इजराइल में 20 दिन बाद चुनाव, क्या नेतन्याहू हार सकते हैं? 7 अक्टूबर के हमले ने बदली सियासत

इजराइल में 27 अक्टूबर को चुनाव होंगे। 7 अक्टूबर के हमास हमले के बाद देश की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। जानिए नेतन्याहू, लेफ्ट और अरब दलों की स्थिति।

इजराइल में 27 अक्टूबर को आम चुनाव होंगे, जो 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद पहला राष्ट्रीय चुनाव है। सुरक्षा और हमास अब चुनावी राजनीति के केंद्र में हैं। इससे दक्षिणपंथ मजबूत हुआ, जबकि लेफ्ट और अरब दलों की भूमिका बदल गई।

तेल अवीव: इजराइल में 27 अक्टूबर को आम चुनाव होने हैं। 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद देश की राजनीति का केंद्र महंगाई और नेतन्याहू के मुकदमों से हटकर सुरक्षा, हमास और फिलिस्तीन पर आ गया है। इससे दक्षिणपंथ मजबूत हुआ, जबकि लेफ्ट और अरब पार्टियों की भूमिका बदली है।

7 अक्टूबर के हमले ने बदल दिया चुनावी एजेंडा

इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाला आम चुनाव 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद पहला राष्ट्रीय चुनाव है। करीब तीन साल पहले हुए उस हमले ने सिर्फ इजराइल और हमास के बीच युद्ध की शुरुआत नहीं की, बल्कि देश की घरेलू राजनीति की दिशा भी बदल दी।

7 अक्टूबर 2023 को हमास के हजारों लड़ाकों ने इजराइल की सीमा में घुसकर कई इलाकों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। हमले में करीब 1,200 लोगों की मौत हुई और 250 से ज्यादा लोगों को बंधक बनाकर गाजा ले जाया गया। इसके जवाब में इजराइल ने गाजा में व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया।

अब चुनावी बहस में सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बन चुकी है। पहले महंगाई, आवास की कीमतें, आर्थिक नीतियां और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ चल रहे मुकदमे राजनीतिक चर्चा में प्रमुख थे। लेकिन युद्ध के बाद हमास, सेना, बंधकों और फिलिस्तीनी मुद्दे ने इन विषयों को पीछे धकेल दिया है।

नेतन्याहू के सामने सत्ता बचाने की चुनौती

हमास हमले के वक्त नेतन्याहू प्रधानमंत्री थे। इसलिए सुरक्षा चूक को लेकर उनकी सरकार पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। अब चुनाव में उनके सामने चुनौती सिर्फ विपक्षी दलों को हराने की नहीं, बल्कि हमले से पहले और उसके दौरान हुई सुरक्षा विफलताओं की राजनीतिक जिम्मेदारी का जवाब देने की भी है।

नेतन्याहू की लिकुड पार्टी अब भी इजराइल की राजनीति की प्रमुख ताकत है, लेकिन चुनावी सर्वेक्षणों में उसे स्पष्ट बढ़त नहीं दिखाई दे रही। पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट की अगुआई वाला राजनीतिक गुट भी उन्हें कड़ी चुनौती देता नजर आ रहा है। हालिया सर्वेक्षणों में लिकुड और आइजेनकोट के नेतृत्व वाले दल को लगभग समान समर्थन मिलता दिख रहा है। लिकुड को करीब 22-23 सीटें और आइजेनकोट के दल को लगभग 22 सीटें मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है।

इजराइल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत होती है। मौजूदा अनुमानों में नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को करीब 52 से 55 सीटें मिलने की संभावना बताई जा रही है। ऐसे में बहुमत तक पहुंचने के लिए उन्हें दूसरे दलों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है।

7 अक्टूबर के बाद दक्षिणपंथ को मिला फायदा

इजराइल की राजनीति में दक्षिणपंथ पहले से ही मजबूत था। नेतन्याहू की लिकुड और धार्मिक-राष्ट्रवादी दल लंबे समय से सत्ता के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं। लेकिन हमास के हमले और उसके बाद शुरू हुए युद्ध ने सुरक्षा को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया।

दक्षिणपंथी नेताओं ने इस माहौल में हमास के खिलाफ कठोर कार्रवाई, फिलिस्तीनी राज्य के गठन का विरोध और वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के समर्थन को प्रमुख मुद्दा बनाया। इटमार बेन-ग्विर और बेजेलेल स्मोट्रिच जैसे दक्षिणपंथी नेताओं को भी सुरक्षा और फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने का अवसर मिला। उनके लिए यह तर्क मजबूत हुआ कि इजराइल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए फिलिस्तीनी संगठनों के खिलाफ कठोर नीति जरूरी है।

युद्ध ने इजराइली मतदाताओं के एक बड़े हिस्से के लिए सुरक्षा को रोजमर्रा के आर्थिक मुद्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है। यही बदलाव दक्षिणपंथी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक लाभ माना जा रहा है।

लेफ्ट की राजनीति भी बदली

7 अक्टूबर के हमले का असर इजराइल के वामपंथी दलों पर भी पड़ा है। पहले लेबर पार्टी और मेरेत्ज जैसे दल फिलिस्तीन के साथ राजनीतिक समाधान, शांति प्रक्रिया और दो-राष्ट्र समाधान की वकालत करते थे। मेरेत्ज विशेष रूप से वेस्ट बैंक के कब्जे वाले इलाकों से इजराइली वापसी की समर्थक रही थी। लेकिन हमास के हमले के बाद इजराइली समाज में सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता ने ऐसी राजनीति के लिए जगह सीमित कर दी।

2024 में लेबर और मेरेत्ज ने मिलकर ‘द डेमोक्रेट्स’ पार्टी बनाई। इसका नेतृत्व पूर्व सैन्य अधिकारी याइर गोलान कर रहे हैं। पार्टी अब भी फिलिस्तीनियों के साथ राजनीतिक समाधान और वेस्ट बैंक के विलय का विरोध करती है। लेकिन इसके साथ ही वह हमास के शासन को खत्म करने और इजराइल की सुरक्षा मजबूत करने पर भी जोर देती है।

यह बदलाव इजराइली राजनीति में महत्वपूर्ण है। अब नेतन्याहू विरोधी या वामपंथी दल भी केवल शांति और फिलिस्तीनी अधिकारों की बात करके चुनावी समर्थन हासिल नहीं कर सकते। उन्हें यह भी बताना पड़ता है कि हमास जैसे संगठनों से इजराइल की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी।

अरब पार्टियों की भूमिका क्यों हुई मुश्किल?

इजराइल की राजनीति में अरब दलों की भूमिका 2021 के चुनाव के बाद बेहद महत्वपूर्ण हो गई थी। उस समय किसी भी राजनीतिक खेमे को 61 सीटों का बहुमत नहीं मिला था।

नेतन्याहू के विरोध में अलग-अलग विचारधारा वाले दल एक साथ आए। दक्षिणपंथी नेता नफ्ताली बेनेट और सेंटर के नेता याइर लैपिड ने गठबंधन बनाया। इसमें वामपंथी और दक्षिणपंथी दलों के साथ मंसूर अब्बास की अरब पार्टी राअम भी शामिल थी।

राअम की चार सीटों के समर्थन ने सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई। यह इजराइली राजनीति में एक ऐतिहासिक घटनाक्रम था, क्योंकि पहली बार किसी अरब पार्टी ने सरकार बनाने वाले गठबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन 7 अक्टूबर के बाद राजनीतिक परिस्थितियां काफी बदल गई हैं।

2026 में अरब दलों के सामने नई चुनौती

मौजूदा सर्वेक्षणों में अरब पार्टियों को कुल मिलाकर करीब 13 सीटें मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है। संख्या के लिहाज से वे किसी भी खेमे को बहुमत के करीब पहुंचाने में महत्वपूर्ण हो सकती हैं। लेकिन राजनीतिक रूप से स्थिति पहले जैसी नहीं है। हमास के हमले के बाद यहूदी मतदाताओं के बीच अरब पार्टियों को सरकार में शामिल करने को लेकर विरोध बढ़ सकता है।

दूसरी तरफ अरब पार्टियों के लिए भी ऐसी सरकार का समर्थन करना राजनीतिक रूप से मुश्किल हो सकता है जो गाजा युद्ध और फिलिस्तीनी मुद्दे पर कठोर रुख अपनाती हो। इसलिए अरब दलों के पास चुनाव के बाद संख्या की ताकत तो हो सकती है, लेकिन उस ताकत को सत्ता में प्रभाव में बदलना पहले की तुलना में कठिन हो सकता है।

चुनाव सिर्फ नेतन्याहू बनाम विपक्ष नहीं

इस बार इजराइल का चुनाव केवल यह तय करने के लिए नहीं है कि नेतन्याहू प्रधानमंत्री बने रहेंगे या नहीं। इसके परिणाम यह भी बताएंगे कि 7 अक्टूबर के बाद इजराइली समाज किस दिशा में जाना चाहता है। एक तरफ सुरक्षा, हमास के खिलाफ कठोर कार्रवाई और मजबूत सैन्य नीति को प्राथमिकता देने वाला दक्षिणपंथ है। दूसरी तरफ विपक्ष है, जो नेतन्याहू सरकार की सुरक्षा विफलताओं और युद्ध प्रबंधन पर सवाल उठा रहा है।

वहीं वामपंथी और अरब दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे सुरक्षा की चिंता को नजरअंदाज किए बिना फिलिस्तीनी मुद्दे और राजनीतिक समाधान की अपनी पुरानी नीतियों को कैसे पेश करें। आखिरकार चुनाव का सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि 7 अक्टूबर के बाद बदली इजराइली राजनीति नेतन्याहू को फिर सत्ता तक पहुंचाती है या मतदाता सुरक्षा विफलताओं की जिम्मेदारी तय करने के लिए सत्ता परिवर्तन का रास्ता चुनते हैं।

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