पश्चिम एशिया संकट का असर: पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका, आरबीआई गवर्नर ने दी चेतावनी

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। इसके चलते पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।

वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनावों का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। ज्यूरिख में आयोजित International Monetary Fund और Swiss National Bank के 12वें उच्च-स्तरीय सम्मेलन में Sanjay Malhotra ने इस पर अहम बयान दिया।

बिजनेस न्यूज़: वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर पश्चिम एशिया में जारी संकट, अब भारत की आर्थिक स्थिति पर भी असर डालने लगा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और स्विस नेशनल बैंक द्वारा आयोजित एक उच्च-स्तरीय सम्मेलन में संकेत दिया कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में जारी तेजी और आपूर्ति बाधाएं लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी तय मानी जा सकती है।

उन्होंने कहा कि सरकार अब तक उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए ईंधन कीमतों को स्थिर बनाए रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन वैश्विक हालात लगातार दबाव बढ़ा रहे हैं। ऐसे में स्थिति लंबे समय तक अपरिवर्तित रखना कठिन हो सकता है।

सरकार पर बढ़ता वित्तीय दबाव

आरबीआई गवर्नर के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत सरकार ने अब तक घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखा है। इसके लिए टैक्स संरचना में समायोजन और कुछ हद तक सब्सिडी जैसे उपाय अपनाए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में राजकोषीय अनुशासन बनाए रखते हुए वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है, जो महामारी के दौरान बढ़कर 9 प्रतिशत से अधिक हो गया था और अब घटकर लगभग 4 प्रतिशत के आसपास आ गया है। हालांकि, वैश्विक तेल संकट इस स्थिरता के लिए नई चुनौती पैदा कर सकता है।

भारत की ऊर्जा निर्भरता और जोखिम

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए पश्चिम एशिया रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। आरबीआई गवर्नर ने बताया कि देश के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है। भारत के आयात-निर्यात का लगभग एक-छठा हिस्सा इस क्षेत्र से संबंधित है. विदेशों से आने वाले रेमिटेंस का करीब 40% हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है. उर्वरक आयात में लगभग 40% निर्भरता इसी क्षेत्र पर है।

प्राकृतिक गैस आपूर्ति का लगभग 60% हिस्सा भी इस क्षेत्र से जुड़ा है. ऐसे में किसी भी प्रकार की राजनीतिक अस्थिरता या युद्ध जैसी स्थिति भारत की सप्लाई चेन और ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित करती है।

महंगाई पर सीधा असर संभव

कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव घरेलू महंगाई पर पड़ता है। भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी लगभग 40% होने के कारण, ईंधन महंगाई का असर अन्य वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी होने पर परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे खाद्य पदार्थों से लेकर औद्योगिक उत्पादों तक सभी पर महंगाई का दबाव बनता है।

आरबीआई गवर्नर ने यह भी स्वीकार किया कि केवल मौद्रिक नीति के जरिए आपूर्ति आधारित झटकों से निपटना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में सरकार और केंद्रीय बैंक दोनों को मिलकर संतुलित नीति अपनानी होगी। यदि वैश्विक तनाव और तेल आपूर्ति में बाधाएं बढ़ती हैं, तो इसका असर केवल ईंधन कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह व्यापक आर्थिक स्थिरता को भी प्रभावित कर सकता है।

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