हापुड़ में जीरो बजट खेती का अभियान, एक देशी गाय से 5 एकड़ में रसायन मुक्त खेती की ट्रेनिंग

हापुड़ के कूलपुर में प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केंद्र बनेगा। किसानों को एक देशी गाय से 5 एकड़ रसायन मुक्त खेती, गोबर, गोमूत्र और जीवामृत का प्रशिक्षण मिलेगा।

हापुड़ के कूलपुर गांव में प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया जाएगा। यहां एक देशी गाय से पांच एकड़ खेती करने की तकनीक सिखाई जाएगी। गोबर, गोमूत्र और जीवामृत के जरिए रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देने की योजना है।

हापुड़: जिले में जीरो बजट यानी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए अभियान शुरू किया जा रहा है। इसके तहत गढ़मुक्तेश्वर तहसील क्षेत्र के कूलपुर गांव में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया जाएगा। यहां किसानों को एक देशी गाय से पांच एकड़ जमीन पर रसायन मुक्त खेती करने की तकनीक सिखाई जाएगी। केंद्र में गोबर, गोमूत्र और जीवामृत के इस्तेमाल से खेती का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

कूलपुर में बनेगा प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण केंद्र

शासन ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की योजना तैयार की है। गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत की पहल पर शुरू किए जा रहे इस अभियान के तहत प्रत्येक जिले में प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केंद्र खोले जाने हैं। हापुड़ में इसके लिए गढ़मुक्तेश्वर तहसील क्षेत्र के कूलपुर गांव का चयन किया गया है।

इन केंद्रों का संचालन पशुपालन और कृषि विभाग मिलकर करेंगे। गो आश्रय केंद्रों के आसपास के कुछ खेतों में प्राकृतिक खेती कराई जाएगी, ताकि किसान रसायन मुक्त खेती की पूरी प्रक्रिया को मौके पर देखकर समझ सकें। इसके लिए खेतों में गोमूत्र, गोबर और विशेष रूप से तैयार किए जाने वाले जीवामृत का इस्तेमाल किया जाएगा। खेती में रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाएगा।

एक देशी गाय से पांच एकड़ खेती का प्रावधान

प्राकृतिक खेती की इस योजना में एक देशी गाय से पांच एकड़ खेती करने का प्रावधान बताया गया है। किसानों को इसी आधार पर खेती की तकनीक और संसाधनों का इस्तेमाल सिखाया जाएगा। योजना का उद्देश्य खेती की लागत कम करने के साथ रसायन मुक्त कृषि को बढ़ावा देना है।

प्रशिक्षण केंद्रों की निगरानी के लिए जिले के करीब दो दर्जन किसानों की कमेटी बनाई जाएगी। ये किसान निरीक्षण करने के साथ-साथ मास्टर ट्रेनर के रूप में भी प्रशिक्षित होंगे। इसके अलावा प्राकृतिक तरीके से तैयार होने वाली फसलों की बिक्री के लिए किसानों को उचित बाजार और प्लेटफार्म उपलब्ध कराने की योजना है।

लगातार यूरिया के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता पर चिंता

कृषि विज्ञान केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अरविंद यादव ने रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1960 में यूरिया आने के समय प्रति हेक्टेयर करीब 20 किलो यूरिया का इस्तेमाल होता था। वर्तमान समय में गन्ने में 200 किलो और आलू में 500 किलो प्रति हेक्टेयर तक यूरिया का प्रयोग किया जा रहा है।

डॉ. यादव के अनुसार, लगातार रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से जमीन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। वर्ष 1960 में मेरठ मंडल के खेतों पर किए गए एक अध्ययन में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा 2.5 प्रतिशत बताई गई थी। वहीं, वर्तमान सर्वे में यह मात्रा 0.3 से 0.4 तक रह जाने की बात कही गई है।

जीवामृत से तैयार होगी रसायन मुक्त खेती

प्राकृतिक खेती में जीवामृत का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके लिए गोमूत्र और गोबर को 200 लीटर पानी में मिलाया जाता है। इसमें पांच किलो गुड़, पांच किलो उड़द की दाल और ऐसी जगह की पांच किलो मिट्टी मिलाई जाती है, जहां रसायनों का प्रयोग नहीं किया गया हो। करीब पांच दिन में जीवामृत तैयार हो जाता है।

तैयार जीवामृत को बोआई से पहले खेत में डाला जाता है। दी गई जानकारी के अनुसार, तीन साल तक इसके इस्तेमाल के बाद मिट्टी से रसायन की मात्रा खत्म होने और रासायनिक खेती के बराबर पैदावार मिलने का दावा किया गया है।

किसानों को पैदावार और गुणवत्ता का अंतर दिखाया जाएगा

प्रशिक्षण केंद्रों में किसानों को रासायनिक और प्राकृतिक खेती के बीच अंतर समझाने के लिए दोनों तरह की खेती कराई जाएगी। किसान अपनी रासायनिक खेती और केंद्र की रसायन मुक्त खेती की पैदावार, स्वाद और गुणवत्ता की तुलना कर सकेंगे। इसके बाद उन्हें अपने खेतों में प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. ओपी मिश्रा ने बताया कि पहले चरण में प्रत्येक जिले में एक प्रशिक्षण केंद्र बनाने की तैयारी है। हापुड़ में कूलपुर क्षेत्र में केंद्र स्थापित किया जा रहा है, जहां देशी गाय के गोबर और मूत्र से खेती करने की जानकारी दी जाएगी। उनका कहना है कि इसमें रसायनों का इस्तेमाल किए बिना पैदावार प्राप्त करने की तकनीक किसानों को बताई जाएगी।

Leave a comment