जमशेदपुर के लिए गर्व का मौका आने वाला है। शहर से जुड़े तीन खिलाड़ी जोगा पूर्ति, दीपू मलेश और अंकिता भकत अब जापान के आईची-नागोया में होने वाले एशियन गेम्स 2026 में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए तैयार हैं। इन तीनों खिलाड़ियों की मंजिल भले ही एक है, लेकिन वहां तक पहुंचने का रास्ता अलग-अलग संघर्षों से होकर गुजरा है। किसी के पिता छोटी सी राशन दुकान चलाकर परिवार का खर्च उठाते रहे, तो किसी खिलाड़ी के पास खेल की जरूरी किट और जूते खरीदने तक के पैसे नहीं थे। वहीं एक खिलाड़ी ने महंगे खेल उपकरणों के बावजूद अपनी मेहनत और परिवार के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक का सफर तय किया।
जमशेदपुर की टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन की स्पोर्ट क्लाइंबिंग अकादमी और टाटा आर्चरी अकादमी ने इन खिलाड़ियों के खेल करियर को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जोगा पूर्ति और दीपू मलेश स्पीड क्लाइंबिंग में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे, जबकि अंकिता भकत रिकर्व तीरंदाजी में देश के लिए चुनौती पेश करेंगी। तीनों ने अलग-अलग परिस्थितियों में अभ्यास जारी रखा और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन के दम पर एशियन गेम्स तक जगह बनाई है।
19 वर्षीय जोगा पूर्ति का सफर खास तौर पर प्रेरणादायक है। एक सामान्य परिवार से आने वाली जोगा के पिता छोटी राशन दुकान चलाते हैं। परिवार के लिए रोजमर्रा का खर्च निकालना ही बड़ी चुनौती रहा, लेकिन बेटी के खेल के प्रति जुनून ने धीरे-धीरे पूरे परिवार को उसके साथ खड़ा कर दिया। जोगा का शुरुआत में खेल की दुनिया से कोई खास जुड़ाव नहीं था। वह अपने भाई के साथ केवल उत्सुकता के कारण टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन की स्पोर्ट क्लाइंबिंग अकादमी पहुंची थीं। वहां दीवार पर चढ़ने के शुरुआती प्रयास में ही प्रशिक्षकों ने उनकी क्षमता को पहचान लिया।
जोगा ने इसके बाद खेल को गंभीरता से लेना शुरू किया। शुरुआत में परिवार के सामने आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह की चुनौतियां थीं। एक सामान्य परिवार से आने वाली लड़की के लिए कठिन और अपेक्षाकृत कम चर्चित खेल को करियर बनाना आसान नहीं था। लेकिन जोगा ने लगातार अभ्यास को अपनी प्राथमिकता बनाया। धीरे-धीरे उनकी मेहनत का असर प्रतियोगिताओं में दिखने लगा और वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने लगीं।
जोगा ने वर्ष 2024 की एशियन यूथ चैंपियनशिप में रजत पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता दिखाई। इसके बाद उनके प्रदर्शन में लगातार सुधार हुआ। हाल में सीनियर एशियन चैंपियनशिप में उन्होंने अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड बेहतर किया और शीर्ष 16 में जगह बनाकर एशियन गेम्स के लिए अपनी दावेदारी मजबूत की। अब जापान में होने वाली प्रतियोगिता उनके करियर के सबसे बड़े मौकों में से एक है।
जोगा की कहानी यह भी बताती है कि किसी खिलाड़ी की प्रतिभा हमेशा बड़े खेल परिवार से नहीं आती। कई बार सामान्य परिवारों से निकलने वाले युवा सीमित संसाधनों के बावजूद खेल की दुनिया में अपना रास्ता बनाते हैं। जोगा के पिता का छोटा कारोबार परिवार के लिए आमदनी का साधन है, लेकिन बेटी ने उसी साधारण पारिवारिक माहौल से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच बनाई है। अब उनका लक्ष्य जापान में भारत के लिए बेहतर प्रदर्शन करना है।
दूसरी तरफ दीपू मलेश की कहानी आर्थिक संघर्ष और लोगों के सहयोग से आगे बढ़ने की कहानी है। 28 वर्षीय दीपू का संबंध बेंगलुरु की तंग बस्तियों से रहा है। स्पीड क्लाइंबिंग जैसे खेल में प्रशिक्षण और उपकरणों का खर्च उठाना उनके लिए आसान नहीं था। खेल के जूते, किट और नियमित अभ्यास के लिए जरूरी संसाधन जुटाना उनके सामने लगातार चुनौती बना रहा। इसके बावजूद उन्होंने खेल छोड़ने के बजाय अपनी तैयारी जारी रखी।
दीपू के सामने एक और समस्या यह थी कि स्पीड क्लाइंबिंग अभी क्रिकेट या कुछ दूसरे लोकप्रिय खेलों की तरह बड़े स्तर पर प्रायोजकों को आकर्षित नहीं करती। इसलिए उनके लिए आर्थिक सहायता जुटाना मुश्किल रहा। जब पारंपरिक तरीके से प्रायोजक नहीं मिला तो उनके दोस्तों ने क्राउडफंडिंग के जरिए पैसे जुटाने में मदद की। लोगों के इस सहयोग ने दीपू को अभ्यास जारी रखने और प्रतियोगिताओं की तैयारी करने में मदद की।
दीपू ने आर्थिक मुश्किलों और व्यक्तिगत चुनौतियों के बावजूद अपने प्रदर्शन में सुधार जारी रखा। 15 मीटर की सीधी दीवार को 5.39 सेकंड में पूरा कर उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया। इसी प्रदर्शन ने उन्हें देश के प्रमुख पुरुष स्पीड क्लाइंबरों में शामिल किया। अब वह एशियन गेम्स के मंच पर भारत की ओर से स्पीड क्लाइंबिंग में उतरेंगे।
स्पीड क्लाइंबिंग में खिलाड़ी को कुछ ही सेकंड में दीवार के शीर्ष तक पहुंचना होता है। इसमें तकनीक, प्रतिक्रिया की गति, ताकत और मानसिक एकाग्रता सभी की भूमिका होती है। दीपू के लिए जापान की प्रतियोगिता इसलिए भी महत्वपूर्ण होगी क्योंकि उन्हें एशिया के मजबूत खिलाड़ियों के साथ मुकाबला करना है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मामूली गलती भी परिणाम को बदल सकती है, इसलिए उनकी तैयारी में गति के साथ तकनीकी सटीकता पर भी ध्यान देना होगा।
तीसरी खिलाड़ी अंकिता भकत की कहानी भी संघर्ष से सफलता तक पहुंचने की है। कोलकाता के एक सामान्य दूध विक्रेता परिवार से आने वाली अंकिता ने वर्ष 2014 में जमशेदपुर की टाटा आर्चरी अकादमी से अपने खेल करियर की शुरुआत की थी। तीरंदाजी ऐसा खेल है जिसमें शुरुआती दौर से ही उपकरणों पर काफी खर्च होता है। अच्छे धनुष, तीर और अन्य जरूरी उपकरण सामान्य परिवार के लिए महंगे साबित हो सकते हैं। इसके बावजूद अंकिता ने अपने खेल को जारी रखा।
अंकिता ने धीरे-धीरे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। वर्ष 2017 में उन्होंने विश्व यूथ आर्चरी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल किया। इसके बाद 2022 हांगझोउ एशियन गेम्स में उन्होंने कांस्य पदक जीता। वर्ष 2024 के पेरिस ओलंपिक में भी उन्होंने मिक्स्ड टीम स्पर्धा में भारत का प्रतिनिधित्व किया और टीम चौथे स्थान पर रही। अब उनके सामने जापान में एशियन गेम्स का नया लक्ष्य है।
अंकिता के लिए एशियन गेम्स का अनुभव नया नहीं होगा, लेकिन हर बड़ी प्रतियोगिता अपने साथ अलग चुनौती लेकर आती है। जापान में रिकर्व तीरंदाजी में उन्हें एशिया की मजबूत टीमों के खिलाड़ियों से मुकाबला करना होगा। दक्षिण कोरिया, चीन और चीनी ताइपे के तीरंदाज इस स्पर्धा में मजबूत माने जाते हैं। ऐसे में अंकिता को अपने अनुभव, तकनीक और मानसिक संतुलन का इस्तेमाल करना होगा।
जमशेदपुर के इन तीनों खिलाड़ियों की कहानी में एक समान बात यह है कि उनके सामने शुरुआत से ही सुविधाओं की कमी या आर्थिक कठिनाइयां रही हैं। इसके बावजूद उन्होंने खेल को छोड़ा नहीं। जोगा ने सामान्य पारिवारिक परिस्थितियों से निकलकर स्पीड क्लाइंबिंग में अपनी जगह बनाई, दीपू ने क्राउडफंडिंग की मदद से अपना प्रशिक्षण जारी रखा और अंकिता ने महंगे उपकरणों वाले तीरंदाजी खेल में परिवार की सीमित आर्थिक स्थिति के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर तक का सफर तय किया।
टाटा स्टील की खेल अकादमियों ने भी जमशेदपुर और आसपास के युवाओं को प्रशिक्षण का मंच उपलब्ध कराया है। टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन की स्पोर्ट क्लाइंबिंग अकादमी वर्ष 2021 में शुरू हुई थी और वहां बड़ी संख्या में युवा प्रशिक्षण लेते हैं। अकादमी में आधुनिक क्लाइंबिंग सुविधाओं के साथ खिलाड़ियों को प्रशिक्षण और खेल विज्ञान से जुड़ी सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है। इससे जोगा और दीपू जैसे खिलाड़ियों को अपने खेल को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाने का अवसर मिला।
जमशेदपुर में खेल का माहौल लंबे समय से मजबूत रहा है। टाटा समूह से जुड़ी खेल संस्थाओं ने तीरंदाजी, क्लाइंबिंग और अन्य खेलों में प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण सुविधाएं विकसित की हैं। ऐसे वातावरण में स्थानीय खिलाड़ियों को बेहतर कोचिंग और प्रतियोगिताओं की तैयारी का अवसर मिलता है। जोगा, दीपू और अंकिता की उपलब्धियां इसी खेल पारिस्थितिकी तंत्र की एक झलक भी पेश करती हैं।
जोगा के लिए जापान जाना केवल एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेना नहीं है। वह ऐसे परिवार से आती हैं जहां खेल के बजाय रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना पहली प्राथमिकता रहा है। इसके बावजूद उन्होंने अपने प्रदर्शन के दम पर परिवार और शहर का नाम राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया है। अब जब वह भारतीय टीम की जर्सी में उतरेंगी, तो उनके सामने अपनी मेहनत को परिणाम में बदलने की चुनौती होगी।
दीपू के लिए भी यह सफर विशेष महत्व रखता है। जिस खिलाड़ी को कभी खेल के जूते और किट के लिए आर्थिक सहायता की जरूरत पड़ती थी, वही खिलाड़ी अब एशियन गेम्स में भारत की ओर से मैदान में उतरेगा। दोस्तों और समर्थकों द्वारा क्राउडफंडिंग के जरिए जुटाई गई मदद ने उनके सफर में अहम भूमिका निभाई। इससे यह भी सामने आता है कि प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए शुरुआती आर्थिक सहायता कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है।
अंकिता के पास जोगा और दीपू की तुलना में ज्यादा अंतरराष्ट्रीय अनुभव है। ओलंपिक और एशियन गेम्स जैसे बड़े मंचों पर उतर चुकी अंकिता अब अपने अनुभव का इस्तेमाल जापान में करेंगी। उनके पास अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में दबाव के बीच प्रदर्शन करने का अनुभव है। हालांकि तीरंदाजी में हर मुकाबला अलग परिस्थितियां लेकर आता है और अंतिम प्रदर्शन उस दिन की तकनीक, एकाग्रता और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
जापान के नागोया में एशियन गेम्स 2026 के दौरान इन खिलाड़ियों की प्रतियोगिताएं सितंबर के अंतिम सप्ताह में शुरू होंगी। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार स्पीड क्लाइंबिंग और तीरंदाजी की पदक स्पर्धाएं 29 सितंबर से शुरू होने वाली हैं। भारतीय खिलाड़ियों के सामने एशिया के कई मजबूत खिलाड़ी होंगे।
स्पीड क्लाइंबिंग में जोगा और दीपू को अपनी गति के साथ-साथ शुरुआती प्रतिक्रिया और दीवार पर तकनीकी नियंत्रण बनाए रखना होगा। कुछ सेकंड के इस खेल में खिलाड़ी की तैयारी का हर हिस्सा महत्वपूर्ण हो जाता है। एक छोटी सी चूक भी समय में बड़ा अंतर पैदा कर सकती है। दीपू के राष्ट्रीय रिकॉर्ड और जोगा के हालिया अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन ने उन्हें इस मंच तक पहुंचाया है, अब जापान में उन्हें अपनी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन करने का मौका मिलेगा।
रिकर्व तीरंदाजी में अंकिता के सामने अलग तरह की चुनौती होगी। इसमें खिलाड़ी को लक्ष्य पर लगातार सटीक निशाना साधना होता है। हवा और दबाव जैसी परिस्थितियां भी प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती हैं। अंकिता पहले ही बड़े अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में अपना अनुभव दिखा चुकी हैं और अब एशियन गेम्स में उनका लक्ष्य उस अनुभव को बेहतर परिणाम में बदलना होगा।
जमशेदपुर के इन खिलाड़ियों की कहानी उन युवाओं के लिए भी उदाहरण है जो सीमित संसाधनों के कारण खेल को करियर बनाने से हिचकते हैं। तीनों के सफर से यह सामने आता है कि प्रतिभा के साथ निरंतर अभ्यास और सही प्रशिक्षण का मिलना भी जरूरी है। जोगा और दीपू ने क्लाइंबिंग में अपनी पहचान बनाई, जबकि अंकिता ने तीरंदाजी में वर्षों की मेहनत के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर हासिल किया है।
अब पूरे देश की नजर एशियन गेम्स पर होगी और जमशेदपुर के लोगों के लिए इन तीन खिलाड़ियों की भागीदारी खास उत्साह का कारण होगी। जोगा पूर्ति, दीपू मलेश और अंकिता भकत जब भारतीय दल के साथ जापान में उतरेंगे तो उनके पीछे उनके परिवारों, प्रशिक्षकों और वर्षों से सहयोग करने वाले लोगों की मेहनत भी होगी। किसी ने आर्थिक तंगी के बावजूद बेटी का साथ दिया, किसी को दोस्तों ने क्राउडफंडिंग के जरिए संभाला और किसी ने महंगे उपकरणों और लगातार प्रशिक्षण की चुनौती के बावजूद खेल जारी रखा।
इन तीनों खिलाड़ियों की मंजिल अब जापान है। संघर्ष की लंबी राह पार करने के बाद वे एशिया के सबसे बड़े खेल मंचों में से एक पर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। जोगा और दीपू स्पीड क्लाइंबिंग में अपनी रफ्तार दिखाएंगे, जबकि अंकिता भकत रिकर्व तीरंदाजी में निशाना साधेंगी। उनके सफर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि शुरुआत चाहे कितनी भी मुश्किल रही हो, उन्होंने अभ्यास और खेल के प्रति प्रतिबद्धता को नहीं छोड़ा। अब नागोया में उनका प्रदर्शन उनके लंबे संघर्ष और तैयारी की अगली परीक्षा होगा।











