मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने सोमवार (27 जुलाई) को तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत पिछले साल सितंबर में करूर भगदड़ में जान गंवाने वालों के परिवारों को ‘दया के आधार पर नौकरी’ (कंपैशनेट अपॉइंटमेंट) देने का फैसला किया गया था।
Karur Stampede Case: मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत करूर भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को दया के आधार पर सरकारी नौकरी देने का फैसला किया गया था। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक रोजगार को मुआवजे या विशेष सहायता के रूप में नहीं बांटा जा सकता और ऐसी नियुक्तियां संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।
27 जुलाई को सुनाए गए फैसले में अदालत ने सरकार के निर्णय को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के सिद्धांतों के विपरीत बताया। कोर्ट के अनुसार, सरकारी नौकरियों में समानता और सभी पात्र नागरिकों को समान अवसर सुनिश्चित करना आवश्यक है। इस फैसले को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी झटका माना जा रहा है।
अनुच्छेद 14 और 16 का हवाला
जस्टिस सी. वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल की डिवीजन बेंच ने कहा कि सरकारी नियुक्तियां तय संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत ही की जानी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार के मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान अवसर का सिद्धांत स्थापित करता है।
अदालत ने माना कि करूर त्रासदी के पीड़ित परिवारों के प्रति सहानुभूति और सहायता जरूरी है, लेकिन केवल किसी दुखद घटना के आधार पर सरकारी नौकरी देना सार्वजनिक भर्ती के स्थापित नियमों से अलग व्यवस्था बना सकता है। बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि सरकारी नौकरियां राज्य की ओर से बांटे जाने वाले विशेष लाभ नहीं हैं, बल्कि इन पर नियुक्तियां संवैधानिक ढांचे के अनुरूप होनी चाहिए।
‘ऐसी मांगों का रास्ता खुल सकता है’

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर भी चिंता जताई कि करूर मामले में विशेष नियुक्तियों को अनुमति देने से भविष्य में इसी तरह की मांगों की संख्या बढ़ सकती है। अदालत के अनुसार, यदि किसी सार्वजनिक त्रासदी में मृतकों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने को सामान्य व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो अन्य दुर्घटनाओं और आपदाओं के पीड़ित परिवार भी समान आधार पर नियुक्ति की मांग कर सकते हैं।
कोर्ट ने आतिशबाजी से जुड़े हादसों और सड़क दुर्घटनाओं जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि कई घटनाओं में पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता या अनुग्रह राशि दी जाती है, लेकिन इसे सरकारी नौकरी के अधिकार में नहीं बदला जाता। अदालत ने कहा कि ऐसी नियुक्तियों की अनुमति देने से समान परिस्थितियों वाले अन्य मामलों में भी नौकरी की मांग उठ सकती है, जिससे सार्वजनिक भर्ती की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
सरकार ने अनुच्छेद 162 के तहत शक्तियों का दिया था हवाला
तमिलनाडु सरकार ने अपने फैसले के समर्थन में संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत राज्य की प्रशासनिक शक्तियों का हवाला दिया था। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य की कार्यपालिका शक्तियों का इस्तेमाल भी संविधान की सीमाओं और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के भीतर होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारों का उपयोग करते समय समानता, निष्पक्षता और सार्वजनिक रोजगार से जुड़े संवैधानिक नियमों का पालन अनिवार्य है। इसलिए केवल प्रशासनिक शक्ति के आधार पर सरकारी नियुक्तियों के लिए अलग व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती।
पहले अस्थायी नियुक्तियों की अनुमति मिली थी
इस मामले में इससे पहले मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने सरकार को पीड़ित परिवारों को अस्थायी नियुक्ति पत्र देने की अनुमति दी थी। तब अदालत ने साफ किया था कि ये नियुक्तियां अंतिम न्यायिक फैसले के अधीन रहेंगी और इन्हें स्थायी अधिकार के रूप में नहीं माना जाएगा। इसके बाद मुख्यमंत्री विजय ने करूर में मृतकों के कुछ परिजनों को नियुक्ति पत्र सौंपे थे।
अब अंतिम फैसले में अदालत ने सरकारी आदेश को रद्द कर दिया है। इससे पहले जारी किए गए नियुक्ति पत्रों और संबंधित कर्मचारियों की स्थिति पर आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
करूर भगदड़ में 41 लोगों की हुई थी मौत
तमिलनाडु के करूर में 27 सितंबर 2025 को एक राजनीतिक जनसभा के दौरान भगदड़ मच गई थी। यह कार्यक्रम अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) से जुड़ा था। इस हादसे में 41 लोगों की मौत हुई थी और कई अन्य घायल हुए थे। घटना के बाद राज्य प्रशासन और विभिन्न जांच एजेंसियों की ओर से मामले की जांच शुरू की गई थी। करूर त्रासदी ने राजनीतिक सभाओं में भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक आयोजनों के लिए मानक प्रक्रियाओं को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी थी।











