आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। मेनका गांधी के पॉडकास्ट बयान, सार्वजनिक व्यवहार और जिम्मेदारी को लेकर कोर्ट ने नाराज़गी जताते हुए संतुलित और जिम्मेदार बयान देने पर जोर दिया।
New Delhi: देश में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और उससे जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बेहद सख्त रुख अपनाया। अदालत ने इस मुद्दे पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी की टिप्पणियों को गंभीरता से लिया और उनके बयानों के साथ-साथ उनके सार्वजनिक व्यवहार पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने साफ कहा कि जब कोई व्यक्ति इतने संवेदनशील विषय पर सार्वजनिक मंच से बोलता है, तो उसके शब्द और हावभाव दोनों का समाज पर गहरा असर पड़ता है।
न्यायालय का मानना है कि आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों में केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि संतुलन और जिम्मेदारी के साथ बात होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत के आदेशों और टिप्पणियों को तोड़-मरोड़कर पेश करना या उनका गलत अर्थ निकालना स्वीकार्य नहीं है।
मेनका गांधी के पॉडकास्ट बयान पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मेनका गांधी द्वारा एक पॉडकास्ट में दिए गए बयानों का जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि इन टिप्पणियों में अदालत की कार्यवाही और दृष्टिकोण को लेकर जो बातें कही गईं, वे हल्की नहीं थीं। न्यायालय ने यह भी जोड़ा कि यह सिर्फ शब्दों का मामला नहीं है, बल्कि जिस अंदाज में ये बातें कही गईं, वह भी सवालों के घेरे में है।
बेंच ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि उनके बयान लाखों लोगों को प्रभावित करते हैं। खासकर तब, जब मामला आम लोगों की सुरक्षा और बच्चों-बुजुर्गों की जान से जुड़ा हो।
बॉडी लैंग्वेज पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गांधी के वकील से सीधा सवाल किया कि क्या उन्होंने अपनी मुवक्किल का वह पॉडकास्ट देखा है। कोर्ट ने पूछा कि क्या वकील ने सिर्फ बयान सुने हैं या उनकी बॉडी लैंग्वेज और बोलने के तरीके पर भी ध्यान दिया है।
अदालत ने कहा कि किसी भी सार्वजनिक बयान में यह मायने रखता है कि बात किस भाव और किस मुद्रा में कही जा रही है। कोर्ट के अनुसार, न्यायपालिका पर टिप्पणी करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि इससे आम जनता के बीच गलत संदेश जा सकता है।
अवमानना पर कोर्ट का संयम
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि मेनका गांधी के बयान अवमानना की श्रेणी में आ सकते थे। इसके बावजूद कोर्ट ने कोई सख्त कार्रवाई नहीं की। बेंच ने कहा कि यह अदालत की गरिमा और संयम है कि उसने इस मामले में आगे बढ़ने का फैसला नहीं लिया।
कोर्ट ने यह संकेत भी दिया कि संयम को कमजोरी न समझा जाए। न्यायपालिका जरूरत पड़ने पर कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटती, लेकिन हर स्थिति में संतुलन बनाए रखना भी उसकी जिम्मेदारी है।
खाना खिलाने वालों की जिम्मेदारी पर दो टूक
आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वालों की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर अपना रुख दोहराया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर किसी इलाके में कुत्तों के हमले हो रहे हैं, तो वहां बिना किसी व्यवस्था के खाना खिलाने की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह टिप्पणी किसी व्यंग्य या मजाक में नहीं की गई थी। यह पूरी गंभीरता के साथ कही गई बात है। न्यायालय का कहना था कि समाज में हर अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
पूर्व मंत्री के योगदान पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मेनका गांधी के प्रशासनिक योगदान पर भी सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि जब वे खुद पशु अधिकारों की बड़ी आवाज रही हैं और केंद्र सरकार में मंत्री भी रह चुकी हैं, तो उनके कार्यकाल में आवारा कुत्तों से जुड़ी योजनाओं के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए।
कोर्ट ने विशेष रूप से रेबीज नियंत्रण, टीकाकरण और नसबंदी जैसी योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि केवल विचारधारा काफी नहीं होती, बल्कि उन्हें जमीन पर लागू करना ज्यादा जरूरी होता है।
नसबंदी और जमीनी हकीकत
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि वैज्ञानिक तौर पर यह साबित हो चुका है कि नसबंदी से आवारा कुत्तों की आक्रामकता कम होती है। हालांकि यह भी कहा गया कि देश के अधिकांश शहरों में यह प्रक्रिया प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि योजनाएं अगर सिर्फ कागजों में रहेंगी, तो समस्या कभी खत्म नहीं होगी। स्थानीय प्रशासन और सरकारों को जमीनी स्तर पर ठोस काम करना होगा।
कोर्ट की टिप्पणियों के गलत इस्तेमाल पर चिंता
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि सुप्रीम कोर्ट की कुछ मौखिक टिप्पणियों का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। वकीलों ने अदालत को बताया कि कुछ जगहों पर कुत्तों को खाना खिलाने वालों पर हमले हो रहे हैं और हमलावर कोर्ट की बातों का हवाला दे रहे हैं।
इस पर बेंच ने स्पष्ट किया कि कानून को अपने हाथ में लेना किसी भी स्थिति में सही नहीं है। अदालत की टिप्पणियों का उद्देश्य समाधान निकालना है, न कि टकराव बढ़ाना।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि अगर आवारा कुत्तों के हमले में बच्चों या बुजुर्गों की मौत या गंभीर चोट होती है, तो राज्य सरकारों को मुआवजा देना होगा। इसके साथ ही अदालत ने यह भी संकेत दिया कि ऐसे मामलों में जिम्मेदारी तय की जाएगी और किसी को भी इससे बचने नहीं दिया जाएगा।












