महाराष्ट्र में बीजेपी द्वारा कांग्रेस और एआईएमआईएम के साथ गठबंधन किए जाने की खबर ने राष्ट्रीय स्तर पर सियासी हलचल मचा दी और यह मामला सुर्खियों में छा गया। गठबंधन की जानकारी सामने आते ही विपक्ष और समर्थकों, दोनों तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। यहां बेमेल गठबंधन कोई नई बात नहीं रहे, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने राजनीति के स्थापित मानदंडों को पीछे छोड़ दिया है। ठाणे जिले के अंबरनाथ और विदर्भ के अकोला जिले के अकोट नगर परिषद चुनावों में बने गठबंधनों ने यह साफ कर दिया है कि अब राजनीति में विचारधारा नहीं, बल्कि सत्ता की सुविधा और अंकगणित सबसे अहम हो गया है।
अंबरनाथ और अकोट: जहां विरोधी बने साथी
इन दोनों नगर परिषदों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। नतीजतन, ऐसे दलों ने हाथ मिला लिए जो राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर एक-दूसरे के कट्टर वैचारिक विरोधी माने जाते हैं। अंबरनाथ नगर परिषद की 59 सीटों में एकनाथ शिंदे की शिवसेना 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत से तीन सीट पीछे रह गई। सत्ता से दूर रखने के लिए BJP ने कांग्रेस और अजित पवार गुट की NCP के साथ मिलकर नगराध्यक्ष का चुनाव जीत लिया। BJP की तेजश्री करंजुले नगराध्यक्ष बनीं।
हालांकि यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं टिका। कांग्रेस के नगरसेवक BJP में चले गए, जबकि शिंदे गुट ने अजित पवार की NCP के चार नगरसेवकों और दो निर्दलीयों को अपने साथ जोड़कर बहुमत हासिल कर लिया। यह घटनाक्रम दिखाता है कि गठबंधन अब स्थायी नहीं, बल्कि अवसरवादी हो गए हैं।

अकोट में भी वही कहानी
अकोट नगर परिषद की 33 सीटों में BJP के पास 11 सीटें थीं। यहां भी सत्ता के लिए BJP, शिंदे शिवसेना, अजित पवार गुट और AIMIM एक मंच पर आ गए। BJP की माया धुले नगराध्यक्ष चुनी गईं। यह गठबंधन राष्ट्रीय राजनीति में असंभव लग सकता है, लेकिन स्थानीय सत्ता समीकरणों में यह पूरी तरह संभव हो गया।
15 जनवरी को होने वाले 29 महानगर पालिका चुनावों से पहले महाराष्ट्र का राजनीतिक नक्शा और जटिल हो गया है। कहीं BJP के नेतृत्व वाली महायुति बिखरी दिखती है, तो कहीं कांग्रेस नीत महाविकास आघाड़ी। मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई, पनवेल, पिंपरी-चिंचवड़, नागपुर और नासिक जैसे बड़े नगर निकायों में गठबंधन इतने उलझे हैं कि यह समझना मुश्किल हो गया है कि कौन किसके साथ है और कौन किसके खिलाफ।
परिवार भी साथ, विचारधारा पीछे
राजनीतिक परिवारों में भी नए समीकरण उभरे हैं। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक मंच पर नजर आ रहे हैं। अजित पवार और शरद पवार भी साथ खड़े हैं। ये गठजोड़ अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे दलों की मजबूरी को दिखाते हैं। वहीं कांग्रेस की भूमिका कई जगह सीमित होती दिख रही है। कोल्हापुर में राज ठाकरे ने उद्धव ठाकरे से दूरी बनाकर कांग्रेस, शरद पवार और शेतकरी संगठनों से हाथ मिला लिया है। यह उदाहरण बताता है कि अब गठबंधनों का आधार न तो साझा कार्यक्रम है और न ही विचारधारा—बल्कि केवल सत्ता तक पहुंच है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच 66 नगरसेवक निर्विरोध चुने गए, जिनमें से 64 सत्तारूढ़ महायुति से जुड़े हैं। यह आंकड़ा बताता है कि सत्ता पक्ष किस तरह स्थानीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए हुए है।











