महबूबा मुफ्ती ने पीएम मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि वह अनुच्छेद 370 का समर्थन करती हैं, इसलिए खुद को भी ‘दिमागी नक्सल’ मानती हैं। किरेन रिजिजू ने सफाई दी, जबकि कांग्रेस नेताओं ने पीएम के बयान की आलोचना की।
जम्मू-कश्मीर: जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘दिमागी नक्सल’ टिप्पणी पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। महबूबा ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 370 को बहाल करने की मांग और उसके समर्थन में खड़ी हैं, इसलिए यदि अनुच्छेद 370 का समर्थन करने वालों को ‘दिमागी नक्सल’ कहा जाता है तो वह भी इस श्रेणी में आती हैं। यह बयान स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी के लाल किले से दिए भाषण के बाद सामने आया है। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में देश को ‘दिमागी नक्सल’ विचारधारा से सतर्क रहने की जरूरत बताई थी। इसके बाद विपक्षी दलों के नेताओं ने सरकार पर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए नए शब्द गढ़ने का आरोप लगाया। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने हालांकि स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री ने विपक्षी नेताओं को व्यक्तिगत रूप से ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा था।
महबूबा मुफ्ती ने पीएम मोदी के बयान पर किया पलटवार
महबूबा मुफ्ती ने रविवार को प्रधानमंत्री की टिप्पणी का जवाब देते हुए कहा कि वह अनुच्छेद 370 के समर्थन में हैं और इस मुद्दे पर अपना रुख बदलने वाली नहीं हैं। उनके बयान का सीधा संकेत केंद्र सरकार की जम्मू-कश्मीर नीति और अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाए जाने के बाद की राजनीतिक बहस की ओर था।
महबूबा लंबे समय से जम्मू-कश्मीर को विशेष संवैधानिक दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के मुद्दे को राजनीतिक और संवैधानिक बहस का हिस्सा बनाती रही हैं। उनका कहना है कि जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को समाप्त करने का फैसला राज्य के लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।
महबूबा की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है।
किरेन रिजिजू ने दी ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने महबूबा और अन्य विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रिया पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी नेताओं को ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा था।
रिजिजू के मुताबिक, इस शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के संदर्भ में किया गया है जो माओवादी विचारधारा का समर्थन करते हैं, भारतीय संविधान को स्वीकार नहीं करते और अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं।
उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष रखा और कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी को राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ व्यक्तिगत हमला मानना सही नहीं है। रिजिजू ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को विचारधारा से जोड़ते हुए विपक्ष की आलोचना का जवाब दिया।
हालांकि, अनुच्छेद 370 के समर्थन को ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा से जोड़ने को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि संविधान के किसी प्रावधान या उसके तहत मिले अधिकारों की बहाली की मांग को माओवादी विचारधारा से जोड़ना उचित नहीं है।
लाल किले से पीएम मोदी ने क्या कहा था?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए नक्सलवाद और माओवादी हिंसा के खिलाफ सरकार की नीति पर विस्तार से बात की थी। उन्होंने कहा कि देश को ऐसी विचारधारा से सतर्क रहने की आवश्यकता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देती है।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि माओवादी सोच रखने वाले लोगों ने लंबे समय तक सत्ता के गलियारों में प्रभाव बनाया। उनके मुताबिक, कुछ लोग सरकारी समितियों और नीति निर्माण से जुड़े मंचों तक पहुंचे और वहां से सरकारी नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करते रहे।
पीएम मोदी ने नक्सलवाद को भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए लंबे समय तक बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि इस समस्या को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए और देश को इसके प्रति लगातार सतर्क रहने की जरूरत है।
नक्सल हिंसा में सुरक्षा बलों की मौत का भी जिक्र
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में नक्सलवाद और माओवादी हिंसा के कारण हुई जान-माल की क्षति का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि दशकों तक चली हिंसा ने बड़ी संख्या में युवाओं के जीवन और उनके भविष्य को प्रभावित किया।
पीएम मोदी के अनुसार, इस संघर्ष में 3,500 से अधिक पुलिसकर्मी और सुरक्षा बलों के जवानों की जान गई। उन्होंने नक्सलवाद को देश के बड़े हिस्से और बड़ी आबादी को हिंसा तथा बंदूक के जरिए प्रभावित करने वाली समस्या के रूप में पेश किया।
प्रधानमंत्री ने देश को इस विचारधारा के प्रभाव से बचाने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने पर जोर दिया। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया, जिसे लेकर अब राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है।
कांग्रेस ने पीएम मोदी के बयान को बताया खोखला
कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा।
जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि सरकार और भाजपा पहले विपक्ष या सामाजिक संगठनों की कई मांगों को अलग-अलग नकारात्मक शब्दों से जोड़कर खारिज करती रही है, लेकिन बाद में उन्हीं मुद्दों को नीति का हिस्सा बना देती है।
उन्होंने जाति जनगणना का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले जाति आधारित जनगणना की मांग को कथित तौर पर ‘अर्बन नक्सल’ सोच से जोड़कर खारिज किया गया था, लेकिन बाद में सरकार ने जाति आधारित जनगणना कराने की घोषणा की।
कांग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री की राजनीतिक शैली पर भी सवाल उठाया और आरोप लगाया कि सरकार अपने विरोधियों की मांगों को स्वीकार करने से पहले उन्हें अलग-अलग नामों से निशाना बनाती है।
पी. चिदंबरम ने भी किया था पलटवार
इस विवाद में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम भी प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया दे चुके हैं। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा था कि उन्हें ‘दिमागी नक्सली’ कहे जाने पर गर्व है।
चिदंबरम की टिप्पणी का उद्देश्य प्रधानमंत्री के शब्दों पर राजनीतिक कटाक्ष करना था। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार को असहमति रखने वाले लोगों और हिंसक माओवादी संगठनों के बीच स्पष्ट अंतर करना चाहिए।
कांग्रेस का तर्क है कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों की आलोचना करना, संविधान के प्रावधानों पर बहस करना और किसी संवैधानिक व्यवस्था को बदलने या बहाल करने की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा है।
अनुच्छेद 370 फिर बना राजनीतिक बहस का केंद्र
महबूबा मुफ्ती के बयान से अनुच्छेद 370 एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। केंद्र सरकार ने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया था और तत्कालीन राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया था।
इस फैसले का भाजपा ने राष्ट्रीय एकीकरण और समान संवैधानिक व्यवस्था की दिशा में बड़ा कदम बताते हुए समर्थन किया था। वहीं, जम्मू-कश्मीर की कई क्षेत्रीय पार्टियों और विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया।
महबूबा मुफ्ती की पार्टी भी अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग करती रही है। ऐसे में उनका यह कहना कि वह इसके समर्थन के कारण खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने को तैयार हैं, केंद्र और जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय राजनीति के बीच जारी वैचारिक मतभेद को दिखाता है।
‘दिमागी नक्सल’ पर बढ़ता राजनीतिक विवाद
प्रधानमंत्री के बयान के बाद अब भाजपा और विपक्ष के बीच इस शब्द को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भाजपा इसे माओवादी विचारधारा और संविधान-विरोधी सोच से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने वाली भाषा बता रहे हैं।
महबूबा मुफ्ती की प्रतिक्रिया ने विवाद में जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक मुद्दे को भी जोड़ दिया है। इससे बहस केवल नक्सलवाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि अनुच्छेद 370, संविधान की व्याख्या और राजनीतिक असहमति के अधिकार तक पहुंच गई है।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और विभिन्न राजनीतिक मंचों पर और उठ सकता है। खासकर जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक स्थिति और अनुच्छेद 370 को लेकर अलग-अलग दलों के रुख के कारण यह बहस राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण बनी रहने की संभावना है।












