मुजफ्फरपुर में साइबर अपराधियों ने ठगी का ऐसा तरीका अपनाया, जिसने एक परिवार को करीब तीन दिनों तक डर और तनाव में रखा। कंपाउंडर की पत्नी को कथित तौर पर पाकिस्तानी नंबर से वीडियो कॉल किया गया। कॉल करने वाले लोगों ने खुद को किसी जांच या कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा बताकर महिला पर लगातार दबाव बनाया और उसे करीब 72 घंटे तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ की स्थिति में रहने के लिए मजबूर किया। इस दौरान महिला को बाहर किसी से संपर्क करने, मामले की जानकारी दूसरों को देने या सामान्य तरीके से स्थिति से बाहर निकलने का मौका नहीं दिया गया। साइबर अपराधियों ने भय का ऐसा माहौल बनाया कि महिला उनकी बातों को सच मानती रही और अंत में उसके साथ 3.14 लाख रुपये की आर्थिक ठगी हो गई।
मामले में ठगी का तरीका इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि जिस नंबर से वीडियो कॉल की गई, उसकी प्रोफाइल पर थलापति विजय की तस्वीर लगी थी। साइबर अपराधियों द्वारा अक्सर किसी चर्चित व्यक्ति, पुलिस अधिकारी, सरकारी अधिकारी या किसी संस्थान की तस्वीर को प्रोफाइल फोटो के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य सामने वाले व्यक्ति के मन में भरोसा या डर पैदा करना होता है। इस मामले में भी प्रोफाइल फोटो का इस्तेमाल महिला को प्रभावित करने और कॉल को गंभीर तथा आधिकारिक दिखाने के लिए किया गया प्रतीत होता है। हालांकि किसी मोबाइल नंबर की प्रोफाइल फोटो या उसमें इस्तेमाल की गई पहचान से यह साबित नहीं होता कि कॉल वास्तव में उसी व्यक्ति ने की थी।
ठगों ने महिला को वीडियो कॉल के जरिए अपने नियंत्रण में रखने का तरीका अपनाया। डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का ऐसा तरीका है, जिसमें अपराधी पुलिस, सीबीआई, ईडी, नारकोटिक्स विभाग, कस्टम या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बनकर लोगों को फोन करते हैं। उन्हें बताया जाता है कि उनके नाम से कोई आपत्तिजनक सामान मिला है, उनके बैंक खाते का इस्तेमाल किसी अपराध में हुआ है या उनके खिलाफ कोई गंभीर शिकायत दर्ज है। इसके बाद गिरफ्तारी का डर दिखाकर उन्हें वीडियो कॉल पर बने रहने और निर्देशों का पालन करने के लिए कहा जाता है। कई मामलों में ठग पीड़ित को यह भी बताते हैं कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक वह घर से बाहर नहीं निकल सकता और किसी अन्य व्यक्ति से इस बारे में बात नहीं कर सकता।
मुजफ्फरपुर के इस मामले में भी कथित तौर पर इसी तरह का दबाव बनाया गया। महिला को लगातार डराए जाने के कारण वह साइबर अपराधियों के जाल में फंसती चली गई। 72 घंटे तक चलने वाली इस कथित डिजिटल निगरानी के दौरान अपराधियों ने महिला के मन में यह डर बनाए रखा कि अगर उसने उनकी बात नहीं मानी तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। ऐसे मामलों में अपराधी बातचीत के दौरान पुलिस की भाषा, कानूनी धाराओं और जांच एजेंसियों के नाम का इस्तेमाल करते हैं, जिससे आम व्यक्ति को स्थिति वास्तविक लगने लगती है।
साइबर ठगों का सबसे बड़ा हथियार तकनीकी जानकारी से ज्यादा मानसिक दबाव होता है। वे पीड़ित को अचानक फोन करते हैं और कुछ ही मिनटों में ऐसी कहानी तैयार कर देते हैं जिसमें सामने वाले व्यक्ति को खुद को किसी अपराध से जुड़ा हुआ समझने का डर पैदा हो जाता है। इसके बाद उसे सोचने या परिवार के किसी सदस्य से सलाह लेने का समय नहीं दिया जाता। वीडियो कॉल पर लगातार निगरानी का माहौल बनाया जाता है और कहा जाता है कि कॉल काटने या किसी से बात करने पर मामला और गंभीर हो जाएगा। इसी डर के कारण कई लोग अपने बैंक खाते, एटीएम, मोबाइल और दूसरी आर्थिक जानकारियों तक अपराधियों को उपलब्ध करा देते हैं।
इस मामले में 3.14 लाख रुपये की ठगी बताती है कि अपराधियों ने महिला को केवल डराया ही नहीं, बल्कि आर्थिक नुकसान तक पहुंचाया। रकम किस तरीके से और किन खातों में भेजी गई, इसकी पूरी जानकारी जांच का हिस्सा हो सकती है। ऐसे मामलों में पुलिस आम तौर पर बैंक ट्रांजेक्शन, खाते के लाभार्थी, मोबाइल नंबर, कॉल डिटेल, व्हाट्सऐप अकाउंट, आईपी एड्रेस, डिवाइस और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच करती है। अगर रकम तुरंत रिपोर्ट की जाए तो कुछ परिस्थितियों में संबंधित बैंकिंग चैनल के माध्यम से लेनदेन को रोकने या रकम को फ्रीज कराने की कोशिश भी की जा सकती है।
इस घटना से लोगों के लिए सबसे बड़ी सीख यह है कि किसी भी वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस या सरकारी अधिकारी बताने वाले व्यक्ति पर तुरंत भरोसा नहीं करना चाहिए। भारत में कोई भी वैध पुलिस या जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल के जरिए इस तरह ‘डिजिटल अरेस्ट’ करके घर में कैद रहने या ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर करने का आदेश नहीं देती। यदि कोई व्यक्ति गिरफ्तारी, मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स, पार्सल, बैंक खाते या किसी आपराधिक मामले का भय दिखाकर पैसे मांग रहा है, तो यह साइबर ठगी का बड़ा संकेत हो सकता है।
किसी नंबर पर किसी बड़े अधिकारी, नेता, अभिनेता या सरकारी संस्था की तस्वीर लगी होना भी उसकी वास्तविक पहचान की गारंटी नहीं है। सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर प्रोफाइल फोटो आसानी से बदली जा सकती है। ठग इसी कमजोरी का फायदा उठाते हैं। वे कभी पुलिस की वर्दी में दिखाई देते हैं, कभी किसी जांच एजेंसी का लोगो लगाते हैं और कभी किसी चर्चित व्यक्ति की तस्वीर का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए केवल वीडियो कॉल पर दिखाई दे रही वर्दी, आईडी कार्ड, बैकग्राउंड या प्रोफाइल फोटो देखकर किसी की पहचान पर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है।
मुजफ्फरपुर की घटना यह भी बताती है कि साइबर अपराध अब केवल लिंक भेजकर या ओटीपी पूछकर पैसे निकालने तक सीमित नहीं रह गया है। अपराधी लोगों के मनोविज्ञान को समझकर अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं। कहीं पुलिस अधिकारी बनकर डराया जाता है, कहीं रिश्तेदार बनकर मदद मांगी जाती है और कहीं बैंक या कुरियर कंपनी का कर्मचारी बनकर जानकारी हासिल की जाती है। डिजिटल अरेस्ट इसी बदलते साइबर अपराध का एक खतरनाक रूप है, जिसमें आर्थिक नुकसान से पहले पीड़ित को मानसिक रूप से कमजोर किया जाता है।
ऐसे किसी कॉल की स्थिति में सबसे जरूरी है कि घबराकर पैसे ट्रांसफर न किए जाएं। कॉल करने वाले व्यक्ति से बहस करने के बजाय फोन काटकर संबंधित विभाग या स्थानीय पुलिस के आधिकारिक नंबर पर खुद संपर्क करना चाहिए। किसी भी हालत में बैंक पासवर्ड, यूपीआई पिन, ओटीपी, कार्ड की जानकारी या इंटरनेट बैंकिंग से जुड़ी संवेदनशील जानकारी किसी अनजान व्यक्ति को नहीं देनी चाहिए। यदि पैसे का लेनदेन हो चुका है तो तुरंत बैंक को सूचना देने के साथ साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराना जरूरी है। भारत में साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की स्थिति में 1930 हेल्पलाइन पर तत्काल शिकायत की जा सकती है।
मुजफ्फरपुर के इस मामले में कथित तौर पर 72 घंटे तक महिला को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर दबाव में रखना और फिर 3.14 लाख रुपये की ठगी करना साइबर अपराधियों के बढ़ते दुस्साहस को दिखाता है। मामले में इस्तेमाल नंबर, प्रोफाइल फोटो, वीडियो कॉल, पैसों के लेनदेन और अपराधियों की वास्तविक पहचान की जांच के बाद ही पूरी तस्वीर साफ हो सकेगी। फिलहाल इस तरह की घटनाएं आम लोगों के लिए स्पष्ट चेतावनी हैं कि किसी भी अनजान वीडियो कॉल पर दिखाई देने वाली पहचान को वास्तविक न मानें और गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर पैसे मांगने वाले व्यक्ति से बेहद सावधान रहें।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई वैध कानूनी प्रक्रिया नहीं है, जिसके तहत पुलिस किसी नागरिक को वीडियो कॉल पर घर में बैठे रहने और पैसे भेजने के लिए मजबूर करे। हाल के मामलों में साइबर अपराधी इसी फर्जी अवधारणा का इस्तेमाल करके लोगों को मानसिक रूप से नियंत्रित कर रहे हैं। मुजफ्फरपुर में कंपाउंडर की पत्नी से हुई 3.14 लाख रुपये की ठगी इसी तरह के कथित साइबर फ्रॉड की गंभीरता को सामने लाती है।












