बिहार के गयाजी में अमृतसर-कोलकाता औद्योगिक कॉरिडोर से डोभी के लोगों को रोजगार और कारोबार बढ़ने की उम्मीद है। खरांटी पंचायत के ग्रामीणों ने परियोजना का स्वागत किया है, लेकिन प्रदूषण रोकने और वैकल्पिक सड़क बनाने की मांग भी उठाई है।
गयाजी: डोभी के लोगों को उम्मीद है कि अमृतसर-कोलकाता औद्योगिक कॉरिडोर बनने के बाद काम की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख नहीं करना पड़ेगा। यहां उद्योग लगने से स्थानीय युवाओं को नौकरी मिल सकती है और छोटे कारोबारियों की कमाई भी बढ़ सकती है। खरांटी पंचायत के ग्रामीण इस परियोजना को इलाके के लिए अच्छा मौका मान रहे हैं। हालांकि उनकी चिंता भी है कि फैक्ट्रियां बनने के बाद प्रदूषण न बढ़े और सड़क निर्माण के कारण किसी का घर न टूटे।
डोभी में उद्योग लगने से बढ़ेगा कारोबार
अमृतसर-कोलकाता औद्योगिक कॉरिडोर के तहत गयाजी के डोभी में बड़ा औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया जा रहा है। इस परियोजना से आसपास के गांवों में नए उद्योग और रोजगार के रास्ते खुलने की उम्मीद है।
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शुक्रवार को खरांटी पंचायत के लोगों ने परियोजना से होने वाले फायदे और अपनी परेशानियों के बारे में बातचीत की। ग्रामीणों का कहना था कि इलाके में उद्योगों की कमी के कारण लोगों को रोजगार के लिए बाहर जाना पड़ता है।
डोभी के पुराने व्यवसायियों में शामिल विजय वर्मा इस योजना को लेकर काफी उम्मीद रखते हैं। उनका कहना है कि फैक्ट्रियां खुलेंगी तो आसपास के बाजारों में भी काम बढ़ेगा।
स्थानीय दुकानदारों और दूसरे कारोबारियों को नए ग्राहक मिल सकते हैं। इससे छोटे व्यवसाय करने वाले परिवारों को भी फायदा होने की संभावना है।
रोजगार मिलेगा तो दूसरे राज्यों में क्यों जाएंगे मजदूर?
डोभी में रोजगार की कमी लंबे समय से लोगों के लिए परेशानी बनी हुई है। यहां के कई मजदूर कमाई के लिए उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में जाते हैं।
ईंट-भट्ठा का व्यवसाय करने वाले सोमनाथ केशरी ने बताया कि इलाके से हर साल हजारों मजदूर बाहर काम करने जाते हैं। इनमें ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें अपने परिवार से दूर रहकर रोजी-रोटी कमानी पड़ती है।
उनके मुताबिक, औद्योगिक कॉरिडोर में काम शुरू होने के बाद स्थानीय स्तर पर नौकरी के मौके बढ़ सकते हैं। मजदूरों को अपने घर के आसपास काम मिलने लगे तो बाहर जाने की मजबूरी कम होगी।
इससे परिवारों को भी राहत मिल सकती है। हालांकि कितने स्थानीय लोगों को नौकरी मिलेगी, यह उद्योगों के शुरू होने और उनकी जरूरत के अनुसार तय होगा।
करीब 1,670 एकड़ में विकसित होगा औद्योगिक क्षेत्र
डोभी में प्रस्तावित एकीकृत विनिर्माण क्लस्टर अमृतसर-कोलकाता औद्योगिक कॉरिडोर का हिस्सा है। इसके लिए करीब 1,670 एकड़ जमीन तय की गई है।
राष्ट्रीय औद्योगिक कॉरिडोर विकास निगम के मुताबिक, परियोजना की लागत लगभग 1,339 करोड़ रुपये है। यहां 16,524 करोड़ रुपये तक निवेश आने की संभावना जताई गई है।
सरकारी योजना में करीब 1.09 लाख रोजगार की क्षमता का अनुमान है। हालांकि यह संभावित आंकड़ा है। इतनी नौकरियां अभी उपलब्ध नहीं हुई हैं।
औद्योगिक क्षेत्र में सड़क, बिजली, पानी और दूसरी जरूरी सुविधाएं विकसित करने की योजना है। भविष्य में यहां लगने वाले उद्योगों से डोभी के साथ आसपास के इलाकों को भी फायदा मिल सकता है।
फैक्ट्रियों के धुएं और गंदे पानी की चिंता
कॉरिडोर को लेकर ग्रामीणों ने विकास की उम्मीद जताई है, लेकिन पर्यावरण की अनदेखी नहीं करने की बात भी कही है।
खरांटी पंचायत के रहने वाले ललन कुमार का कहना है कि उद्योग लगाना अच्छा फैसला है, मगर इससे होने वाले प्रदूषण को रोकने का इंतजाम पहले होना चाहिए।
उन्होंने फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं और गंदे पानी के सुरक्षित निस्तारण की मांग की है। ग्रामीण चाहते हैं कि आसपास रहने वाले परिवारों की सेहत और खेती पर कोई खराब असर न पड़े।
लोगों का कहना है कि उद्योगों के साथ पर्यावरण की सुरक्षा पर भी ध्यान देना जरूरी है।
डोभी-चतरा सड़क के लिए उठी अलग रास्ते की मांग
औद्योगिक कॉरिडोर के साथ सड़क निर्माण को लेकर भी ग्रामीणों ने अपनी बात रखी है।
रामस्वरूप प्रसाद ने बताया कि डोभी-चतरा सड़क के आसपास घनी आबादी बसी हुई है। सड़क निर्माण या विस्तार के दौरान घरों को नुकसान पहुंचने की आशंका है।
उन्होंने मांग की है कि प्रशासन वैकल्पिक रास्ता बनाने पर विचार करे, ताकि लोगों को अपना घर छोड़ने की नौबत न आए।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की सुविधा जरूरी है, लेकिन इसे बनाते समय आबादी और पहले से बने मकानों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
विकास के साथ ग्रामीणों की मांगों पर भी ध्यान जरूरी
डोभी में औद्योगिक कॉरिडोर बनने से रोजगार, कारोबार और सड़क जैसी सुविधाओं के बढ़ने की उम्मीद है। लेकिन गांव के लोग चाहते हैं कि परियोजना का फायदा उन्हें भी मिले।
खासकर स्थानीय युवाओं को काम, प्रदूषण पर नियंत्रण और सड़क निर्माण के दौरान घरों की सुरक्षा उनके लिए अहम मुद्दे हैं।
अब ग्रामीणों की नजर इस बात पर है कि निर्माण कार्य आगे कैसे बढ़ता है और उनकी मांगों पर प्रशासन क्या फैसला लेता है।







