परिसीमन के मुद्दे पर कांग्रेस ने एक बार फिर केंद्र सरकार से सवाल किए हैं। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने पूछा है कि क्या सरकार इस प्रक्रिया को लेकर कोई नया प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है या फिर पिछले बजट सत्र में गिर चुके संविधान संशोधन विधेयक को दोबारा पेश किया जाएगा।
Delimitation Bill: देश में परिसीमन को लेकर सियासी बहस एक बार फिर तेज हो गई है। कांग्रेस ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से पूछा है कि क्या वह इस मुद्दे पर कोई नया प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है या पिछले बजट सत्र में पारित नहीं हो सके संविधान संशोधन विधेयक को दोबारा संसद में पेश किया जाएगा। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इस मामले पर सरकार की रणनीति को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने यह भी पूछा कि परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा के लिए अब तक सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुलाई गई है।
यह सवाल ऐसे समय में उठाया गया है, जब परिसीमन की प्रक्रिया और उसके संभावित राजनीतिक प्रभावों को लेकर विभिन्न दलों के बीच चर्चा जारी है। इस मुद्दे का संबंध निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण से है, जिसका असर लोकसभा और विधानसभा में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर पड़ सकता है।
परिसीमन पर सरकार की योजना क्या है?
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने मंगलवार को केंद्र सरकार से पूछा कि क्या उसके पास परिसीमन को लेकर कोई नया और ठोस प्रस्ताव है, जिस पर अन्य राजनीतिक दलों के साथ विचार-विमर्श किया गया हो। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि क्या सरकार पिछले बजट सत्र में गिर चुके संविधान संशोधन विधेयक को फिर से पेश करने की योजना बना रही है।
रमेश ने सवाल उठाया कि यदि सरकार पुराने विधेयक को दोबारा लाती है, तो क्या उसे संसद में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत मिल पाएगा। उन्होंने दावा किया कि इस तरह की कोशिश भी सफल नहीं होगी। हालांकि, सरकार की आगे की रणनीति और किसी नए प्रस्ताव को लेकर स्थिति उसके आधिकारिक रुख से ही स्पष्ट होगी। कांग्रेस के इन सवालों से संकेत मिलता है कि पार्टी परिसीमन की प्रक्रिया, उससे जुड़े प्रस्तावों और संसद में संभावित विधायी कदमों पर स्पष्टता चाहती है।
किरेन रिजिजू के जवाब के बाद बढ़ी राजनीतिक चर्चा
परिसीमन को लेकर कांग्रेस का यह सवाल संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को दिए गए जवाब के बाद सामने आया। रिजिजू ने कहा था कि सरकार की ओर से बातचीत के लिए समय मांगे जाने के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व ने बैठक के लिए कोई तारीख तय नहीं की। इसके बाद जयराम रमेश ने सरकार से पूछा कि वह परिसीमन पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की पहल क्यों नहीं कर रही है।
कांग्रेस ने बातचीत के लिए तारीख नहीं देने के आरोप पर सीधे जवाब देने के बजाय सरकार से उसके प्रस्ताव की प्रकृति और भविष्य की योजना स्पष्ट करने की मांग की। इस घटनाक्रम के बीच राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि क्या कांग्रेस के सवाल सरकार के साथ संवाद की संभावनाओं को आगे बढ़ाने का संकेत हैं। हालांकि, पार्टी की ओर से इस संबंध में किसी औपचारिक निर्णय की पुष्टि नहीं की गई है।
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कई राजनीतिक दल कर चुके हैं चर्चा
परिसीमन के मुद्दे पर केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि कई अन्य राजनीतिक दल भी अपनी चिंताएं सामने रखते रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार), वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और बीजू जनता दल सहित कई दल सरकार के प्रतिनिधियों के साथ इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं।
परिसीमन को लेकर राजनीतिक दलों की चिंताओं के केंद्र में प्रतिनिधित्व का संतुलन और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया जैसे विषय हैं। ऐसे फैसलों का प्रभाव अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। इसी वजह से इस मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक सहमति और पारदर्शी चर्चा की मांग उठती रही है।
इस बीच, ऐसी अटकलें भी सामने आई हैं कि परिसीमन पर चर्चा के लिए संसद के मानसून सत्र की अवधि बढ़ाई जा सकती है। हालांकि, सत्र की अवधि बढ़ाने के संबंध में किसी आधिकारिक निर्णय की पुष्टि जरूरी है।
मानसून सत्र को लेकर कांग्रेस का रुख चर्चा में
संसद के मानसून सत्र को औपचारिक रूप से समाप्त नहीं किए जाने के मुद्दे पर भी कांग्रेस का रुख चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बार पार्टी ने इस मामले में सरकार की आलोचना नहीं की है। इससे पहले किरेन रिजिजू ने कहा था कि संसद के सत्रों के बीच लंबा अंतराल रहने के उदाहरण पहले भी मौजूद हैं। उन्होंने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा था कि उस दौरान भी 87 दिनों तक सत्रावसान नहीं हुआ था।
संसदीय सत्र की अवधि और परिसीमन पर संभावित चर्चा को लेकर फिलहाल राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर बनी हुई है। हालांकि, कांग्रेस के रुख में आए बदलाव को किसी निश्चित राजनीतिक रणनीति का संकेत मानने से पहले पार्टी और सरकार के आधिकारिक बयानों को देखना जरूरी होगा।








