जन्माष्टमी पर शुभ मुहूर्त में बच्चे के जन्म का क्रेज, सिजेरियन डिलीवरी की डिमांड 50% तक बढ़ी

: जन्माष्टमी पर बच्चे को शुभ मुहूर्त में जन्म देने की चाह बढ़ी। कई परिवारों ने सिजेरियन डिलीवरी के लिए विशेष समय मांगा, अस्पतालों में मांग बढ़ी।
जन्माष्टमी पर शुभ मुहूर्त में बच्चे के जन्म का क्रेज, सिजेरियन डिलीवरी की डिमांड 50% तक बढ़ी
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जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के साथ जुड़ा है, लेकिन इस बार कई परिवारों के लिए यह दिन अपने घर में बच्चे के जन्म को लेकर भी खास बन गया। उत्तराखंड के कई शहरों, खासकर हल्द्वानी और देहरादून के निजी अस्पतालों में जन्माष्टमी के शुभ मुहूर्त में बच्चे के जन्म की मांग सामने आई। कुछ परिवारों ने बाकायदा डॉक्टरों से अनुरोध किया कि अगर चिकित्सकीय रूप से संभव हो तो उनके बच्चे का जन्म भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के दिन और शुभ समय पर कराया जाए। रिपोर्ट के मुताबिक हल्द्वानी में करीब 12 परिवारों ने जन्माष्टमी पर प्रसव कराने की इच्छा जताई, जबकि देहरादून के निजी अस्पतालों में 20 से अधिक परिवारों ने शुभ संयोग में ऑपरेशन के जरिए बच्चे के जन्म का अनुरोध किया।

परिवारों की इस इच्छा के पीछे धार्मिक आस्था के साथ-साथ बच्चे के जन्मदिन को जन्माष्टमी से जोड़ने की भावना भी दिखाई दे रही है। कई लोग चाहते हैं कि उनके घर आने वाला बच्चा भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन पर जन्म ले, इसलिए जिन महिलाओं की डिलीवरी की संभावित तारीख जन्माष्टमी के आसपास थी, उनके परिजनों ने डॉक्टरों से पहले ही बातचीत शुरू कर दी। कुछ परिवारों ने शुभ समय, नक्षत्र और योग की जानकारी लेकर उसी अवधि में डिलीवरी कराने की इच्छा जताई।

इस बार जन्माष्टमी के दिन पंचांग में रोहिणी नक्षत्र और हर्षण योग का संयोग होने की बात सामने आई। धार्मिक मान्यताओं में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में माना जाता है। इसी वजह से कई परिवारों के लिए इस दिन बच्चे के जन्म का महत्व और बढ़ गया। परिवारों का मानना है कि इस तरह बच्चे का जन्म विशेष धार्मिक संयोग में होगा और उसे भगवान कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होगा।

मुहूर्त के लिए सबसे ज्यादा चर्चा सिजेरियन डिलीवरी को लेकर रही। सामान्य प्रसव में बच्चे के जन्म का सटीक समय पहले से तय करना संभव नहीं होता, लेकिन नियोजित सिजेरियन के मामलों में चिकित्सकीय परिस्थितियों के आधार पर तारीख और समय की योजना बनाई जा सकती है। इसी वजह से कुछ परिवारों ने डॉक्टरों के सामने जन्माष्टमी के दिन विशेष समय पर सी-सेक्शन कराने की इच्छा रखी। हालांकि चिकित्सकों ने साफ किया कि किसी भी स्थिति में मां और बच्चे की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।

देहरादून के निजी अस्पतालों से सामने आई जानकारी के अनुसार वहां निजी संस्थानों में करीब 47.7 प्रतिशत प्रसव सिजेरियन से होते हैं, यानी लगभग हर दूसरा प्रसव ऑपरेशन से हो रहा है। सरकारी अस्पतालों में यह आंकड़ा करीब 14.7 प्रतिशत है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 के आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड में कुल सिजेरियन प्रसव की दर 25.9 प्रतिशत रही, जबकि निजी स्वास्थ्य संस्थानों में यह दर 47.7 प्रतिशत दर्ज की गई।

हालांकि जन्माष्टमी के मुहूर्त की मांग को सिजेरियन डिलीवरी बढ़ने का अकेला कारण नहीं माना जा सकता। डॉक्टरों के मुताबिक सी-सेक्शन कई चिकित्सकीय परिस्थितियों में जरूरी होता है। बच्चे की स्थिति सामान्य न होना, प्रसव के दौरान जटिलता, मां या बच्चे की स्वास्थ्य संबंधी परेशानी और अन्य मेडिकल कारणों में ऑपरेशन आवश्यक हो सकता है। इसलिए किसी भी धार्मिक अवसर के कारण बिना चिकित्सकीय जरूरत के सिजेरियन कराना उचित नहीं माना जाता।

जन्माष्टमी पर मुहूर्त डिलीवरी की मांग को लेकर डॉक्टरों का कहना है कि यदि महिला की गर्भावस्था पूरी अवधि के करीब है, मां और बच्चा स्वस्थ हैं और चिकित्सकीय रूप से नियोजित सिजेरियन सुरक्षित है, तभी परिवार की पसंद के समय पर विचार किया जा सकता है। लेकिन अगर उस समय तक गर्भावस्था की आवश्यक अवधि पूरी नहीं हुई है या मां अथवा बच्चे की स्थिति में तत्काल प्रसव की जरूरत है, तो केवल शुभ मुहूर्त के लिए डिलीवरी टालना या समय बदलना जोखिम भरा हो सकता है।

कई परिवारों में शुभ समय को लेकर इतनी उत्सुकता रही कि उन्होंने डॉक्टरों से रात के समय तक प्रसव कराने की संभावना के बारे में भी जानकारी ली। अस्पतालों में डॉक्टरों से यह सवाल पूछा गया कि जन्माष्टमी के दिन किस समय बच्चा पैदा हो सकता है और क्या ऑपरेशन को उस समय के आसपास निर्धारित किया जा सकता है। चिकित्सकों ने ऐसे मामलों में परिवारों को समझाया कि पहले सुरक्षित मेडिकल विंडो तय होती है, उसके बाद ही किसी पसंदीदा समय पर विचार किया जा सकता है।

जन्माष्टमी पर बच्चे के जन्म की यह चाह सिर्फ धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं है। कई परिवार इसे जीवनभर याद रहने वाला संयोग मान रहे हैं। बच्चे का जन्मदिन हर साल जन्माष्टमी के आसपास आने की वजह से परिवारों को लगता है कि धार्मिक पर्व और बच्चे का जन्मदिन एक साथ मनाने का अवसर मिलेगा। कुछ परिवारों ने तो बच्चे के नाम को भी भगवान कृष्ण या राधा से जोड़ने की योजना बनाई है।

हालांकि विशेषज्ञों की सलाह है कि गर्भावस्था और प्रसव के दौरान किसी भी तरह का फैसला केवल धार्मिक मान्यता या शुभ समय को देखकर नहीं किया जाना चाहिए। प्रसव एक चिकित्सकीय प्रक्रिया है और इसमें मां तथा नवजात की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण होती है। भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय के जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम में भी संस्थागत प्रसव के दौरान सामान्य और सिजेरियन दोनों तरह की जरूरत के अनुसार सेवाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है।

जन्माष्टमी पर मुहूर्त डिलीवरी की बढ़ती मांग ने चिकित्सा और धार्मिक आस्था के बीच संतुलन को लेकर भी चर्चा छेड़ दी है। परिवारों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए डॉक्टर यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सुरक्षित प्रसव की सीमा के भीतर ही समय का चयन किया जा सकता है। चिकित्सकीय आवश्यकता होने पर ऑपरेशन करना जरूरी है और सामान्य प्रसव संभव होने पर केवल शुभ समय के लिए सिजेरियन का विकल्प चुनना उचित नहीं है।

इस बीच अस्पतालों में जन्माष्टमी को लेकर प्रसव की संभावित तारीख वाली महिलाओं की संख्या और परिजनों की पूछताछ बढ़ने से मेडिकल स्टाफ भी अतिरिक्त सतर्क रहा। जिन महिलाओं की डिलीवरी इस अवधि में संभावित थी, उनकी जांच और स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर प्रसव की योजना बनाई गई। डॉक्टरों का कहना है कि जन्माष्टमी का दिन परिवारों के लिए भावनात्मक रूप से बेहद खास हो सकता है, लेकिन बच्चे को स्वस्थ और सुरक्षित दुनिया में लाना ही सबसे बड़ा शुभ मुहूर्त है।

इस तरह जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र और हर्षण योग के संयोग ने बच्चे के जन्म को लेकर परिवारों की धार्मिक आस्था को और मजबूत किया है। शुभ समय में बच्चे के जन्म की मांग के कारण निजी अस्पतालों में सिजेरियन की योजना को लेकर पूछताछ भी बढ़ी है। लेकिन विशेषज्ञों की स्पष्ट सलाह है कि मुहूर्त चाहे कितना भी खास क्यों न हो, प्रसव का अंतिम फैसला मां और बच्चे की मेडिकल स्थिति को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए।

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