ISRO ने सफलतापूर्वक लॉन्च किया NVS-03 सैटेलाइट, GSLV-F18 से भारत के NavIC नेविगेशन सिस्टम को मिलेगी मजबूती

ISRO ने GSLV-F18 रॉकेट से NVS-03 सैटेलाइट सफलतापूर्वक लॉन्च किया। जानें कैसे यह मिशन भारत के स्वदेशी NavIC नेविगेशन सिस्टम को मजबूत बनाएगा और GPS सेवाओं में

इसरो ने 30 अक्टूबर की रात श्रीहरिकोटा से NVS-03 नेविगेशन सैटेलाइट सफलतापूर्वक लॉन्च किया। GSLV-F18 रॉकेट ने इसे निर्धारित ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचाया। स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक और नए L1 सिग्नल से लैस यह सैटेलाइट भारत के NavIC सिस्टम को मजबूत करेगा।

श्रीहरिकोटा: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) को शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 की रात एक और बड़ी कामयाबी मिली। इसरो ने सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अगली पीढ़ी का नेविगेशन सैटेलाइट NVS-03 अंतरिक्ष में भेजा। रात 11 बजकर 51 मिनट पर GSLV-F18 रॉकेट ने दूसरे लॉन्च पैड से उड़ान भरी। करीब 18 मिनट बाद सैटेलाइट अपनी तय ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंच गया। इसरो ने मिशन के शुरुआती चरण के सफल होने की पुष्टि की है।

GSLV-F18 ने 2,232 किलो वजनी सैटेलाइट को पहुंचाया अंतरिक्ष

NVS-03 की लॉन्चिंग के लिए इसरो ने जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल यानी GSLV-F18 का इस्तेमाल किया। करीब 50 मीटर ऊंचे इस रॉकेट में तीन चरण थे और उड़ान के समय इसका कुल वजन लगभग 420 टन था। यह GSLV की 20वीं उड़ान थी। लॉन्चिंग के बाद रॉकेट के तीनों चरणों ने अपना काम सफलतापूर्वक पूरा किया। 

इसके बाद 2,232 किलोग्राम वजनी NVS-03 सैटेलाइट को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित कर दिया गया। इस कक्षा में पृथ्वी से सैटेलाइट की सबसे कम दूरी करीब 170 किलोमीटर और सबसे ज्यादा दूरी 37,023 किलोमीटर है। कक्षा का झुकाव 20.75 डिग्री रखा गया है।

हालांकि, सैटेलाइट को अभी अपनी अंतिम निर्धारित कक्षा तक पहुंचना है। इसके लिए उसमें लगे इंजन की मदद से कई चरणों में उसकी कक्षा बदली जाएगी। योजना के मुताबिक इसे 32.5 डिग्री पूर्वी देशांतर पर स्थापित किया जाना है। इसके बाद जरूरी जांच पूरी होने पर इसे नेविगेशन सेवाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।

पिछले मिशन की खराबी से सबक लेकर बदली तकनीक

इस बार लॉन्चिंग में एक खास तकनीकी बदलाव भी किया गया। जनवरी 2025 में लॉन्च किए गए NVS-02 सैटेलाइट को इसरो ने शुरुआती ट्रांसफर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक पहुंचाया था, लेकिन बाद में उसकी कक्षा नहीं बढ़ाई जा सकी थी। जांच में सामने आया कि सैटेलाइट के इंजन तक ऑक्सीडाइजर पहुंचाने वाले पायरो वाल्व को खोलने का इलेक्ट्रिकल सिग्नल नहीं मिल पाया था। इसकी संभावित वजह कनेक्टर के संपर्क में खराबी थी। इस कारण सैटेलाइट अपने निर्धारित स्थान तक नहीं पहुंच सका।

NVS-03 में ऐसी परेशानी दोबारा न हो, इसके लिए इसरो ने पायरो वाल्व लॉन्चिंग से पहले ही खोल दिए थे। आम तौर पर इन वाल्व को उड़ान के बाद जरूरत पड़ने पर खोला जाता है। इस बदलाव के साथ पहले की जांच समिति की सिफारिशों को भी ध्यान में रखा गया है।

ISRO ने सफलतापूर्वक लॉन्च किया NVS-03 सैटेलाइट, GSLV-F18 से भारत के NavIC नेविगेशन सिस्टम को मिलेगी मजबूती

NVS-03 सैटेलाइट में क्या है खास, NavIC को कैसे मिलेगा फायदा?

NVS-03 इसरो की नई नेविगेशन सैटेलाइट सीरीज का तीसरा उपग्रह है। इसे खास तौर पर भारत के अपने नेविगेशन सिस्टम NavIC को बेहतर बनाने के लिए तैयार किया गया है। NavIC की मदद से किसी जगह की सही लोकेशन पता की जा सकती है। इसके अलावा रास्ता खोजने और सटीक समय की जानकारी देने में भी यह सिस्टम काम आता है। NVS-03 के जरिए इसरो की कोशिश इन सेवाओं को पहले से ज्यादा भरोसेमंद बनाने की है।

इस सैटेलाइट की सबसे खास बात इसमें लगी स्वदेशी रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक है। इसे इसरो के स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर ने बनाया है। सैटेलाइट में दूसरी एटॉमिक क्लॉक भी लगाई गई हैं। दरअसल, नेविगेशन सिस्टम में सही समय का बहुत महत्व होता है। सैटेलाइट से भेजे गए सिग्नल को पहुंचने में कितना समय लगा, इसी के आधार पर लोकेशन का पता लगाया जाता है। समय की गणना में मामूली अंतर आने से लोकेशन की जानकारी भी प्रभावित हो सकती है।

NVS-03 में L5 और S बैंड के साथ L1 सिग्नल की सुविधा भी रखी गई है। इसका फायदा आने वाले समय में स्मार्टफोन और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को मिल सकता है। इससे ज्यादा डिवाइस में NavIC का इस्तेमाल आसान हो सकेगा। भारत ने यह सिस्टम अपने देश के साथ सीमाओं से करीब 1,500 किलोमीटर दूर तक नेविगेशन सेवाएं देने के लिए विकसित किया है।

इसरो ने इससे पहले 4 सितंबर 2026 को EOS-05 सैटेलाइट लॉन्च किया था। अब NVS-03 की लॉन्चिंग के बाद इसे तय कक्षा में पहुंचाना और इसके उपकरणों की जांच करना जरूरी है। इन प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद ही सैटेलाइट को नियमित सेवाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।

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