हड्डी की गंभीर चोट, बड़े बोन डिफेक्ट या सर्जरी के बाद इस्तेमाल होने वाले इंप्लांट में संक्रमण एक बड़ी चुनौती बन सकता है। ऐसे संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए लंबे समय तक एंटीबायोटिक दवाओं की जरूरत पड़ सकती है और कई मामलों में बैक्टीरिया की दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता भी समस्या बनती है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए IIT मंडी के शोधकर्ताओं ने 3D प्रिंटेड हड्डी स्कैफोल्ड के लिए एक नई सिरेमिक कोटिंग विकसित की है, जिसका उद्देश्य इंप्लांट की सतह पर बैक्टीरियल संक्रमण को नियंत्रित करने के साथ हड्डी के साथ उसके जुड़ाव को बेहतर बनाना है। शोध का विवरण 2026 में Chemical Engineering Journal में प्रकाशित हुआ है।
IIT मंडी के मुराब रिसर्च ग्रुप की ओर से प्रकाशित जानकारी के अनुसार इस तकनीक को “Nano-urchin ceramic coating” के रूप में विकसित किया गया है। शोध का पूरा नाम Nano-urchin ceramic coating: Topography mediated infection control and osteointegration in 3D-printed scaffolds है। इसका मूल उद्देश्य 3D प्रिंटेड बोन स्कैफोल्ड की सतह को इस तरह तैयार करना है कि वह बैक्टीरिया के लिए अनुकूल न रहे और दूसरी तरफ हड्डी की नई कोशिकाओं के जुड़ने और बढ़ने के लिए बेहतर वातावरण उपलब्ध करा सके।
3D प्रिंटेड स्कैफोल्ड का इस्तेमाल भविष्य में ऐसे मरीजों के लिए उपयोगी हो सकता है, जिनकी हड्डी का बड़ा हिस्सा किसी दुर्घटना, बीमारी या सर्जरी के कारण क्षतिग्रस्त हो गया हो। 3D प्रिंटिंग की मदद से मरीज की जरूरत के अनुसार आकार और संरचना वाले स्कैफोल्ड तैयार किए जा सकते हैं। लेकिन ऐसे स्कैफोल्ड की सतह पर बैक्टीरिया का चिपकना और बाद में संक्रमण पैदा होना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। हालिया शोध में भी यह बताया गया है कि कुछ 3D प्रिंटेड थर्मोप्लास्टिक स्कैफोल्ड हाइड्रोफोबिक और जैविक रूप से निष्क्रिय हो सकते हैं, इसलिए उनकी सतह को संशोधित करना जरूरी होता है।
IIT मंडी की नई तकनीक में सतह की सूक्ष्म बनावट यानी टोपोग्राफी को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। शोध का फोकस केवल किसी एंटीबायोटिक पदार्थ को इंप्लांट में डालने पर नहीं, बल्कि ऐसी सतह तैयार करने पर है जो बैक्टीरिया के लिए प्रतिकूल हो। यही वजह है कि इसे संक्रमण नियंत्रण के लिए एक अलग तरह की रणनीति माना जा रहा है। शोधकर्ताओं के अनुसार इस तरह की सतह बैक्टीरिया के साथ-साथ हड्डी और इंप्लांट के बीच बेहतर जैविक संपर्क की दिशा में काम कर सकती है।
इस रिसर्च की खास बात यह है कि एंटीबायोटिक पर निर्भरता कम करने की संभावना पर जोर दिया गया है। हालांकि इसे अभी यह कहना सही नहीं होगा कि इस कोटिंग के इस्तेमाल के बाद मरीजों को एंटीबायोटिक की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। फिलहाल यह एक शोध-आधारित तकनीक है और इसके क्लिनिकल इस्तेमाल से पहले सुरक्षा, प्रभावशीलता और मरीजों में लंबे समय के परिणामों की व्यापक जांच जरूरी होगी।
IIT मंडी के शोध समूह ने इससे पहले भी 3D प्रिंटेड बोन स्कैफोल्ड की सतह पर अलग-अलग प्रकार की कोटिंग और बायोमटेरियल आधारित तकनीकों पर काम किया है। शोध समूह की प्रकाशित सूची में 2024 में 3D-printed PLA scaffolds पर osteogenic citric acid-linked chitosan coating से संबंधित अध्ययन और 2025 में चिटोसान आधारित नैनोफाइबर कोटिंग से जुड़े काम शामिल हैं। इससे पता चलता है कि हड्डी के इंप्लांट की सतह को बेहतर बनाने पर समूह लंबे समय से काम कर रहा है।
रिसर्च ग्रुप की जानकारी में hydroxyapatite nano-spicule coating से जुड़ा काम भी दर्ज है। 2025 में इस तकनीक को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलनों में प्रस्तुत किया गया था। इसमें 3D प्रिंटेड PLA स्कैफोल्ड पर स्वयं व्यवस्थित हाइड्रॉक्सीएपेटाइट नैनो-स्पिक्यूल कोटिंग और उसकी bactericidal activity पर काम किया गया।
हाइड्रॉक्सीएपेटाइट का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह हड्डी के खनिज घटक से संबंधित पदार्थ है और बोन-रिजनरेशन से जुड़ी बायोमटेरियल रिसर्च में इसका व्यापक अध्ययन किया जाता है। ऐसे पदार्थों को स्कैफोल्ड की सतह पर इस्तेमाल करने का उद्देश्य इंप्लांट को हड्डी के प्राकृतिक वातावरण के अधिक करीब लाना हो सकता है।
इंप्लांट के बाद संक्रमण होने पर बैक्टीरिया सतह पर चिपककर बायोफिल्म बना सकते हैं। बायोफिल्म बनने के बाद बैक्टीरिया को नियंत्रित करना अधिक मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से आधुनिक बोन-इंप्लांट रिसर्च में ऐसी सतह विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है, जो शुरुआत से ही बैक्टीरिया के चिपकने और बढ़ने की संभावना कम करे। अलग-अलग शोध समूहों ने इसके लिए चिटोसान, सिल्वर, हाइड्रॉक्सीएपेटाइट और अन्य एंटीमाइक्रोबियल सतहों पर काम किया है।
IIT मंडी की तकनीक में सतह की संरचना को संक्रमण नियंत्रण से जोड़ना इसी व्यापक वैज्ञानिक दिशा का हिस्सा है। अगर इंप्लांट की सतह बैक्टीरिया को टिकने और फैलने से रोकने में प्रभावी साबित होती है, तो भविष्य में बोन-इंप्लांट से जुड़े संक्रमणों को कम करने के लिए यह एक उपयोगी विकल्प बन सकती है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात osteointegration है। इसका मतलब है कि इंप्लांट और आसपास की प्राकृतिक हड्डी के बीच मजबूत जैविक जुड़ाव विकसित हो। किसी बोन स्कैफोल्ड के सफल होने के लिए केवल संक्रमण रोकना पर्याप्त नहीं है। उसे हड्डी की कोशिकाओं के लिए अनुकूल वातावरण भी उपलब्ध कराना चाहिए, ताकि समय के साथ नई हड्डी का निर्माण और इंप्लांट के साथ उसका जुड़ाव बेहतर हो सके। IIT मंडी के 2026 के शोध का शीर्षक भी infection control के साथ osteointegration को प्रमुख उद्देश्य के रूप में सामने रखता है।
इस तकनीक का संभावित फायदा बड़े बोन डिफेक्ट वाले मरीजों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। दुर्घटनाओं में हड्डी का बड़ा हिस्सा टूटने या क्षतिग्रस्त होने पर कई बार सामान्य उपचार पर्याप्त नहीं होता। ऐसे मामलों में बोन ग्राफ्ट या स्कैफोल्ड आधारित उपचार की जरूरत पड़ सकती है। यदि भविष्य में मरीज की हड्डी के आकार के अनुरूप 3D प्रिंटेड स्कैफोल्ड तैयार करके उस पर ऐसी कोटिंग की जा सके, तो व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार बोन-रिजनरेशन की दिशा में नई संभावनाएं खुल सकती हैं।
3D प्रिंटिंग का एक बड़ा फायदा यह है कि जटिल आकार वाली संरचनाओं को अपेक्षाकृत सटीक तरीके से तैयार किया जा सकता है। हड्डी की आंतरिक संरचना भी पूरी तरह ठोस नहीं होती, बल्कि उसमें अलग-अलग स्तर की पोरोसिटी होती है। इसलिए शोधकर्ता ऐसे स्कैफोल्ड विकसित करने की कोशिश करते हैं, जिनमें कोशिकाओं के बढ़ने और नई ऊतक संरचना बनने के लिए उपयुक्त जगह उपलब्ध हो।
हालांकि लैब से अस्पताल तक किसी भी बायोमेडिकल तकनीक की यात्रा आसान नहीं होती। किसी नई कोटिंग को मरीजों में इस्तेमाल करने से पहले उसकी जैव-संगतता, यांत्रिक मजबूती, लंबे समय तक स्थिरता, संक्रमण नियंत्रण क्षमता और शरीर के भीतर व्यवहार की विस्तृत जांच करनी पड़ती है। इसके बाद प्री-क्लिनिकल और क्लिनिकल परीक्षणों की जरूरत होती है। इसलिए IIT मंडी की यह खोज अभी संभावनाओं वाली रिसर्च के रूप में देखी जानी चाहिए, न कि पहले से स्थापित अस्पताल उपचार के रूप में।
इस रिसर्च का महत्व एंटीबायोटिक प्रतिरोध की बढ़ती वैश्विक समस्या के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। संक्रमण के इलाज में एंटीबायोटिक जरूरी और प्रभावी दवाएं हैं, लेकिन बैक्टीरिया में प्रतिरोध बढ़ने से कुछ संक्रमणों का उपचार कठिन होता जा रहा है। इसलिए जहां संभव हो, संक्रमण को शुरुआत में ही रोकने या बैक्टीरिया के चिपकने को कम करने वाली तकनीकों पर वैज्ञानिक शोध बढ़ रहा है। 3D प्रिंटेड बोन इंप्लांट की सतह पर एंटीबैक्टीरियल गुण विकसित करना इसी प्रयास का हिस्सा है।
IIT मंडी का यह काम संस्थान में चल रहे व्यापक बायोमटेरियल और 3D प्रिंटिंग अनुसंधान से भी जुड़ा है। मुराब ग्रुप की प्रकाशित रिसर्च सूची में बोन रिजनरेशन, ऑर्थोपेडिक टिश्यू, 3D-प्रिंटेड PLA और PCL स्कैफोल्ड, हाइड्रॉक्सीएपेटाइट, चिटोसान और अन्य बायोमटेरियल पर कई अध्ययन दर्ज हैं।
अगर आगे के परीक्षणों में नैनो-उर्चिन सिरेमिक कोटिंग की संक्रमण रोकने और हड्डी से जुड़ने की क्षमता मजबूत साबित होती है, तो यह भविष्य में एंटीबायोटिक-निर्भर बोन इंप्लांट रणनीतियों के लिए एक वैकल्पिक या पूरक तरीका बन सकती है। खास तौर पर उन परिस्थितियों में जहां इंप्लांट की सतह पर बैक्टीरियल संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है, ऐसी तकनीक उपयोगी हो सकती है।
फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय के लिए यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक ही इंप्लांट सतह पर दो प्रमुख जरूरतों—संक्रमण नियंत्रण और हड्डी के साथ बेहतर एकीकरण—को एक साथ साधने की कोशिश की गई है। शोध के प्रकाशित होने के बाद इसके आगे के परीक्षण और तकनीक के व्यावहारिक इस्तेमाल की दिशा में होने वाला काम महत्वपूर्ण रहेगा।
कुल मिलाकर, IIT मंडी के शोधकर्ताओं ने 3D प्रिंटेड बोन स्कैफोल्ड के लिए नैनो-उर्चिन सिरेमिक कोटिंग विकसित की है, जिसका उद्देश्य इंप्लांट से जुड़े संक्रमण को नियंत्रित करना और हड्डी के साथ बेहतर जुड़ाव यानी osteointegration को बढ़ावा देना है। यह तकनीक एंटीबायोटिक पर निर्भरता कम करने की दिशा में संभावनाएं दिखाती है, लेकिन अभी इसे सीधे मरीजों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली स्थापित तकनीक नहीं माना जा सकता। आगे के प्री-क्लिनिकल और क्लिनिकल परीक्षणों के बाद ही इसकी वास्तविक चिकित्सकीय उपयोगिता स्पष्ट होगी।










