कांशीराम जयंती: ‘नए साहब’ से बहुजन राजनीति के नेता बनने तक, क्यों आज भी प्रासंगिक हैं BSP संस्थापक

कांशीराम जयंती पर जानिए कैसे ‘नए साहब’ से बहुजन राजनीति के सबसे बड़े नेता बने BSP संस्थापक कांशीराम और क्यों आज भी उनकी विचारधारा भारतीय राजनीति में प्रासंगिक

आज, 15 मार्च को देशभर में बहुजन समाज के प्रमुख नेता और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम को उनकी जयंती पर याद किया जा रहा है। भारतीय राजनीति में दलित और वंचित समाज को संगठित करने का जो काम कांशीराम ने किया, उसका असर आज भी राष्ट्रीय राजनीति में दिखाई देता है। उनका मशहूर नारा “वोट से लेंगे सीएम-पीएम” आज भी सामाजिक और राजनीतिक चेतना का प्रतीक माना जाता है।

Kanshi Ram Jayanti: उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में आज दलित राजनीति के प्रमुख नेता कांशीराम को उनकी जयंती के अवसर पर याद किया जा रहा है। कांशीराम ने देश में दलितों, पिछड़ों और वंचित वर्गों के बीच राजनीतिक जागरण का बड़ा अभियान चलाया था। उनका मशहूर नारा “वोट से लेंगे सीएम-पीएम” आज भी दलित राजनीति में अक्सर चर्चा में रहता है।

कांशीराम ने अपने विचारों की प्रेरणा डॉ. भीमराव अंबेडकर से ली, जिन्होंने संविधान के माध्यम से देश में समानता, न्याय और सभी नागरिकों के लिए समान मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की। हालांकि, संविधान बनने के बाद भी समाज के कमजोर वर्गों की सत्ता में भागीदारी सीमित थी। इसी स्थिति को बदलने के लिए कांशीराम ने बहुजन समाज को संगठित करने का अभियान शुरू किया और लोगों को अपने वोट की ताकत समझाई। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कर दलितों और वंचित वर्गों को राजनीतिक मंच दिया, जिसका असर बाद की राजनीति में साफ दिखाई दिया।

पुणे की घटना जिसने बदल दी सोच

कांशीराम के जीवन में एक घटना ने बड़ा मोड़ लाया। यह घटना उस समय की है जब वे पुणे की एक सरकारी प्रयोगशाला में नौकरी कर रहे थे। एक कर्मचारी ने भीमराव अंबेडकर की जयंती पर छुट्टी मांगी, लेकिन अधिकारी ने छुट्टी देने से इनकार कर दिया। विरोध करने पर कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया गया।यह घटना कांशीराम को गहराई से प्रभावित कर गई। 

उन्होंने महसूस किया कि सामाजिक भेदभाव केवल गांवों में ही नहीं बल्कि सरकारी संस्थानों में भी मौजूद है। इसी घटना के बाद उन्होंने अंबेडकर के विचारों का अध्ययन शुरू किया और सामाजिक न्याय के आंदोलन से जुड़ने का फैसला किया।

पढ़ाई, नौकरी और फिर आंदोलन का रास्ता

कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रूपनगर जिले में हुआ था। वे दलित सिख परिवार से थे, लेकिन बचपन में उन्हें ज्यादा भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। उन्होंने पढ़ाई पूरी की और सरकारी नौकरी हासिल की। हालांकि, नौकरी के दौरान सामाजिक असमानता को करीब से देखने के बाद उन्होंने तय किया कि केवल अधिकारी बनकर बदलाव संभव नहीं है। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और समाज में जागरूकता फैलाने का काम शुरू किया।

संगठन से राजनीति तक का सफर

1960 के दशक में कांशीराम ने सामाजिक संगठनों के जरिए काम शुरू किया। उन्होंने पहले कर्मचारियों के बीच संगठन बनाया, जिसे बाद में वामसेफ (BAMCEF) के नाम से जाना गया। इसका उद्देश्य शिक्षित दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग को एक मंच पर लाना था। इसके बाद उन्होंने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (DS-4) बनाई, जिसके जरिए उन्होंने नारा दिया — “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी।

1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। उस समय उन्होंने कहा था कि पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा पहचान बनाने के लिए और तीसरा जीतने के लिए लड़ेंगे।

चुनावी राजनीति में उभार

कांशीराम ने कई चुनाव लड़े और धीरे-धीरे पार्टी को मजबूत किया। उत्तर प्रदेश में समाजवादी और बहुजन राजनीति के गठबंधन ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई।1990 के दशक में BSP तेजी से उभरी और दलित वोट बैंक को संगठित करने में सफल रही। इसी दौर में मायावती का उभार हुआ, जिन्हें कांशीराम ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। मायावती बाद में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और BSP राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बन गई।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कांशीराम का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने दलित और वंचित समाज को वोट की ताकत का महत्व समझाया। आज भारत में लगभग हर राजनीतिक दल “अंतिम व्यक्ति तक विकास” की बात करता है। इसे कांशीराम की राजनीति का प्रभाव माना जाता है, क्योंकि उन्होंने सत्ता में भागीदारी को सामाजिक न्याय से जोड़ा। उनका आंदोलन केवल चुनाव जीतने का नहीं था, बल्कि समाज के उन वर्गों को आत्मविश्वास देना था जिन्हें लंबे समय तक सत्ता से दूर रखा गया।

अंतिम समय और विरासत

कांशीराम ने जीवन के अंतिम वर्षों में बौद्ध धर्म अपनाने की इच्छा जताई थी, लेकिन 9 अक्टूबर 2006 को उनका निधन हो गया। आज भी बहुजन राजनीति, सामाजिक न्याय और वोट की ताकत की चर्चा होती है तो कांशीराम का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उनकी जयंती पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और उनके विचारों को याद किया जाता है। कांशीराम की राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र को नई दिशा दी और यही कारण है कि दशकों बाद भी उनका प्रभाव राजनीति में साफ दिखाई देता है।

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