मुजफ्फरपुर: बीमा पॉलिसी के नाम पर साइबर ठगी का शिकार हुए एक व्यक्ति को बड़ी राहत मिली है। इंश्योरेंस कंपनी के नाम पर ठगों ने पीड़ित से करीब 3 लाख रुपए की ठगी कर ली थी। शिकायत मिलने के बाद पुलिस की साइबर टीम ने तेजी से कार्रवाई करते हुए ठगी गई पूरी रकम को वापस कराने में सफलता हासिल की। महज 35 दिनों के भीतर करीब 3 लाख रुपए पीड़ित के खाते में वापस पहुंच गए।
बीमा के नाम पर होने वाली साइबर ठगी के इस मामले में ठगों ने खुद को इंश्योरेंस कंपनी से जुड़ा कर्मचारी बताकर पीड़ित से संपर्क किया था। बातचीत के दौरान उसे पॉलिसी से संबंधित जरूरी जानकारी, बोनस, रिन्यूअल या अन्य प्रक्रिया पूरी करने का झांसा दिया गया। ठगों ने अलग-अलग बहानों से पीड़ित से पैसे ट्रांसफर कराए और धीरे-धीरे रकम करीब तीन लाख रुपए तक पहुंच गई।
जब पीड़ित को इस बात का एहसास हुआ कि उसके साथ धोखाधड़ी हुई है, तब तक रकम अलग-अलग खातों में जा चुकी थी। इसके बाद उसने मामले की शिकायत पुलिस से की। शिकायत मिलने के बाद साइबर पुलिस ने बैंकिंग ट्रांजैक्शन की जानकारी जुटानी शुरू की और जिन खातों में रकम गई थी, उनके संबंध में कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई।
साइबर ठगी के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण होता है कि पीड़ित घटना के तुरंत बाद शिकायत करे। इस मामले में भी शिकायत के बाद पुलिस ने लेनदेन से जुड़ी जानकारी को ट्रैक करने का प्रयास किया। संबंधित बैंक खातों और डिजिटल ट्रांजैक्शन की जांच के जरिए रकम को रोकने और वापस कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
पुलिस की कार्रवाई के बाद करीब 35 दिनों में पीड़ित की पूरी रकम वापस मिल गई। रकम वापस मिलने के बाद पीड़ित ने राहत की सांस ली। उसके लिए यह राशि काफी महत्वपूर्ण थी और ठगी के बाद उसे आर्थिक नुकसान के साथ मानसिक परेशानी का भी सामना करना पड़ा था।
बीमा के नाम पर साइबर ठगी का यह तरीका नया नहीं है। साइबर अपराधी अक्सर लोगों को फोन करके खुद को इंश्योरेंस कंपनी का अधिकारी, एजेंट या पॉलिसी विभाग का कर्मचारी बताते हैं। इसके बाद वे पॉलिसी बंद होने, बोनस मिलने, रिफंड, रिन्यूअल, अतिरिक्त लाभ या किसी पुराने बीमा रिकॉर्ड को अपडेट करने के नाम पर पैसे मांगते हैं।
कई बार ठग पीड़ित को यह भी बताते हैं कि यदि उसने तुरंत भुगतान नहीं किया तो उसकी पॉलिसी बंद हो जाएगी या जमा राशि वापस नहीं मिलेगी। इसी डर और जल्दबाजी का फायदा उठाकर वे पीड़ित से बैंक ट्रांसफर, UPI या अन्य डिजिटल माध्यमों से पैसे भेजवा लेते हैं।
इस मामले में भी ठगों ने इंश्योरेंस कंपनी के नाम का इस्तेमाल कर पीड़ित का भरोसा जीतने की कोशिश की। बातचीत को वास्तविक दिखाने के लिए साइबर अपराधी कई तरह की जानकारियां भी रखते हैं। इससे सामने वाले व्यक्ति को लगता है कि फोन करने वाला वास्तव में कंपनी से जुड़ा हुआ है।
साइबर पुलिस की ओर से लोगों को लगातार सलाह दी जाती है कि किसी भी अनजान फोन कॉल पर बीमा पॉलिसी से जुड़ी रकम जमा न करें। यदि कोई व्यक्ति फोन करके पॉलिसी रिन्यू कराने, बोनस दिलाने या पैसा वापस कराने के नाम पर भुगतान मांगता है तो पहले संबंधित इंश्योरेंस कंपनी के आधिकारिक माध्यम से इसकी पुष्टि करनी चाहिए।
किसी भी परिस्थिति में OTP, UPI PIN, ATM PIN, इंटरनेट बैंकिंग पासवर्ड या कार्ड से जुड़ी गोपनीय जानकारी किसी अनजान व्यक्ति के साथ साझा नहीं करनी चाहिए। बैंक या बीमा कंपनी का अधिकारी बनकर फोन करने वाला व्यक्ति यदि ऐसी जानकारी मांगता है तो यह ठगी का संकेत हो सकता है।
इस घटना में रकम वापस मिलने से यह भी सामने आया कि साइबर ठगी के बाद तुरंत कार्रवाई करने से पैसे वापस मिलने की संभावना बढ़ सकती है। डिजिटल लेनदेन में समय रहते शिकायत मिलने पर संबंधित बैंक खाते या ट्रांजैक्शन को रोकने की कोशिश की जा सकती है।
ठगी के बाद कई लोग शर्म या डर के कारण पुलिस से शिकायत करने में देरी कर देते हैं। इससे ठगों को रकम दूसरे खातों में भेजने या निकालने का मौका मिल जाता है। इसलिए साइबर अपराध होने पर तुरंत शिकायत करना जरूरी है।
मुजफ्फरपुर के इस मामले में 35 दिनों के भीतर रकम वापस कराना पुलिस की कार्रवाई के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पुलिस ने लेनदेन से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड और बैंकिंग प्रक्रिया के माध्यम से रकम की रिकवरी सुनिश्चित करने का प्रयास किया।
रकम वापस आने के बाद पीड़ित को आर्थिक राहत मिली है, लेकिन घटना ने एक बार फिर यह चेतावनी दी है कि बीमा के नाम पर होने वाली ठगी से लोगों को सावधान रहने की जरूरत है। खासकर ऐसे फोन कॉल, मैसेज और लिंक से बचना चाहिए जिनमें तुरंत भुगतान करने का दबाव बनाया जाए।
साइबर अपराधी कई बार फर्जी वेबसाइट या फर्जी दस्तावेज का भी इस्तेमाल करते हैं। वे पीड़ित को ऐसी वेबसाइट पर भेज सकते हैं जो देखने में किसी बड़ी इंश्योरेंस कंपनी की वेबसाइट जैसी लगती है। वहां पॉलिसी नंबर, मोबाइल नंबर या अन्य जानकारी भरवाकर आगे भुगतान कराने की कोशिश की जाती है।
कई मामलों में ठग पहले छोटी रकम मांगते हैं और बाद में अलग-अलग शुल्क के नाम पर ज्यादा पैसे लेते जाते हैं। कभी GST, कभी प्रोसेसिंग फीस, कभी रिफंड शुल्क और कभी पॉलिसी क्लोजर चार्ज के नाम पर रकम मांगी जाती है। जब तक पीड़ित को वास्तविकता समझ आती है, तब तक बड़ी राशि ठगी जा चुकी होती है।
मुजफ्फरपुर में सामने आए इस मामले में भी करीब तीन लाख रुपए की ठगी हुई थी। पीड़ित के लिए यह बड़ा आर्थिक नुकसान था। समय पर शिकायत के बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया और रकम वापस कराने की दिशा में काम किया।
पुलिस के लिए साइबर ठगी की रकम वापस कराना आसान नहीं होता, क्योंकि पैसा कुछ ही मिनटों में कई बैंक खातों के जरिए आगे ट्रांसफर किया जा सकता है। इसके बावजूद बैंकिंग चैनल में रकम को ट्रैक करके उसे रोकने की कोशिश की जाती है। इस प्रक्रिया में बैंक, साइबर पुलिस और संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण होता है।
इस मामले में भी इसी तरह की प्रक्रिया के जरिए रकम की रिकवरी की गई। 35 दिनों की कार्रवाई के बाद पीड़ित को उसके करीब तीन लाख रुपए वापस मिले। इससे पीड़ित परिवार को बड़ी राहत मिली।
साइबर ठगी से बचने के लिए लोगों को यह समझना जरूरी है कि बीमा पॉलिसी से संबंधित कोई भी जरूरी काम केवल कंपनी के आधिकारिक कार्यालय, अधिकृत एजेंट या आधिकारिक वेबसाइट और हेल्पलाइन के जरिए ही किया जाए। फोन पर अचानक संपर्क करने वाले व्यक्ति के कहने पर भुगतान करना जोखिम भरा हो सकता है।
यदि कोई व्यक्ति खुद को इंश्योरेंस कंपनी का कर्मचारी बताता है तो उसका नाम, पद और कंपनी की जानकारी लेकर खुद कंपनी के आधिकारिक नंबर पर संपर्क कर पुष्टि करनी चाहिए। कॉल करने वाले व्यक्ति द्वारा दिए गए नंबर पर वापस फोन करने के बजाय कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट या दस्तावेज पर मौजूद नंबर का इस्तेमाल करना सुरक्षित होता है।
लोगों को अपने बैंक खाते में होने वाले लेनदेन पर भी नजर रखनी चाहिए। यदि कोई अनजान ट्रांजैक्शन दिखाई देता है तो बैंक को तुरंत सूचित करना चाहिए। मोबाइल में आने वाले संदिग्ध SMS और ईमेल में दिए लिंक को खोलने से भी बचना चाहिए।
बीमा पॉलिसी के नाम पर ठगी के मामलों में अक्सर पीड़ित को डराकर या लालच देकर जल्द फैसला लेने के लिए मजबूर किया जाता है। ठग जानते हैं कि यदि व्यक्ति को सोचने या कंपनी से पुष्टि करने का समय मिल गया तो धोखाधड़ी पकड़ी जा सकती है। इसलिए वे फोन पर तुरंत भुगतान का दबाव बनाते हैं।
ऐसे किसी भी फोन कॉल में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। यदि सामने वाला व्यक्ति कहता है कि कुछ मिनट में भुगतान नहीं किया तो पॉलिसी बंद हो जाएगी या पैसा जब्त हो जाएगा, तो यह लाल झंडा हो सकता है।
मुजफ्फरपुर का यह मामला उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो पुरानी बीमा पॉलिसी, बोनस या रिफंड से जुड़े फोन कॉल प्राप्त करते हैं। किसी भी तरह की रकम देने से पहले संबंधित कंपनी से जानकारी की पुष्टि करना बेहद जरूरी है।
पुलिस की ओर से भी साइबर अपराध को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। लोगों को साइबर ठगी के अलग-अलग तरीकों के बारे में जानकारी दी जा रही है, ताकि वे अपराधियों के जाल में न फंसें।
इस मामले में पीड़ित को पूरी रकम वापस मिलना राहत की बात है। हालांकि पुलिस की कार्रवाई के साथ-साथ आम लोगों की जागरूकता भी साइबर अपराध रोकने में महत्वपूर्ण है। डिजिटल भुगतान जितना सुविधाजनक हुआ है, साइबर अपराधियों ने उतने ही नए तरीके भी विकसित किए हैं।
यदि किसी व्यक्ति के साथ साइबर ठगी हो जाए तो उसे तुरंत संबंधित बैंक को जानकारी देने के साथ साइबर अपराध की आधिकारिक शिकायत दर्ज करनी चाहिए। जितनी जल्दी शिकायत की जाएगी, उतनी जल्दी ट्रांजैक्शन को रोकने या रकम को फ्रीज कराने की कोशिश की जा सकती है।
इस घटना से यह संदेश भी मिलता है कि ठगी होने के बाद चुप बैठना समाधान नहीं है। तुरंत शिकायत करने पर रकम की रिकवरी की संभावना बनी रहती है। हालांकि हर मामले में पूरी रकम वापस मिले, यह जरूरी नहीं है, इसलिए शुरुआत से ही सावधानी सबसे बेहतर बचाव है।
मुजफ्फरपुर में बीमा कंपनी के नाम पर करीब तीन लाख रुपए की ठगी का शिकार हुए व्यक्ति को 35 दिनों बाद पूरी रकम वापस मिल गई। पुलिस की कार्रवाई से पीड़ित को राहत मिली है। वहीं घटना ने लोगों को एक बार फिर चेताया है कि बीमा पॉलिसी के नाम पर फोन करने वाले अनजान लोगों पर भरोसा करने और किसी भी तरह का भुगतान करने से पहले पूरी तरह सत्यापन करना जरूरी है।












