बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के इतिहास की कहानी में मायावती का सियासी सफर बेहद अहम रहा है। राजनीति में आने से पहले मायावती आईएएस अधिकारी बनने की तैयारी कर रही थीं। इसी दौरान उनकी मुलाकात कांशीराम से हुई, जिसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई।
Mayawati Political Journey: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और मायावती का राजनीतिक सफर भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण अध्यायों में गिना जाता है। मायावती ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत राजनीति से नहीं, बल्कि शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी से की थी। उनका लक्ष्य भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाकर सामाजिक भेदभाव के खिलाफ काम करना था। बाद में कांशीराम से मुलाकात ने उनके करियर की दिशा बदल दी और वह सक्रिय राजनीति में आ गईं।
शिक्षिका से आईएएस अभ्यर्थी तक
मायावती का जन्म 15 जनवरी 1956 को दिल्ली में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले के बादलपुर गांव से जुड़ा रहा है। उनके पिता डाक विभाग में कर्मचारी थे। परिवार की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के बीच मायावती ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कालिंदी कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की और इसके बाद बीएड किया। शिक्षण प्रशिक्षण के बाद उन्होंने दिल्ली में अध्यापन कार्य भी किया। आगे उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की और इसी दौरान भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी करने लगीं।
उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक में सामाजिक भेदभाव से जुड़े बचपन के अनुभवों का भी उल्लेख मिलता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों और लेखन ने भी उनके सामाजिक नजरिए को प्रभावित किया। मायावती के अनुसार, वह प्रशासनिक सेवा में जाकर वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए काम करना चाहती थीं।
एक भाषण से कांशीराम का ध्यान गया
मायावती के राजनीतिक जीवन में निर्णायक मोड़ 1970 के दशक के आखिर में आया। उनकी आत्मकथा में 1977 में दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम का उल्लेख मिलता है। इस कार्यक्रम में उन्होंने जाति और दलितों से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी। मायावती के भाषण की जानकारी कांशीराम तक पहुंची। कांशीराम उस समय बहुजन समाज को संगठित करने के लिए सक्रिय थे। उनके बारे में लिखी गई जीवनी में उल्लेख है कि मायावती की स्पष्टवादिता और सामाजिक मुद्दों पर उनकी समझ से प्रभावित होकर कांशीराम उनसे मिलने उनके घर पहुंचे।
कांशीराम ने मायावती को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। उनके अनुसार, प्रशासनिक अधिकारी बनने की तुलना में राजनीतिक शक्ति के माध्यम से व्यापक सामाजिक बदलाव की दिशा में काम किया जा सकता था। उन्होंने मायावती को संगठन और जनराजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित किया।
BAMCEF और DS-4 से शुरू हुआ संगठनात्मक सफर
कांशीराम के साथ जुड़ने के बाद मायावती बहुजन आंदोलन से संबंधित संगठनों में सक्रिय हुईं। वह BAMCEF और बाद में डीएस-4 से जुड़ीं। इस दौर में उन्होंने भाषणों, जनसंपर्क और संगठन निर्माण के जरिए अपनी राजनीतिक पहचान विकसित की। कांशीराम की जीवनी पर लिखे गए कार्यों में बताया गया है कि संगठन में मायावती की भूमिका धीरे-धीरे महत्वपूर्ण होती गई। इसके बाद 1984 में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी का गठन किया।

1984 में पहला चुनाव, लेकिन जीत नहीं मिली
बसपा ने गठन के बाद 1984 के लोकसभा चुनाव में पहली बार चुनावी मैदान में कदम रखा। पार्टी ने मायावती को कैराना लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। उन्हें 44,445 वोट मिले और वह चुनाव में तीसरे स्थान पर रहीं। इसके बाद मायावती ने 1985 में बिजनौर और 1987 में हरिद्वार के उपचुनावों में भी चुनाव लड़ा। उन्हें इन चुनावों में जीत नहीं मिली, लेकिन उनके वोटों में लगातार वृद्धि हुई। हरिद्वार के चुनाव में उन्हें एक लाख से अधिक वोट मिले थे।
1989 में मायावती बनीं सांसद
मायावती के राजनीतिक सफर में बड़ा बदलाव 1989 के लोकसभा चुनाव में आया। उन्होंने उत्तर प्रदेश की बिजनौर सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उन्हें 1,83,189 वोट मिले और उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार आशा चौधरी को 81,471 वोटों के अंतर से हराया। इसी चुनाव में कांशीराम ने भी अमेठी और पूर्वी दिल्ली से चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों सीटों पर उन्हें सफलता नहीं मिली। अमेठी में उनका मुकाबला राजीव गांधी से था, जबकि पूर्वी दिल्ली में वह तीसरे स्थान पर रहे।
बसपा के तीन उम्मीदवार 1989 में लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे। मायावती के अलावा पंजाब की फिल्लौर सीट से हरभजन लाकड़ा और आजमगढ़ से राम किशन विजयी हुए।
गुरु से पहले संसद पहुंचीं मायावती
इस तरह कांशीराम के साथ राजनीतिक सफर शुरू करने वाली मायावती अपने राजनीतिक गुरु से पहले लोकसभा पहुंचीं। 1989 की जीत ने उनके राष्ट्रीय राजनीतिक जीवन के एक नए चरण की शुरुआत की। इसके बाद बसपा ने उत्तर प्रदेश और पंजाब के साथ-साथ दूसरे राज्यों में भी अपना संगठन और चुनावी गतिविधियां बढ़ाईं। आने वाले वर्षों में मायावती भारतीय राजनीति की प्रमुख नेताओं में शामिल हुईं और उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती गई।











