किसी समय कनकपुर नामक एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक निर्धन किसान रहता था। वह अत्यंत परिश्रमी और ईमानदार था लेकिन उसके पास खेती के लिए भूमि का एक बहुत छोटा टुकड़ा था। दिन-रात कड़ी मेहनत करने के बाद भी उसे और उसके परिवार को दो वक्त की रोटी मुश्किल से नसीब होती थी। गरीबी के बावजूद रामू कभी निराश नहीं होता था। एक दिन अपने खेत की खुदाई करते समय उसे एक ऐसी वस्तु मिली जिसने न केवल उसकी गरीबी दूर की बल्कि उसके जीवन की दिशा ही बदल दी।
विस्तृत कहानी
गर्मी का मौसम था और सूरज आग उगल रहा था। रामू अपने सूखे खेत में पसीने से लथपथ होकर खुदाई कर रहा था। उसे उम्मीद थी कि शायद इस बार फसल अच्छी होगी और वह अपने परिवार का पेट भर सकेगा। अचानक उसकी कुदाल ज़मीन के नीचे किसी कठोर धातु से टकराई और टन की तेज़ आवाज़ हुई। रामू ने उत्सुकता से वहाँ की मिट्टी हटाई। काफी गहराई में उसे एक बहुत पुराना और पीतल का विशाल बर्तन गड़ा हुआ मिला। बर्तन काफी भारी और धूल से सना हुआ था।
रामू ने सोचा कि चलो यह पुराना बर्तन कम से कम घर में पानी भरने या अनाज रखने के काम तो आएगा। वह उसे घर ले आया। घर आकर उसने बर्तन को धोकर साफ किया। रामू को बहुत ज़ोर की भूख लगी थी लेकिन घर में केवल एक ही रोटी बची थी। उसने सोचा कि हाथ-मुँह धोकर खाता हूँ और अनजाने में उसने वह आखिरी रोटी उस बर्तन में रख दी।
जब वह हाथ-मुँह धोकर लौटा और रोटी निकालने के लिए बर्तन में हाथ डाला तो वह हैरान रह गया। बर्तन के अंदर एक नहीं बल्कि ढेर सारी रोटियाँ थीं। वह जितना निकालता रोटियाँ उतनी ही बढ़ती जातीं। रामू की आँखें फटी की फटी रह गईं। अपनी शंका दूर करने के लिए उसने अपनी जेब से एक सिक्का निकालकर बर्तन में डाला। देखते ही देखते बर्तन सिक्कों से भर गया। रामू समझ गया कि यह कोई साधारण बर्तन नहीं बल्कि एक जादुई बर्तन है जो किसी भी चीज़ को कई गुना बढ़ा देता है।
रामू समझदार था। उसने तय किया कि वह इस जादू का दुरुपयोग नहीं करेगा। उसने अपनी ज़रूरत के हिसाब से धन और अनाज बढ़ाया। धीरे-धीरे उसने अपना टूटा-फूटा घर ठीक करवाया और बैलों की नई जोड़ी खरीदी और अच्छे कपड़े पहनने लगा। वह गाँव के गरीब और भूखे लोगों की मदद भी करने लगा। पूरे गाँव में रामू की किस्मत और दरियादिली की चर्चा होने लगी।
गाँव का जमींदार जिसका नाम ठाकुर बलवंत सिंह था बहुत ही ईर्ष्यालु और लालची व्यक्ति था। जब उसने रामू की अचानक बढ़ती समृद्धि देखी तो उसे शक हुआ। उसने सोचा कि यह कल तक दाने-दाने को मोहताज था आज इतना अमीर कैसे हो गया। सच्चाई जानने के लिए जमींदार ने एक रात चुपके से रामू के घर की खिड़की से झाँका। उसने देखा कि रामू ने बर्तन में एक छोटा सा सोने का टुकड़ा डाला और बर्तन सोने से भर गया।
लालच ने जमींदार की आँखों पर पट्टी बांध दी। उसने सोचा कि यह बर्तन तो उसके जैसे अमीर आदमी के पास होना चाहिए और इस मामूली किसान के पास इसका क्या काम है। अगली ही रात जब रामू सो रहा था जमींदार ने अपने नौकरों के साथ मिलकर वह जादुई बर्तन चुरा लिया।
बर्तन को अपनी हवेली में लाकर जमींदार खुशी से पागल हो गया। उसने कमरे के दरवाज़े बंद किए और अपनी तिजोरी से हीरे-जवाहरात निकालकर बर्तन में डालने लगा। जैसे-जैसे बर्तन भरता गया उसका लालच बढ़ता गया। वह नाचने लगा और चिल्लाने लगा कि अब वह इस दुनिया का सबसे अमीर आदमी बन जाएगा।
जमींदार का एक बूढ़ा पिता था जो बहुत बीमार रहता था। शोर सुनकर वह कमरे में आया। वह लाठी के सहारे चल रहा था। कमरे में बिखरे खजाने और अपने बेटे का पागलपन देख वह हैरान रह गया। दुर्भाग्यवश उसका पैर फिसला और वह सीधे उस बड़े जादुई बर्तन के अंदर जा गिरा।
जमींदार घबरा गया। उसने तुरंत अपने पिता का हाथ पकड़कर बाहर खींचा। लेकिन जैसे ही उसके पिता बाहर आए बर्तन से बिल्कुल वैसे ही दिखने वाले एक और पिता बाहर निकलने लगे। जादुई बर्तन ने अपना काम कर दिया था और उसने पिता को भी दोगुना और चौगुना करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते कमरा खांसते हुए बूढ़े पिताओं की भीड़ से भर गया।
जमींदार अपना सिर पकड़कर बैठ गया। सभी पिता एक साथ चिल्लाने लगे और दवा माँगने लगे और सेवा की मांग करने लगे। घर में कोहराम मच गया। जमींदार को समझ नहीं आ रहा था कि वह इतने सारे पिताओं की देखभाल कैसे करेगा। उसकी सारी दौलत अब पिताओं के इलाज और देखभाल में खर्च होने लगी। वह रोने लगा और पछताने लगा कि उसने रामू का बर्तन क्यों चुराया।
अंत में तंग आकर और अपनी गलती का अहसास होने पर जमींदार ने वह बर्तन रामू को वापस कर दिया और माफी माँगी। लेकिन रामू ने देखा कि वह बर्तन अब लोगों के लिए मुसीबत बन रहा है इसलिए उसने उस बर्तन को ज़मीन में गहरा गड्ढा खोदकर हमेशा के लिए दफना दिया ताकि फिर कोई लालच का शिकार न बने।
सीख
इस कहानी से हमें यह महत्वपूर्ण सीख मिलती है कि लालच बुरी बला है और जो हमारे पास है हमें उसी में संतोष करना चाहिए। जब हम बिना मेहनत के मिली चीज़ों या दूसरों की संपत्ति पर अधिकार जमाने की कोशिश करते हैं तो वह वरदान भी अभिशाप बन जाता है। रामू ने संतोष और संयम रखा तो वह सुखी रहा लेकिन जमींदार के अनियंत्रित लालच ने उसकी शांति छीन ली। धन से सुख खरीदा जा सकता है लेकिन शांति केवल संतोष और ईमानदारी से मिलती है।













