हिमाचल प्रदेश: देश में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी CDSCO की जांच में देशभर में तैयार और बाजार में उपलब्ध कई दवाओं के सैंपल निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 240 दवाओं को सबस्टैंडर्ड पाया गया, जिनमें से 82 दवाएं हिमाचल प्रदेश में बनी हुई थीं। इन दवाओं में हार्ट, ब्लड प्रेशर समेत अलग-अलग बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली मेडिसिन शामिल बताई गई हैं।
दवाओं के सैंपल की जांच निर्धारित गुणवत्ता मानकों के आधार पर की जाती है। किसी दवा के सैंपल में सक्रिय घटक की मात्रा, गुणवत्ता, शुद्धता या अन्य निर्धारित मानकों में कमी पाए जाने पर उसे Not of Standard Quality (NSQ) यानी मानक गुणवत्ता के अनुरूप नहीं माना जाता है। इसका अर्थ यह नहीं होता कि हर ऐसी दवा नकली है, बल्कि जांच में वह निर्धारित गुणवत्ता मानक पूरा नहीं कर पाई है।
CDSCO और संबंधित राज्य औषधि नियंत्रण विभाग समय-समय पर बाजार से दवाओं के सैंपल लेकर उनकी जांच करते हैं। इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि मरीजों तक पहुंचने वाली दवाएं निर्धारित गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के अनुरूप हों। जिन सैंपलों में कमी पाई जाती है, उनके निर्माता और संबंधित बैच की आगे जांच की जाती है।
हिमाचल प्रदेश देश के प्रमुख फार्मास्युटिकल उत्पादन केंद्रों में शामिल है। राज्य के औद्योगिक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में दवा कंपनियां उत्पादन करती हैं और यहां तैयार होने वाली दवाओं की सप्लाई देश के अलग-अलग हिस्सों में होती है। ऐसे में किसी दवा के गुणवत्ता परीक्षण में फेल होने पर संबंधित बैच की निगरानी और बाजार से उसे हटाने की कार्रवाई महत्वपूर्ण हो जाती है।
रिपोर्ट में जिन दवाओं के सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं, उनमें अलग-अलग चिकित्सकीय जरूरतों में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल होने की बात सामने आई है। इनमें हृदय और ब्लड प्रेशर से संबंधित दवाओं के अलावा अन्य बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली मेडिसिन भी बताई गई हैं। हालांकि किसी भी दवा के बारे में कार्रवाई का फैसला उसके संबंधित बैच, निर्माता और जांच रिपोर्ट के आधार पर किया जाता है।
ऐसे मामलों में दवा नियामक संबंधित कंपनियों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दे सकते हैं। यदि कोई बैच बाजार में उपलब्ध है तो उसे वापस लेने यानी रिकॉल करने की प्रक्रिया भी शुरू की जा सकती है। इसके अलावा उत्पादन इकाई का निरीक्षण, रिकॉर्ड की जांच और जरूरत पड़ने पर कानूनी कार्रवाई की जाती है।
मरीजों के लिए यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हार्ट और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों में दवाओं का नियमित सेवन किया जाता है। हालांकि किसी मरीज को अपनी चल रही दवा केवल किसी खबर के आधार पर अचानक बंद नहीं करनी चाहिए। यदि किसी दवा या उसके बैच को लेकर नियामक की ओर से विशेष रिकॉल या चेतावनी जारी होती है, तो डॉक्टर या फार्मासिस्ट से सलाह लेकर आगे की कार्रवाई करनी चाहिए।
दवा विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी दवा का एक सैंपल फेल होना पूरे ब्रांड या कंपनी की हर दवा के खराब होने का प्रमाण नहीं है। जांच आमतौर पर किसी खास बैच या सैंपल पर आधारित होती है। इसलिए उपभोक्ताओं को किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले नियामक की आधिकारिक जानकारी देखनी चाहिए।
CDSCO की ऐसी जांच व्यवस्था देश में दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। केंद्रीय और राज्य स्तर की एजेंसियां अलग-अलग स्थानों से सैंपल लेकर उनकी लैब में जांच कराती हैं। मानकों में कमी पाए जाने पर संबंधित निर्माता के खिलाफ कार्रवाई की जाती है और जरूरत के अनुसार बाजार में उपलब्ध उत्पादों पर भी कदम उठाया जाता है।
हिमाचल में बड़ी संख्या में फार्मा कंपनियां होने के कारण राज्य की दवा निर्माण इकाइयों की गुणवत्ता निगरानी विशेष महत्व रखती है। दवा उद्योग के लिए उत्पादन प्रक्रिया, कच्चे माल की गुणवत्ता, मशीनरी, स्टोरेज और तैयार उत्पाद की टेस्टिंग में निर्धारित मानकों का पालन करना जरूरी होता है।
देशभर में 240 दवाओं के सैंपल सबस्टैंडर्ड पाए जाने की खबर के बाद दवा निर्माण और गुणवत्ता नियंत्रण को लेकर फिर चर्चा शुरू हो गई है। खासकर उन दवाओं की निगरानी जरूरी हो जाती है, जिनका इस्तेमाल लंबे समय तक हार्ट, ब्लड प्रेशर और अन्य गंभीर बीमारियों के मरीज करते हैं।
फिलहाल संबंधित दवाओं के सैंपल और उनके बैच की जानकारी के आधार पर नियामकीय कार्रवाई की प्रक्रिया चलती है। मरीजों और आम लोगों के लिए जरूरी है कि वे बिना डॉक्टर की सलाह के अपनी नियमित दवाएं बंद न करें और यदि उनके पास संबंधित दवा का वही बैच है, जिसके खिलाफ आधिकारिक चेतावनी या रिकॉल जारी हुआ हो, तो चिकित्सक या फार्मासिस्ट से संपर्क करें।
दवाओं की गुणवत्ता से जुड़ी ऐसी रिपोर्ट में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि “सबस्टैंडर्ड” और “नकली” दवा एक ही चीज नहीं हैं। CDSCO की जांच में मानक पूरे नहीं करने वाले सैंपल पर नियामकीय कार्रवाई की जाती है, जबकि किसी दवा को नकली घोषित करने के लिए अलग कानूनी और जांच प्रक्रिया होती है।











