भारत में AI कंपनियों द्वारा कंटेंट के उपयोग पर बड़ा बदलाव संभव है। एक सरकारी पैनल ने प्रस्ताव दिया है कि AI मॉडल ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले भारतीय कंटेंट के बदले क्रिएटर्स को रॉयल्टी दी जाए। इससे टेक कंपनियों की लागत बढ़ने और क्रिएटर्स को नई कमाई मिलने की संभावना है।
AI Content Royalty Rules: भारत में AI कंपनियों के कामकाज को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। सरकारी पैनल के एक प्रस्ताव के तहत गूगल, ओपनएआई और मेटा जैसी कंपनियों को AI मॉडल की ट्रेनिंग में इस्तेमाल होने वाले भारतीय कंटेंट के बदले क्रिएटर्स को भुगतान करना पड़ सकता है। अभी कंपनियां फेयर यूज के तहत मुफ्त में डेटा का इस्तेमाल करती हैं। यह प्रस्ताव इसलिए लाया गया है क्योंकि मौजूदा ऑप्ट-आउट सिस्टम क्रिएटर्स के हितों की रक्षा करने में प्रभावी नहीं माना जा रहा।
AI ट्रेनिंग और कंटेंट रॉयल्टी का नया प्रस्ताव
सरकारी पैनल से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, कॉपीराइट होल्डर्स की ओर से यह मांग उठाई गई है कि AI कंपनियां भारतीय कंटेंट का उपयोग तो कर सकती हैं, लेकिन इसके बदले क्रिएटर्स को रॉयल्टी मिलनी चाहिए। उनका तर्क है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद लेख, वीडियो, तस्वीरें और ऑडियो कंटेंट भी बौद्धिक संपत्ति हैं, जिनका व्यावसायिक इस्तेमाल बिना भुगतान के उचित नहीं है।
पैनल का मानना है कि मौजूदा ऑप्ट-आउट सिस्टम क्रिएटर्स के लिए व्यावहारिक नहीं है। बड़े AI डेटासेट में यह पहचानना लगभग असंभव हो जाता है कि किस कंपनी ने किस क्रिएटर का कंटेंट कब और कैसे इस्तेमाल किया। इसी वजह से सीधे रॉयल्टी सिस्टम लागू करने की बात रखी गई है।

अभी क्या है भारत में नियम
मौजूदा व्यवस्था के तहत कंपनियों को यह छूट है कि वे पब्लिकली अवेलेबल डेटा का इस्तेमाल AI मॉडल की ट्रेनिंग के लिए कर सकती हैं। कंटेंट क्रिएटर्स के पास यह विकल्प जरूर होता है कि वे अपने डेटा को ट्रेनिंग से बाहर रखने के लिए 30 दिन के भीतर आपत्ति दर्ज कराएं, लेकिन यह प्रक्रिया काफी जटिल मानी जाती है।
अमेरिका जैसे देशों में इसे साफ तौर पर फेयर यूज के तहत रखा गया है, जहां कंपनियों को किसी प्रकार की रॉयल्टी नहीं देनी होती। लेकिन भारत में हालात अलग हो सकते हैं। अगर नया प्रस्ताव कानून का रूप लेता है, तो AI कंपनियों की लागत में बड़ा इजाफा तय माना जा रहा है।
टेक कंपनियों पर बढ़ेगा आर्थिक दबाव
अगर AI कंटेंट रॉयल्टी नियम लागू होता है, तो इसका असर केवल क्रिएटर्स तक सीमित नहीं रहेगा। गूगल, ओपनएआई, मेटा जैसी कंपनियों को अपने ट्रेनिंग खर्च में बड़ा बदलाव करना पड़ सकता है। इससे नए AI मॉडल बनाना पहले की तुलना में ज्यादा महंगा हो जाएगा।
फिलहाल इस प्रस्ताव पर कंपनियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इंडस्ट्री से जुड़े जानकारों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में इस मुद्दे पर तेज बहस देखने को मिल सकती है, क्योंकि यह फैसला ग्लोबल टेक इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली को भी प्रभावित कर सकता है।









