Mayawati and Ashok Siddharth: कभी मायावती के बेहद करीबी रहे अशोक सिद्धार्थ कैसे बने सियासी विरोधी?

Mayawati and Ashok Siddharth: कभी मायावती के बेहद करीबी रहे अशोक सिद्धार्थ को पार्टी में अहम जिम्मेदारियां मिलीं, लेकिन आकाश आनंद के सियासी भविष्य को लेकर

विधायक (विधान परिषद सदस्य) से लेकर सांसद (राज्यसभा सदस्य) तक रहे अशोक सिद्धार्थ कभी बसपा प्रमुख मायावती के बेहद करीबी नेताओं में शुमार थे, लेकिन अब उनके और मायावती के बीच सियासी दूरी बढ़ गई है और वह ‘सियासी दुश्मन’ बनते नजर आ रहे हैं।

लखनऊ: बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती और अशोक सिद्धार्थ के रिश्तों में आया बदलाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय रहा है। कभी मायावती के बेहद भरोसेमंद नेताओं में गिने जाने वाले अशोक सिद्धार्थ अब पार्टी से बाहर हैं। खास बात यह है कि राजनीतिक दूरी से पहले दोनों परिवारों के बीच पारिवारिक रिश्ता भी जुड़ा हुआ था। अशोक सिद्धार्थ की बेटी डॉ. प्रज्ञा सिद्धार्थ की शादी मायावती के बड़े भतीजे आकाश आनंद से हुई थी।

अशोक सिद्धार्थ लंबे समय तक बसपा में प्रभावशाली भूमिका में रहे। मायावती ने उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने के साथ कई राज्यों में पार्टी का काम संभालने का अवसर दिया। वह विधान परिषद सदस्य (MLC) और बाद में राज्यसभा सदस्य भी रहे। हालांकि, समय के साथ पार्टी नेतृत्व और अशोक सिद्धार्थ के बीच मतभेद बढ़ते गए और आखिरकार उन्हें बसपा से निष्कासित कर दिया गया।

दिल्ली चुनाव के बाद बढ़ी दूरी

अशोक सिद्धार्थ और मायावती के बीच राजनीतिक मतभेदों का एक अहम पड़ाव दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद आया। चुनाव में बसपा के प्रदर्शन को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद पार्टी के भीतर जिम्मेदारियों और संगठनात्मक रणनीति को लेकर सवाल उठे। मायावती ने अशोक सिद्धार्थ पर पार्टी के हितों के विपरीत गतिविधियों और संगठन के भीतर गुटबाजी को बढ़ावा देने जैसे आरोप लगाए। इसके बाद उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई और उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

मायावती के इस फैसले का असर उनके भतीजे आकाश आनंद की राजनीति पर भी पड़ा। आकाश आनंद और अशोक सिद्धार्थ के बीच पारिवारिक संबंध होने के कारण यह घटनाक्रम और अधिक महत्वपूर्ण हो गया। मायावती ने बाद में आकाश आनंद की राजनीतिक भूमिका को लेकर भी सख्त रुख अपनाया।

आकाश आनंद को लेकर भी मायावती ने जताई थी नाराजगी

मायावती ने सार्वजनिक रूप से यह संकेत दिया था कि आकाश आनंद पर उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ और उनकी पत्नी का प्रभाव पार्टी के लिए उचित नहीं था। बसपा प्रमुख के अनुसार, इस प्रभाव के कारण आकाश की राजनीतिक दिशा और पार्टी के मिशन पर नकारात्मक असर पड़ रहा था। मायावती का आरोप था कि अशोक सिद्धार्थ को अपनी गलतियां सुधारने के पर्याप्त अवसर दिए गए, लेकिन पार्टी के उद्देश्य और संगठनात्मक हितों की तुलना में निजी तथा पारिवारिक हितों को प्राथमिकता दी गई। इन्हीं कारणों को उनके खिलाफ कार्रवाई के पीछे प्रमुख वजहों के तौर पर बताया गया।

सरकारी नौकरी से बसपा की राजनीति तक पहुंचे अशोक सिद्धार्थ

राजनीति में आने से पहले अशोक सिद्धार्थ सरकारी स्वास्थ्य विभाग में काम कर चुके थे। करीब 61 वर्ष की उम्र में राजनीति से संन्यास लेने की चर्चा के बीच उनके राजनीतिक सफर को भी याद किया जा रहा है। उन्होंने झांसी स्थित बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के महारानी लक्ष्मी बाई मेडिकल कॉलेज से डिप्लोमा किया था। इसके बाद उन्होंने स्वास्थ्य विभाग में नौकरी शुरू की। कन्नौज में नौकरी के दौरान वह कर्मचारी संगठन से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय हुए। इसी दौर में उनका संपर्क मायावती और बसपा से हुआ।

मायावती के कहने पर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर पूरी तरह पार्टी के लिए काम करने का फैसला किया। इसके बाद संगठन में उनकी भूमिका धीरे-धीरे मजबूत होती चली गई और वह बसपा नेतृत्व के करीबी नेताओं में शामिल हो गए।

MLC से राज्यसभा तक का सफर

अशोक सिद्धार्थ को बसपा सरकार के दौरान वर्ष 2009 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के लिए भेजा गया। उन्होंने करीब छह वर्ष तक एमएलसी के रूप में काम किया। उनका यह कार्यकाल 2015 में समाप्त हुआ। इसके बाद जुलाई 2016 में मायावती ने उन्हें राज्यसभा भेजा। इस तरह अशोक सिद्धार्थ ने राज्य की राजनीति से राष्ट्रीय स्तर की राजनीति तक अपनी पहचान बनाई। पार्टी संगठन में उनकी सक्रियता के कारण उन्हें कई राज्यों की जिम्मेदारियां भी सौंपी गईं।

हालांकि, बसपा में उनका प्रभाव लंबे समय तक कायम नहीं रह सका। पार्टी नेतृत्व के साथ बढ़ते मतभेद, संगठनात्मक विवाद और पारिवारिक रिश्तों से जुड़ी राजनीतिक परिस्थितियों ने दोनों पक्षों के बीच दूरी बढ़ा दी।

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