नेपाल-तिब्बत सीमा पर सैलाब से 350 से ज्यादा मौतें, दूसरी बाढ़ का खतरा

नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर टूटने से आई बाढ़ में 350 से ज्यादा मौतें हुई हैं और 1,300 से अधिक लोग लापता हैं। बैरियर झील टूटने से दूसरी बाढ़ का खतरा बढ़ा है।

नेपाल-तिब्बत सीमा पर विनाशकारी फ्लैश फ्लड में 350 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 1,300 से अधिक लोग लापता हैं। ग्लेशियर टूटने से आई बाढ़ ने गांव, सड़कें और पुल बहा दिए। अब बैरियर झील से दूसरी बाढ़ का खतरा है।

काठमांडू: नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने हिमालयी क्षेत्र में भारी तबाही मचा दी है। ताजा अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र को मिलाकर मृतकों की संख्या 350 से ऊपर पहुंच गई है, जबकि 1,300 से ज्यादा लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। नेपाल के कई जिलों में गांव, सड़कें और पुल बह गए हैं, जबकि तिब्बत के ग्यिरोंग इलाके में भी बाढ़ और मलबे ने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है। मृतकों और लापता लोगों के आंकड़ों में अलग-अलग एजेंसियों के बीच अंतर है, क्योंकि बचाव अभियान अभी जारी है।

इस आपदा ने अब एक नई चिंता पैदा कर दी है। अधिकारियों और विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ऊपरी इलाके में मलबे और पानी से बनी एक बैरियर झील टूटने पर दूसरी बाढ़ आ सकती है। काठमांडू पोस्ट के अनुसार इस झील में करीब 20 लाख घन मीटर पानी जमा है और अगले कुछ दिनों में इसमें अतिरिक्त पानी आने की आशंका है।

ग्लेशियर के टूटने से शुरू हुई तबाही

शुरुआती घंटों में इस प्राकृतिक आपदा को भूकंप से जोड़कर देखा गया था, लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी USGS के विश्लेषण ने बाद में तस्वीर साफ की। वैज्ञानिकों के अनुसार 5.2 तीव्रता का जो भूकंपीय संकेत दर्ज हुआ था, वह किसी सामान्य भूकंप का परिणाम नहीं था। यह ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने और उसके बाद चट्टानों, बर्फ तथा मलबे के तेज बहाव से पैदा हुआ भूकंपीय प्रभाव था।

विशेषज्ञों के अनुसार, बर्फ और चट्टान का विशाल हिस्सा पहाड़ी ढलान से नीचे गिरा और नदी तंत्र में पहुंच गया। इससे पानी का बहाव अचानक बेहद तेज हो गया। मलबे के साथ बहते पानी ने अपने रास्ते में आने वाले घरों, वाहनों, पुलों और दूसरी संरचनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया।

नेपाल के कई जिलों में तबाही

नेपाल का रासुवा जिला इस आपदा का प्रमुख केंद्र रहा, लेकिन बाढ़ का असर निचले इलाकों तक पहुंचा। बोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र के आसपास नुवाकोट समेत कई जिलों में भारी नुकसान की खबरें हैं। नदियों के किनारे बसे इलाकों में पानी और मलबे ने घरों को घेर लिया, जबकि कई सड़क मार्ग और पुल टूट गए।

काठमांडू पोस्ट के अनुसार, रासुवा से नीचे नुवाकोट, धादिंग, चितवन, तनाहुन, गोरखा और नवलपरासी ईस्ट तक बाढ़ के असर और मलबे से नुकसान की जानकारी सामने आई है। बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं और कई परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है।

ग्यिरोंग बॉर्डर पोर्ट भी मलबे में घिरा

तिब्बत के ग्यिरोंग बॉर्डर पोर्ट पर भी इस आपदा का जबरदस्त असर पड़ा। निगरानी कैमरों से सामने आए वीडियो में पानी और कीचड़ की दीवार जैसी लहरों को सीमा क्षेत्र की इमारतों और सड़कों की ओर बढ़ते देखा गया। कुछ फुटेज में लोग जान बचाने के लिए तेजी से भागते हुए नजर आए।

ग्यिरोंग लंबे समय से नेपाल और तिब्बत के बीच व्यापार और पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण मार्ग रहा है। यह क्षेत्र कैलाश-मानसरोवर यात्रा और दोनों देशों के बीच आवागमन के लिहाज से भी अहम है। बाढ़ से यहां की परिवहन व्यवस्था और सीमा अवसंरचना को बड़ा झटका लगा है।

1,300 से ज्यादा लोग लापता

आपदा के बाद सबसे बड़ी चुनौती लापता लोगों का पता लगाना है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में नेपाल और तिब्बत के प्रभावित क्षेत्रों से 1,300 से ज्यादा लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। इनमें स्थानीय लोगों के अलावा विदेशी नागरिक, पर्यटक और तीर्थयात्री भी शामिल हैं। हालांकि, आंकड़े लगातार बदल रहे हैं और अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के रिकॉर्ड में अंतर है।

नेपाल में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों के लापता होने की भी जानकारी सामने आई है। सीमा क्षेत्र में उस समय कई पर्यटक और कैलाश-मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्री मौजूद थे। कई देशों के नागरिकों से संपर्क टूटने की वजह से उनके परिवारों में चिंता बढ़ गई है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा पर पड़ा असर

नेपाल-तिब्बत सीमा से जुड़ा यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण है। कैलाश पर्वत और मानसरोवर की यात्रा करने वाले तीर्थयात्री अक्सर इस क्षेत्र से होकर गुजरते हैं। बाढ़ से सड़क मार्ग, पुल और सीमा चौकियां क्षतिग्रस्त होने के कारण यात्रा मार्ग प्रभावित हुए हैं।

AP की रिपोर्ट के अनुसार लापता लोगों में 100 से अधिक कैलाश-मानसरोवर तीर्थयात्री शामिल हो सकते हैं। भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा समेत कई देशों के नागरिकों के प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है।

दूसरी बाढ़ का खतरा क्यों बढ़ा?

पहली बाढ़ से तबाही के बाद सबसे बड़ी चिंता अब संभावित दूसरी बाढ़ को लेकर है। ऊपरी हिस्से में मलबे से नदी का रास्ता अवरुद्ध होने के कारण पानी जमा हो रहा है। इससे एक बैरियर झील जैसी स्थिति बनी है।

चीनी अधिकारियों के मुताबिक, इस झील में करीब 20 लाख घन मीटर पानी जमा है और आने वाले तीन दिनों में करीब 30 लाख घन मीटर अतिरिक्त पानी इसमें पहुंच सकता है। यदि प्राकृतिक अवरोध टूटता है, तो जमा पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है और पहले से प्रभावित इलाकों में एक और बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।

यही वजह है कि नदी के निचले हिस्सों में रहने वाले लोगों के लिए खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है। प्रशासन को राहत अभियान के साथ-साथ संभावित दूसरी आपदा के लिए भी तैयारी करनी पड़ रही है।

राहत और बचाव अभियान में बढ़ी चुनौती

भारी नुकसान के कारण बचाव दलों को प्रभावित इलाकों तक पहुंचने में कठिनाई हो रही है। सड़कें टूटने और पुल बह जाने से कई स्थानों पर जमीनी संपर्क बाधित हुआ है। ऐसे में हेलीकॉप्टरों के जरिए राहत सामग्री पहुंचाने और लोगों को निकालने की कोशिश की जा रही है।

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने 27 अगस्त को बाढ़ प्रभावित नुवाकोट के बिदुर क्षेत्र का दौरा किया। उन्होंने स्थानीय प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और जनप्रतिनिधियों से नुकसान और राहत कार्यों की जानकारी ली। प्रधानमंत्री ने विस्थापित परिवारों को तत्काल सहायता, बंद सड़कों को खोलने और क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को जल्द बहाल करने के निर्देश दिए।

अस्पतालों और राहत सेवाओं पर दबाव

बड़ी संख्या में घायल लोगों और विस्थापित परिवारों के कारण स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ गया है। दूरदराज के इलाकों में चिकित्सा सहायता पहुंचाना भी मुश्किल है। प्रशासन को एक साथ घायलों का इलाज, लापता लोगों की तलाश और सुरक्षित निकासी का काम करना पड़ रहा है।

इस आपदा में सिर्फ पानी ही खतरा नहीं है। भारी मलबा, टूटे पहाड़, अस्थिर ढलान और नदी के बदलते रास्ते बचावकर्मियों के लिए भी जोखिम पैदा कर रहे हैं। ऐसे में खोज अभियान बेहद सावधानी के साथ चलाया जा रहा है।

वैज्ञानिकों ने बढ़ते हिमालयी खतरे पर चेताया

वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय तेजी से गर्म हो रहा है और ग्लेशियरों की अस्थिरता बढ़ रही है। इससे बर्फ, चट्टान और पानी से जुड़ी संयुक्त आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों ने इस घटना को एक जटिल या कंपाउंड आपदा के रूप में देखा है, जिसमें ग्लेशियर का टूटना, मलबे का बहाव, नदी का अवरोध और अचानक बाढ़ एक-दूसरे से जुड़े रहे।

हालांकि, विशेषज्ञ इस तरह की किसी एक घटना को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताने से बचने की सलाह देते हैं। फिर भी बढ़ते तापमान से ग्लेशियरों और पर्वतीय ढलानों की स्थिरता प्रभावित होने की चिंता लगातार बढ़ रही है।

पहले भी हुआ है ऐसा खतरा

नेपाल-तिब्बत सीमा और हिमालयी इलाकों में पिछले वर्षों में भी ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़ और मलबे की घटनाएं सामने आती रही हैं। जुलाई 2025 में तिब्बत से निकली बाढ़ ने नेपाल के रासुवा क्षेत्र में भारी नुकसान किया था और कई लोगों की मौत हुई थी। इस इतिहास ने मौजूदा आपदा के बाद भविष्य के खतरे को लेकर चिंता और बढ़ा दी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल आपदा के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं होगा। ऊंचाई वाले इलाकों में ग्लेशियर, झीलों और नदी मार्गों की निगरानी के लिए आधुनिक सेंसर, सैटेलाइट आधारित चेतावनी प्रणाली और स्थानीय स्तर पर बेहतर आपदा तैयारी की जरूरत है।

टूटे पुल और सड़कें बनीं सबसे बड़ी बाधा

बाढ़ ने कई प्रमुख पुल और सड़क मार्ग बहा दिए हैं। इससे राहत सामग्री पहुंचाने के साथ-साथ लापता लोगों की तलाश भी प्रभावित हो रही है। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को कई किलोमीटर लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ रहा है।

इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान सिर्फ तत्काल राहत में बाधा नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय व्यापार और पर्यटन पर भी असर डाल सकता है। ग्यिरोंग बॉर्डर पोर्ट और नेपाल-तिब्बत संपर्क मार्ग इस मामले में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

परिवारों को अपनों की खबर का इंतजार

सबसे दर्दनाक स्थिति उन परिवारों की है जिनके सदस्य अभी तक लापता हैं। नेपाल और तिब्बत के कई इलाकों में संचार बाधित होने के कारण परिवारों को अपने परिजनों के बारे में जानकारी मिलने में देरी हो रही है।

विदेशी नागरिकों के लापता होने से कई देशों की सरकारें और दूतावास भी स्थानीय प्रशासन के संपर्क में हैं। परिवारों को अब खोज और बचाव अभियानों से किसी सुरक्षित बरामदगी की खबर का इंतजार है।

दूसरी बाढ़ की आशंका के बीच चुनौती बढ़ी

पहली आपदा के बाद भी जोखिम खत्म नहीं हुआ है। ऊपर बनी बैरियर झील और नदी में जमा मलबे के कारण आने वाले दिनों में स्थिति और बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। यदि अवरोध टूटता है तो अचानक पानी का बड़ा बहाव फिर नीचे के क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए प्रशासन के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ मलबे में फंसे और लापता लोगों को तलाशना, दूसरी ओर संभावित दूसरी बाढ़ से आबादी को सुरक्षित रखना।

हिमालय के लिए बड़ी चेतावनी

नेपाल-तिब्बत सीमा की यह आपदा सिर्फ एक स्थानीय प्राकृतिक त्रासदी नहीं है। यह तेजी से बदलते हिमालयी पर्यावरण, ग्लेशियरों की अस्थिरता और पहाड़ी इलाकों में बढ़ते आपदा जोखिम की गंभीर याद दिलाती है।

दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल हिमालय में लाखों लोग नदियों और घाटियों के आसपास रहते हैं। ऐसे में ग्लेशियरों की निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित निर्माण और सीमा पार आपदा प्रबंधन सहयोग भविष्य के नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

फिलहाल राहत और बचाव अभियान जारी है। मृतकों और लापता लोगों की संख्या में बदलाव संभव है, क्योंकि कई इलाकों तक बचाव दल अभी पूरी तरह नहीं पहुंच पाए हैं। सबसे बड़ी प्राथमिकता अब जीवित बचे लोगों को तलाशना, विस्थापित परिवारों को राहत देना और संभावित दूसरी बाढ़ से निचले इलाकों को सुरक्षित रखना है।

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