्वजों के लिए गया में पिंडदान किया था। इसी कारण गया धाम को पितरों के श्राद्ध और पिंडदान के लिए विशेष फलदायी माना जाता है। हालांकि ये प्रसंग धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं से जुड़े हैं, जिनका महत्व श्रद्धालुओं की आस्था में है।

गयाजी की पिंडदान परंपरा कई स्थानों को जोड़ती है। फल्गु नदी के तट पर तर्पण से लेकर विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरणचिह्न पर पिंड अर्पित करने और फिर अलग-अलग पिंडवेदियों पर कर्मकांड करने की परंपरा बताई जाती है। इसके बाद अक्षयवट वेदी पर पिंडदान के साथ अनुष्ठान पूरा करने की धार्मिक परंपरा है। गयाजी में वर्तमान समय में 54 प्रमुख पिंडवेदियों का उल्लेख मिलता है।

विष्णुपद मंदिर इस पूरी धार्मिक परंपरा का सबसे प्रमुख केंद्र माना जाता है। फल्गु नदी के किनारे स्थित इस प्राचीन मंदिर में काले पत्थर पर भगवान विष्णु के पदचिह्न होने की मान्यता है। बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार मंदिर का वर्तमान स्वरूप 18वीं शताब्दी में महारानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा निर्मित कराया गया था। मंदिर का शिखर, पत्थर की नक्काशी और गर्भगृह में स्थित चरणपादुका श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र हैं।

पितृपक्ष के दिनों में विष्णुपद मंदिर का दृश्य बेहद खास दिखाई देता है। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो जाती है। घंटियों की आवाज, मंत्रोच्चार, पूजा-पाठ और पिंडदान के लिए पहुंचते श्रद्धालुओं से पूरा क्षेत्र धार्मिक माहौल में डूबा नजर आता है। हाल के पितृपक्ष मेले में विष्णुपद मंदिर और देवघाट पर पुलिस प्रशासन की विशेष निगरानी भी रही है। पुलिसकर्मी वॉकी-टॉकी और CCTV के जरिए श्रद्धालुओं की भीड़ और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखते देखे गए।

ड्रोन से लिए गए विष्णुपद मंदिर के दृश्य गयाजी की धार्मिक विरासत को अलग नजरिए से सामने लाते हैं। ऊपर से देखने पर मंदिर की संरचना, आसपास का इलाका और श्रद्धालुओं की गतिविधियां एक साथ दिखाई देती हैं। मंदिर में गूंजती घंटियों और नीचे उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच यह दृश्य गयाजी के धार्मिक स्वरूप की व्यापक तस्वीर पेश करता है। पितृपक्ष के समय यहां देश के विभिन्न राज्यों के साथ विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।

विष्णुपद मंदिर को लेकर अलग-अलग धार्मिक परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है। हिंदू परंपरा में यहां भगवान विष्णु के चरणचिह्न माने जाते हैं, जबकि बौद्ध परंपरा में इसी पदचिह्न को भगवान बुद्ध से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि यह क्षेत्र अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं और ऐतिहासिक परंपराओं के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

गयाजी की भौगोलिक संरचना भी इसे अलग पहचान देती है। शहर के आसपास कई पहाड़ियां हैं, जिनके साथ अलग-अलग धार्मिक कथाएं और परंपराएं जुड़ी हुई हैं। प्रेतशिला, रामशिला और ब्रह्मयोनि जैसी पहाड़ियां गयाजी के धार्मिक भूगोल का हिस्सा हैं। प्रेतशिला के मामले में जहां पितरों के लिए पिंडदान की परंपरा महत्वपूर्ण है, वहीं रामशिला का संबंध भगवान राम की धार्मिक मान्यताओं से जोड़ा जाता है।

पितृपक्ष के दौरान गयाजी में सिर्फ एक स्थान पर कर्मकांड नहीं होता, बल्कि श्रद्धालु अपनी निर्धारित परंपरा के अनुसार कई पिंडवेदियों पर जाकर श्राद्ध और तर्पण करते हैं। कुछ श्रद्धालु एक दिन में कर्मकांड पूरा करते हैं तो कई लोग पांच, सात, 15 या 17 दिनों तक गयाजी में रहकर अलग-अलग वेदियों पर धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। फल्गु नदी, विष्णुपद और अक्षयवट इस धार्मिक यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव माने जाते हैं।

गयाजी में पितृपक्ष का महत्व इतना व्यापक है कि मेले के दौरान शहर का पूरा स्वरूप बदल जाता है। सड़कों पर श्रद्धालुओं की भीड़, घाटों पर धार्मिक अनुष्ठान, मंदिरों में दर्शन और पिंडवेदियों पर चलने वाले कर्मकांड इस अवधि को विशेष बना देते हैं। प्रशासन की ओर से भीड़ प्रबंधन, सफाई, सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। इस वर्ष देवघाट और विष्णुपद मंदिर क्षेत्र में सफाई के लिए आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल भी शुरू किया गया है।

प्रेतशिला की पहचान ‘भूतों का पहाड़’ के रूप में होने की वजह से यह स्थान पहली नजर में लोगों के लिए रहस्यमय लग सकता है, लेकिन धार्मिक परंपरा में इसका संबंध पितरों के श्राद्ध और उनकी शांति से है। यहां मौजूद मंदिर, पहाड़ी, सीढ़ियां और ब्रह्मकुंड मिलकर गयाजी की उस परंपरा का हिस्सा बनते हैं, जिसमें मृत्यु के बाद पितरों की शांति के लिए विशेष धार्मिक कर्मकांड किए जाते हैं। यही वजह है कि पितृपक्ष में इस पहाड़ी पर भी श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है।

गयाजी की पहचान हजारों वर्षों से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और पिंडदान की परंपरा से जुड़ी हुई है। यहां आने वाला श्रद्धालु केवल एक मंदिर में दर्शन नहीं करता, बल्कि फल्गु नदी, पिंडवेदियों, कुंडों और पहाड़ियों से जुड़ी अलग-अलग धार्मिक परंपराओं का हिस्सा बनता है। विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरणचिह्नों के दर्शन से लेकर प्रेतशिला में पिंडदान और ब्रह्मकुंड में धार्मिक अनुष्ठान तक, गयाजी का पूरा क्षेत्र पितृपक्ष की आस्था का एक बड़ा केंद्र बन जाता है।

इसी धार्मिक वातावरण के बीच विष्णुपद मंदिर में गूंजती घंटियों और मंदिर परिसर के ड्रोन दृश्य गयाजी की पहचान को एक अलग रूप में सामने लाते हैं। नीचे से देखने पर जहां मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र नजर आता है, वहीं ऊपर से लिए गए दृश्य में पूरा धार्मिक क्षेत्र, मंदिर की बनावट और आसपास का वातावरण एक साथ दिखाई देता है। पितृपक्ष के दौरान इन दृश्यों में श्रद्धालुओं की भीड़ और धार्मिक गतिविधियों की व्यापकता भी साफ दिखाई देती है।

गयाजी आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रेतशिला, ब्रह्मकुंड, रामकुंड और विष्णुपद केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं। इन स्थानों का महत्व धार्मिक विश्वास, पारिवारिक स्मृति और पितरों के प्रति श्रद्धा से जुड़ा है। यही कारण है कि पितृपक्ष के दौरान देश के कोने-कोने से लोग अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान और तर्पण करने यहां पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन कर्मकांडों से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है, जबकि गयाजी की प्राचीन परंपरा आज भी लाखों श्रद्धालुओं को इस पवित्र भूमि से जोड़ती है।

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