Hijab Controversy: वारिस पठान बोले- ‘मंगलसूत्र और सिंदूर पर आपत्ति नहीं, फिर हिजाब पर क्यों?’

Hijab Controversy: हिजाब विवाद के बीच AIMIM नेता वारिस पठान ने सवाल उठाते हुए कहा कि मंगलसूत्र और सिंदूर पर आपत्ति नहीं है, तो हिजाब पर क्यों? जानें उनके बयान

हिजाब को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर सियासी बहस तेज हो गई है। इसी बीच AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने फैसले पर असहमति जताते हुए सवाल उठाया कि “आप कौन होते हैं यह तय करने वाले कि इस्लाम में क्या अनिवार्य है और क्या नहीं?” पठान ने कहा कि धार्मिक मान्यताओं से जुड़े मामलों में अदालतों को यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा जरूरी है।

Hijab Controversy: इलाहाबाद हाई कोर्ट के स्कूल में हिजाब पहनने से जुड़े फैसले के बाद देश में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कोर्ट के फैसले पर असहमति जताते हुए कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था का पालन करने और व्यक्तिगत पसंद के अनुसार जीवन जीने का अधिकार देता है।

वारिस पठान ने कहा कि किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान या पहनावे को लेकर फैसला करने का अधिकार किसी दूसरे व्यक्ति के पास नहीं होना चाहिए। उन्होंने हिजाब पहनने को मुस्लिम महिलाओं की व्यक्तिगत और धार्मिक पसंद से जोड़ते हुए कहा कि संविधान में दिए गए अधिकारों के आधार पर ही देश का संचालन होना चाहिए।

‘संविधान फ्रीडम ऑफ च्वाइस देता है’

वारिस पठान ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह इससे सहमत नहीं हैं। उनके मुताबिक, संविधान नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। AIMIM नेता ने कहा कि यदि कोई महिला या लड़की अपनी इच्छा से हिजाब पहनना चाहती है, तो उसे ऐसा करने से रोकना उचित नहीं है। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि जब तक किसी व्यक्ति का पहनावा सार्वजनिक व्यवस्था या कानून से जुड़ी किसी समस्या का कारण नहीं बनता, तब तक उसकी व्यक्तिगत पसंद का सम्मान किया जाना चाहिए।

पठान ने अपने बयान में कहा कि किसी महिला के हिजाब पहनने को लेकर सवाल उठाने के बजाय उन मामलों पर ध्यान दिया जाना चाहिए जहां पहनावा वास्तव में आपत्तिजनक या अश्लील हो।

‘हिजाब को लेकर फैसला करना किसी और का काम नहीं’

AIMIM नेता ने धार्मिक मामलों में अदालतों और अन्य संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यह तय करना कि इस्लाम में कौन-सी चीज अनिवार्य है और कौन-सी नहीं, धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय है। उन्होंने हिजाब के मुद्दे को संविधान के अनुच्छेद 25 और 29 से जोड़ते हुए दावा किया कि अदालत के फैसले से धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को लेकर सवाल खड़े होते हैं। पठान ने इसे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा संवेदनशील मामला बताया।

हालांकि, धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकार पूर्ण नहीं हैं। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य संवैधानिक प्रावधानों के अधीन इन अधिकारों पर कानून के अनुसार प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

‘मंगलसूत्र और सिंदूर पर हम आपत्ति नहीं करते’

अपने बयान में वारिस पठान ने भारत की विविध धार्मिक परंपराओं का उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदू महिलाएं मंगलसूत्र पहनती हैं और सिंदूर लगाती हैं, जबकि सिख समुदाय के लोग पगड़ी पहनते हैं। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान किया जाना चाहिए।पठान का कहना था कि यदि किसी समुदाय के लोग अपनी धार्मिक पहचान के अनुरूप कोई परंपरा अपनाते हैं, तो दूसरे समुदायों को उस पर आपत्ति नहीं करनी चाहिए। 

उन्होंने इसे व्यक्तिगत पसंद और संवैधानिक अधिकार से जोड़ते हुए कहा कि सभी नागरिकों के अधिकार समान होने चाहिए। यह विवाद प्रयागराज के एक स्कूल की छात्रा की याचिका से जुड़ा है। छात्रा ने अपनी मां के माध्यम से इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया था और स्कूल में हिजाब पहनकर पढ़ाई करने की अनुमति मांगी थी। 

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने संबंधित स्कूल के ड्रेस कोड और उपलब्ध तथ्यों पर विचार किया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार करने का आधार नहीं बनता। अदालत ने यह भी माना कि हिजाब को इस्लाम में धार्मिक आस्था का अनिवार्य हिस्सा साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

Leave a comment