भारतीय रुपया बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया है।
बिजनेस न्यूज़: बुधवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले फिर कमजोर होकर नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। लगातार कई कारोबारी सत्रों से रुपये में गिरावट का दौर जारी है और आज भी यही रुझान देखने को मिला। डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और बढ़ते आयात बिल ने भी रुपये की कमजोरी को बढ़ाया है। हाल के दिनों में रुपया लगातार डॉलर के मुकाबले नए ऑल-टाइम लो स्तर छू रहा है, जिससे आयात लागत और महंगाई बढ़ने की चिंता भी तेज हो गई है।
डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड लो पर रुपया
बुधवार को भारतीय मुद्रा पिछले सत्र के 96.53 प्रति डॉलर के मुकाबले लगभग 33 पैसे टूटकर 96.86 पर खुली। कारोबार के दौरान रुपया और कमजोर होकर लगभग 96.90 प्रति डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और भू-राजनीतिक तनावों ने निवेशकों को सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर मोड़ दिया है, जिससे डॉलर मजबूत हुआ और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा।
2026 में अब तक भारतीय रुपया एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली प्रमुख मुद्राओं में शामिल हो गया है। इस साल अब तक रुपया 7% से अधिक टूट चुका है. केवल इस सप्ताह में लगभग 0.7% की गिरावट दर्ज हुई है. इस गिरावट ने आयात आधारित उद्योगों, विदेशी निवेश और महंगाई को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

कच्चे तेल की कीमतों का बड़ा असर
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये पर असर डालती है। इस समय ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 111 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है. विशेषज्ञों के मुताबिक, मध्य पूर्व में जारी तनाव और संभावित आपूर्ति बाधाओं के कारण तेल बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रहती हैं, तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है, जिससे चालू खाते का घाटा और महंगाई दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी
भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ाने वाला एक और बड़ा कारण अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेजी है। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 4.5% के ऊपर पहुंच गई है. 30-वर्षीय बॉन्ड यील्ड 5.1% के पार चली गई, जो लगभग 19 वर्षों का उच्च स्तर है. उच्च अमेरिकी यील्ड का मतलब है कि वैश्विक निवेशक अमेरिकी बाजार को अधिक सुरक्षित और आकर्षक मान रहे हैं। इसका असर यह होता है कि विदेशी निवेश उभरते बाजारों से निकलकर अमेरिका की ओर बढ़ने लगता है।
विश्लेषकों के अनुसार, फरवरी 2026 से मध्य पूर्व में बढ़े तनाव का असर भारतीय मुद्रा पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के बाद: विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से 22 अरब डॉलर से अधिक निकाले। विदेशी पूंजी की निकासी से डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपया और कमजोर होता है।









