मध्य पूर्व में इजरायल-अमेरिका और ईरान का संघर्ष तेज हो गया है। पाकिस्तान ने खुद को वार्ता बिचौलिया के रूप में पेश किया, लेकिन सीमाओं, शिया आबादी और वैश्विक दबावों के कारण स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।
Pakistan: मध्य पूर्व में इजरायल और अमेरिका की जंग ईरान के साथ तेज हो गई है, और ऐसे में पाकिस्तान को अपने कूटनीतिक कदमों को लेकर मुश्किल स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। पाकिस्तान ने खुद को इस संघर्ष में एक बिचौलिया के रूप में पेश करने की कोशिश शुरू कर दी है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता पर सवाल उठ रहे हैं। जैसे-जैसे युद्ध बढ़ रहा है, वैश्विक अर्थव्यवस्था और मध्य पूर्व के ऊर्जा संसाधनों पर खतरा बढ़ गया है। इसी बीच पाकिस्तान ने वॉशिंगटन और तेहरान दोनों के बीच अपने को 'बैक-चैनल' के तौर पर पेश किया है, ताकि क्षेत्रीय दबाव और वैश्विक निगाहों में अपनी अहमियत बढ़ा सके।
पाकिस्तान का प्रयास
पाकिस्तान के इस प्रयास की शुरुआत तब हुई जब पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सीधे फोन किया। इसके बाद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से वार्ता की और इस्लामाबाद को वार्ता स्थल के रूप में पेश किया। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने इस स्थिति में खुद को प्रभावशाली दिखाने के लिए ईरान को अमेरिका की 15 सूत्रीय शांति योजना भी सौंपी, जिसे तेहरान ने खारिज कर दिया।
पाकिस्तान की स्थिति क्यों चुनौतीपूर्ण है
हालांकि पाकिस्तान खुद को शांति प्रक्रिया का बिचौलिया दिखा रहा है, लेकिन युद्ध के जल्द थमने की संभावना कम है। ईरान कोई पीछे हटने को तैयार नहीं है और अपनी शर्तों पर युद्ध को आगे बढ़ा रहा है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए यह स्पष्ट नहीं है कि वह आगे किस दिशा में कदम बढ़ाए। यदि संघर्ष लंबा चला और पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते की प्रतिबद्धता निभाई, तो ईरान की तरफ से इस्लामाबाद के निशाने पर आने की संभावना भी बनी रहेगी।
पाकिस्तान में शिया आबादी

पाकिस्तान में ईरान के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया मुस्लिम आबादी रहती है। 28 फरवरी को ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद वहां विरोध प्रदर्शन भड़क उठे थे। यदि युद्ध लंबा चला, तो इसका असर पाकिस्तान पर भी पड़ेगा। यह देश पहले से ही अफगान तालिबान के साथ संघर्ष में उलझा हुआ है और ईंधन आपूर्ति में रुकावटों का सामना कर रहा है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति और सीमाओं की सुरक्षा के लिहाज से यह और भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
पाकिस्तान के कूटनीतिक प्रयास
पाकिस्तान के सेना प्रमुख और प्रधानमंत्री ने कई बार खुद को अमेरिकी दृष्टिकोण में करीबी दिखाने की कोशिश की है। जनवरी में जब आसिम मुनीर ट्रंप से मिलने दावोस गए, उसके बाद पाकिस्तान ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल हो गया। इसके अलावा इस्लामाबाद ने ट्रंप के परिवार से जुड़े क्रिप्टो बिजनेस के साथ डील भी की है। यह दिखाता है कि पाकिस्तान वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
सीमा और ईरान के साथ ऐतिहासिक विवाद
पाकिस्तान की ईरान से लगती दक्षिण-पश्चिमी सीमा, खासकर बलूचिस्तान प्रांत में दशकों से विद्रोह और अस्थिरता का केंद्र रही है। जनवरी 2024 में पाकिस्तान और ईरान के बीच सीमा पर झड़प हुई थी। इसके बावजूद पाकिस्तान अब बिचौलिया बनने का प्रयास कर रहा है। इस क्षेत्र में सुरक्षा और राजनीतिक दबाव दोनों ही उच्च स्तर पर हैं, जिससे पाकिस्तान की चुनौती और बढ़ गई है।
सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता
पाकिस्तान की स्थिति और जटिल तब हो जाएगी जब सऊदी अरब के साथ उसके रक्षा समझौते की भूमिका सामने आएगी। इस समझौते के तहत दोनों देशों को एक-दूसरे की सुरक्षा में मदद करनी होती है। यदि युद्ध लंबा चला और ईरान ने सऊदी अरब पर हमले जारी रखे, तो इस्लामाबाद को इस समझौते के अनुसार कदम उठाना पड़ेगा। ऐसे में पाकिस्तान के लिए न तो पीछे हटना आसान होगा और न ही आगे बढ़ना।









