पीएम मोदी के UAE दौरे से पहले ईरान के विदेश मंत्री का भारत दौरा: होर्मुज संकट के बीच कूटनीतिक हलचल तेज

पश्चिम एशिया तनाव के बीच ईरानी विदेश मंत्री भारत दौरे पर आ रहे हैं। BRICS बैठक में होर्मुज संकट, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर अहम चर्चा संभव है।

पश्चिम एशिया तनाव के बीच ईरानी विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अरागची भारत दौरे पर आ सकते हैं। BRICS बैठक में होर्मुज संकट और ऊर्जा सुरक्षा पर चर्चा होगी। भारत की कूटनीतिक संतुलन नीति इस दौरे में अहम भूमिका निभाएगी।

तेहरान: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की चिंताओं के बीच ईरान के विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अरागची का भारत दौरा रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगामी UAE दौरे और BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक को लेकर भी कूटनीतिक गतिविधियां तेज हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर डाल सकता है।

BRICS बैठक में ईरान की रणनीतिक सक्रियता

सूत्रों के अनुसार, ईरान के विदेश मंत्री 14–15 मई को नई दिल्ली में होने वाली BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा ले सकते हैं। ईरान 2024 में BRICS समूह का सदस्य बना था और अब वह इस मंच का उपयोग पश्चिम एशिया संकट और क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर समर्थन जुटाने के लिए करना चाहता है।

ईरान का रुख स्पष्ट है कि वह उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ मिलकर वैश्विक प्रतिबंधों, ऊर्जा संकट और क्षेत्रीय संघर्षों पर सामूहिक आवाज उठाना चाहता है।

भारत की “संतुलनकारी कूटनीति” की परीक्षा

भारत के लिए यह दौरा एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक परीक्षा माना जा रहा है। एक तरफ भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक ऊर्जा और व्यापारिक संबंध हैं, वहीं दूसरी तरफ खाड़ी देशों, विशेष रूप से UAE, सऊदी अरब और अन्य सहयोगियों के साथ भी मजबूत रणनीतिक साझेदारी है।

भारत ने अब तक पश्चिम एशिया संघर्ष में किसी सैन्य गुट का समर्थन नहीं किया है और लगातार संवाद, स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा पर जोर दिया है।

होर्मुज जलडमरूमध्य और ऊर्जा सुरक्षा की चिंता

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। क्षेत्र में किसी भी प्रकार का तनाव सीधे तौर पर तेल की कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकता है।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, ऐसे में यह मार्ग उसकी आर्थिक सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान और भारत के बीच बातचीत इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए अहम भूमिका निभा सकती है।

भारत-ईरान संबंधों में उतार-चढ़ाव

हाल के वर्षों में भारत और ईरान के संबंधों में कई उतार-चढ़ाव देखे गए हैं। अमेरिका-ईरान तनाव, क्षेत्रीय संघर्ष और कुछ घटनाओं ने दोनों देशों के बीच संवाद को प्रभावित किया है।

हालांकि, दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग अभी भी जारी है। ईरान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार रहा है, जबकि भारत भी ईरान के लिए एशियाई बाजारों तक पहुंच का प्रमुख माध्यम माना जाता है।

UAE दौरे और भारत की पश्चिम एशिया रणनीति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आगामी UAE दौरा भी इस पूरे परिदृश्य में अहम माना जा रहा है। 18 मई को वे नीदरलैंड्स जाते समय अबू धाबी में रुक सकते हैं।

यह दौरा भारत और UAE के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों को और मजबूत कर सकता है। दोनों देश मिलकर एक महत्वपूर्ण ट्रेड रूट—गुजरात-फुजैराह-अकाबा कॉरिडोर—पर काम कर सकते हैं, जो वैश्विक व्यापार को नया आकार देने की क्षमता रखता है।

ईरान का BRICS पर भरोसा

BRICS में शामिल होने के बाद ईरान अब खुद को वैश्विक मंच पर अलग-थलग नहीं दिखाना चाहता। वह चाहता है कि रूस, भारत, चीन और अन्य सदस्य देश मिलकर पश्चिम एशिया में स्थिरता और आर्थिक संतुलन की दिशा में भूमिका निभाएं।

ईरान का मानना है कि विकासशील देशों को मिलकर प्रतिबंधों और क्षेत्रीय संघर्षों पर सामूहिक रुख अपनाना चाहिए।

भारत की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?

भारत की स्थिति इस समय बेहद संवेदनशील लेकिन प्रभावशाली है। वह न तो किसी गुट का हिस्सा बनकर टकराव बढ़ाना चाहता है और न ही अपने ऊर्जा हितों से समझौता करना चाहता है।

इसलिए भारत की नीति संवाद, संतुलन और कूटनीतिक लचीलापन पर आधारित है, जो उसे इस पूरे क्षेत्र में एक “स्टेबलाइजर” की भूमिका में रखती है।

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