मुंबई यूनिवर्सिटी के रत्नागिरी, कल्याण और सिंधुदुर्ग उप-केंद्रों में सीटों के मुकाबले बेहद कम दाखिले ने शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रत्नागिरी में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज हुई है, जबकि अन्य केंद्रों में भी छात्रों की सीमित रुचि चिंता का विषय बनी हुई है।
मुंबई यूनिवर्सिटी एडमिशन संकट: Mumbai University के रत्नागिरी, कल्याण और सिंधुदुर्ग उप-केंद्रों में 2024-25 सत्र के दौरान सीटों के मुकाबले बेहद कम छात्रों ने दाखिला लिया, जिससे उच्च शिक्षा की पहुंच और योजना की सफलता पर सवाल उठे हैं। रत्नागिरी में सिर्फ 10, कल्याण में 11 और सिंधुदुर्ग में 37 दाखिले हुए। विशेषज्ञों के अनुसार, कोर्स की प्रासंगिकता, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार के अवसरों की कमी इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं, जिनकी समीक्षा जरूरी मानी जा रही है।
रत्नागिरी केंद्र में सबसे ज्यादा गिरावट
रत्नागिरी उप-केंद्र की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बताई जा रही है। 2024-25 सत्र में यहां 120 सीटों के मुकाबले सिर्फ 10 छात्रों ने दाखिला लिया। यह आंकड़ा पिछले वर्षों की तुलना में लगातार गिरावट को दर्शाता है।
2022-23 में जहां 53 छात्रों ने एडमिशन लिया था, वहीं 2023-24 में यह संख्या घटकर 13 रह गई और अब और गिरकर 10 तक पहुंच गई है। खास बात यह है कि यह केंद्र 1989 में स्थापित हुआ था और 2004-05 से यहां पढ़ाई शुरू हुई, फिर भी छात्रों की कमी लगातार बनी हुई है।

कल्याण और सिंधुदुर्ग में भी सीमित रुचि
कल्याण केंद्र की स्थिति भी बेहतर नहीं है। यहां 120 सीटों के मुकाबले 2024-25 में केवल 11 छात्रों ने दाखिला लिया। पिछले दो वर्षों में भी यह संख्या 10 और 9 के आसपास ही रही, जिससे यह साफ है कि छात्रों की रुचि लगातार कम बनी हुई है।
सिंधुदुर्ग केंद्र में थोड़ी बेहतर स्थिति जरूर दिखती है, लेकिन यह भी संतोषजनक नहीं है। यहां 80 सीटों के मुकाबले 37 छात्रों ने दाखिला लिया है। आंकड़े बताते हैं कि छात्रों की रुचि मुख्य रूप से MSW कोर्स में है, जबकि एमएससी आईटी जैसे कोर्स में दाखिला बेहद कम या शून्य तक रहा है।
योजना पर उठे सवाल, कारणों की तलाश जरूरी
इन उप-केंद्रों में कम दाखिले से यह सवाल उठ रहा है कि आखिर छात्र इन संस्थानों से दूरी क्यों बना रहे हैं। पास के ठाणे जैसे केंद्रों में बेहतर दाखिले यह संकेत देते हैं कि समस्या केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि कोर्स, इंफ्रास्ट्रक्चर या जागरूकता से जुड़ी हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्स की प्रासंगिकता, रोजगार के अवसर और स्थानीय जरूरतों के अनुसार बदलाव न होना भी इसकी एक बड़ी वजह हो सकती है। ऐसे में विश्वविद्यालय प्रशासन को इन पहलुओं की गंभीर समीक्षा करनी होगी।










