छत्तीसगढ़ के बस्तर में सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान राहत शिविर में रह रहे चार आदिवासी परिवारों की 127 एकड़ जमीन हड़पने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें राशन और मकान का झांसा देकर अंगूठे लगवाए गए, और उन्हीं दस्तावेजों से उनकी पैतृक जमीन किसी और के नाम कर दी गई।
बस्तर, छत्तीसगढ़: सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान विस्थापित हुए ग्रामीण जब भैरमगढ़ के गोदामपारा राहत शिविर में रह रहे थे, तब उनकी करीब 127 एकड़ जमीन कथित रूप से फर्जीवाड़े से बेची गई। ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने कभी किसी रजिस्ट्री दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं किए, बल्कि उन्हें सरकारी मदद का लालच देकर कागजों पर अंगूठे लगवाए गए। बाद में उन्हीं दस्तावेजों का उपयोग करके यह जमीन 2011-12 में एक व्यापारी के कर्मचारी संजय और उसकी पत्नी कुनिका सरका के नाम कर दी गई। तहसीलदार सूर्यकांत घरत ने बताया कि अब तक 15 लोगों को नोटिस जारी किए जा चुके हैं और चार संबंधित व्यक्तियों की मौत हो चुकी है। जांच जारी है और प्रशासन ने फर्जी जमीन हस्तांतरण की इस गड़बड़ी की तह तक जाने की बात कही है।
“राशन और मकान का झांसा देकर लगवाए अंगूठे”
बस्तर के भैरमगढ़ क्षेत्र में ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान राहत शिविर में पटवारियों ने उन्हें राशन और मकान का झांसा देकर दस्तावेजों पर अंगूठे लगवाए। ग्रामीण घस्सू राम और पिला राम ने बताया कि वे अनपढ़ थे और उन्हें यह तक नहीं पता था कि किन कागजों पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं। बाद में पता चला कि उन्हीं दस्तावेजों से उनकी पुश्तैनी 127 एकड़ जमीन किसी और के नाम कर दी गई। अब ग्रामीण जांच और अपनी जमीन वापस मिलने की मांग कर रहे हैं।
जांच के घेरे में जमीन हड़पने की साजिश
भैरमगढ़ तहसील में जमीन हड़पने के इस चौंकाने वाले मामले ने प्रशासन को भी सतर्क कर दिया है। तहसीलदार सूर्यकांत घरत ने बताया कि अब तक 15 लोगों को नोटिस जारी किए जा चुके हैं। जांच में सामने आया है कि लेनदेन से जुड़े चार लोगों की पहले ही मृत्यु हो चुकी है, जिससे मामला और जटिल हो गया है। अधिकारियों का कहना है कि जांच निष्पक्ष तरीके से पूरी की जाएगी और दोषियों पर कार्रवाई तय है।
खरीदारों ने दी सफाई, चेक से भुगतान का दावा
दूसरी ओर, जमीन के खरीदारों ने प्रशासन के समक्ष अपने पक्ष में जवाब पेश किया है। उन्होंने दावा किया है कि पूरी रकम चेक के माध्यम से दी गई थी और खरीद प्रक्रिया वैध थी। हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कभी सौदा किया ही नहीं। ऐसे में अब तहसील प्रशासन सभी दस्तावेजों और हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच कराने की तैयारी में है ताकि यह तय हो सके कि जमीन हस्तांतरण असली था या फर्जीवाड़ा।










