इंडोनेशिया में फूड पॉइजनिंग से हजारों बच्चे बीमार, राष्ट्रपति ने मुफ्त भोजन योजना के प्रमुख को हटाया

इंडोनेशिया के राष्ट्रपति Prabowo Subianto ने फूड पॉइजनिंग से बीमार बच्चे और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी मुफ्त भोजन योजना के प्रमुख को पद से हटा दिया गया है।

इंडोनेशिया के राष्ट्रपति Prabowo Subianto ने फूड पॉइजनिंग और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी मुफ्त भोजन योजना के प्रमुख को हटा दिया है। इस योजना के तहत करोड़ों स्कूली बच्चों को भोजन उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन इसके संचालन पर गंभीर सवाल उठे हैं।

जकार्ता: इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने अपनी महत्वाकांक्षी मुफ्त भोजन योजना की देखरेख करने वाली सरकारी एजेंसी के प्रमुख दादन हिंदायाना को पद से हटा दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश की बहु-अरब डॉलर की इस योजना को खाद्य विषाक्तता (फूड पॉइजनिंग) के हजारों मामलों और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।

मुफ्त पौष्टिक भोजन कार्यक्रम प्रबोवो के 2024 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान का सबसे प्रमुख वादा था। इस योजना का उद्देश्य देशभर के करीब 8 करोड़ स्कूली बच्चों को मुफ्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना है। सरकार का मानना था कि इससे कुपोषण कम होगा और बच्चों के स्वास्थ्य तथा शिक्षा स्तर में सुधार आएगा। हालांकि, योजना शुरू होने के कुछ ही महीनों बाद कई गंभीर समस्याएं सामने आने लगीं।

हजारों बच्चे हुए बीमार

स्थानीय निगरानी संगठनों के अनुसार, कार्यक्रम की शुरुआत के बाद से अप्रैल तक 33,000 से अधिक बच्चों के खाद्य विषाक्तता से प्रभावित होने के मामले सामने आ चुके हैं। देश के विभिन्न प्रांतों से बच्चों के बीमार पड़ने और अस्पतालों में भर्ती होने की खबरें आईं, जिससे अभिभावकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई।

इन घटनाओं के बाद कई सामाजिक संगठनों और विपक्षी नेताओं ने कार्यक्रम को अस्थायी रूप से रोककर इसकी व्यापक समीक्षा की मांग की। आलोचकों का कहना है कि सरकार ने इतनी बड़ी योजना को लागू करने से पहले पर्याप्त गुणवत्ता नियंत्रण और खाद्य सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की।

भ्रष्टाचार के आरोपों ने बढ़ाई मुश्किलें

खाद्य सुरक्षा से जुड़े विवादों के बीच कार्यक्रम अब वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों में भी घिर गया है। इंडोनेशिया की भ्रष्टाचार निरोधक संस्था को हाल ही में एक शिकायत मिली, जिसमें विभिन्न भोजन केंद्रों और रसोईघरों के बजट में कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाया गया।

रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ क्षेत्रों में आवंटित बजट और वास्तविक खर्च के आंकड़ों में अंतर पाया गया है। इन आरोपों के सामने आने के बाद सरकार पर दबाव बढ़ गया और अंततः एजेंसी प्रमुख दादन हिंदायाना को पद छोड़ना पड़ा।

एजेंसी मुख्यालय पर छापेमारी

दादन हिंदायाना को हटाए जाने से कुछ दिन पहले ही अटॉर्नी जनरल कार्यालय के अधिकारियों ने राष्ट्रीय पोषण एजेंसी के मुख्यालय में छापेमारी की थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जांच के दौरान कर्मचारियों को भवन में प्रवेश करने से भी रोका गया।

सरकार ने दादन की जगह उनकी उप प्रमुख नानिक सुदरयाती देयांग को नई जिम्मेदारी सौंपी है। नानिक पूर्व पत्रकार रह चुकी हैं और 2024 के चुनाव अभियान में प्रबोवो की टीम का हिस्सा भी थीं।

नेतृत्व परिवर्तन पर उठे सवाल

हालांकि सरकार इस बदलाव को सुधार की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है, लेकिन कई विशेषज्ञों और नागरिकों का मानना है कि केवल नेतृत्व बदलने से समस्या का समाधान नहीं होगा।

सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि योजना को नए प्रमुख की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत है। कुछ आलोचकों ने यह भी सवाल उठाया कि नानिक के पास पोषण या खाद्य सुरक्षा क्षेत्र का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है, जिससे उनकी नियुक्ति को लेकर भी बहस शुरू हो गई है।

आर्थिक दबाव के बीच बढ़ी योजना की लागत

मुफ्त भोजन कार्यक्रम इंडोनेशिया की सबसे महंगी सामाजिक योजनाओं में से एक है। ऐसे समय में जब देश कमजोर मुद्रा, घटते व्यापार अधिशेष और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, इस योजना की लागत को लेकर भी बहस तेज हो गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को इस कार्यक्रम को लंबे समय तक चलाने के लिए भारी वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होगी। इसी वजह से हाल ही में योजना में बदलाव करते हुए भोजन वितरण को सप्ताह में छह दिन से घटाकर पांच दिन कर दिया गया है।

विवादित बयानों से भी घिरे रहे दादन

पूर्व प्रमुख दादन हिंदायाना अपने कुछ बयानों को लेकर भी आलोचनाओं का सामना कर चुके हैं। उन्होंने एक अवसर पर सुझाव दिया था कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन दो लीटर दूध पीना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने मुफ्त भोजन कार्यक्रम में कीड़ों और सागो वर्म जैसे वैकल्पिक खाद्य स्रोतों को शामिल करने की संभावना भी जताई थी।

इन बयानों ने सोशल मीडिया पर व्यापक बहस छेड़ दी थी और कई पोषण विशेषज्ञों ने इन्हें अव्यावहारिक बताया था।

राष्ट्रपति ने माना, योजना में हैं कई समस्याएं

राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने हाल ही में स्वीकार किया कि मुफ्त भोजन कार्यक्रम को लागू करने के दौरान कई चुनौतियां सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि नियमों का उल्लंघन करने या अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

इसके बावजूद प्रबोवो इस योजना का लगातार बचाव कर रहे हैं। उनका कहना है कि देश के गरीब और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लाखों परिवारों को इससे सीधा लाभ मिल रहा है। उन्होंने कई मौकों पर कहा है कि लोगों ने उनसे इस कार्यक्रम को जारी रखने की अपील की है क्योंकि यह बच्चों को नियमित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने में मदद कर रहा है।

योजना का भविष्य अधर में नहीं, लेकिन चुनौतियां बरकरार

विशेषज्ञों का मानना है कि इंडोनेशिया की मुफ्त भोजन योजना का उद्देश्य बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी सफलता खाद्य सुरक्षा, पारदर्शिता और प्रभावी निगरानी व्यवस्था पर निर्भर करेगी। फिलहाल नेतृत्व परिवर्तन को सरकार की सुधारात्मक कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या इससे योजना में सुधार आता है या फिर व्यापक संरचनात्मक बदलावों की आवश्यकता पड़ती है।

दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली भोजन योजनाओं में शामिल इस कार्यक्रम का भविष्य अब सरकार की क्षमता पर निर्भर करेगा कि वह सुरक्षा और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों का किस तरह समाधान करती है।

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