मराठा इतिहास के महानायक छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरगाथा पर आधारित फिल्म ‘राजा शिवाजी’ को दर्शकों से भावनात्मक रूप से मजबूत प्रतिक्रिया मिल रही है, लेकिन तकनीकी और कथात्मक स्तर पर इसे औसत बताया जा रहा है।
- फिल्म रिव्यू: राजा शिवाजी
- स्टार रेटिंग: 3/5
- पर्दे पर: 01/05/2026
- डायरेक्टर: रितेश देशमुख
- शैली: हिस्टॉरिकल ड्रामा
एंटरटेनमेंट न्यूज़: Chhatrapati Shivaji Maharaj भारतीय इतिहास में सिर्फ एक राजा नहीं, बल्कि स्वराज्य और पराक्रम के प्रतीक के रूप में देखे जाते हैं। उनकी वीरता, रणनीति और स्वतंत्र राज्य की स्थापना के प्रति समर्पण ने उन्हें पीढ़ियों तक प्रेरणा का स्रोत बनाया है। इसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को बड़े पर्दे पर उतारने का प्रयास Riteish Deshmukh ने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म Raja Shivaji के जरिए किया है।
यह प्रोजेक्ट उनके लिए एक लंबे समय से संजोया हुआ सपना रहा है, जिसे उन्होंने वर्षों की मेहनत के बाद खुद निर्देशित और निर्मित किया है। मराठी सिनेमा में शिवाजी महाराज को अक्सर एक सांस्कृतिक नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, और इस फिल्म से भी दर्शकों की अपेक्षाएं काफी ऊंची हैं।
कहानी: स्वराज्य की प्रेरक गाथा
फिल्म की कहानी 17वीं शताब्दी के उस दौर में सेट है जब भारत विभिन्न शासकों और विदेशी आक्रमणों के प्रभाव में था। कहानी का केंद्र शिवाजी महाराज का बचपन और उनके भीतर स्वतंत्रता की भावना का विकास है, जिसे उनकी माता जीजाबाई ने आकार दिया। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, शिवाजी महाराज तोरणा, कोंढाणा और पुरंदर जैसे किलों को जीतकर स्वराज्य की नींव रखते हैं।
फिल्म का मुख्य टर्निंग पॉइंट तब आता है जब अफजल खान से उनका ऐतिहासिक संघर्ष दिखाया जाता है, जो कहानी का सबसे भावनात्मक और महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है। यह फिल्म केवल युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि कूटनीति, नेतृत्व और त्याग का भी चित्रण करती है।
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अभिनय: कुछ दमदार, कुछ कमजोर
फिल्म में रितेश देशमुख ने शिवाजी महाराज की भूमिका निभाई है। उनके अभिनय में कई जगह भावनात्मक गहराई और ऊर्जा दिखती है, लेकिन कुछ दृश्यों में वे अपने पुराने स्टाइल में लौटते नजर आते हैं। जेनेलिया डिसूजा ने महारानी सईबाई की भूमिका निभाई है, लेकिन उनका मराठी उच्चारण कई जगह कमजोर महसूस होता है। वहीं विद्या बालन का किरदार सीमित स्क्रीन टाइम के कारण प्रभाव नहीं छोड़ पाता।
सबसे मजबूत प्रदर्शन संजय दत्त का रहा है, जिन्होंने अफजल खान के रूप में दमदार और प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। उनकी आवाज और स्क्रीन प्रेज़ेंस किरदार को वास्तविक बनाती है।
निर्देशन: बड़ा विजन, लेकिन अनुभव की कमी
रितेश देशमुख का विजन स्पष्ट रूप से बड़ा है। वे फिल्म को एक लार्जर-दे-लाइफ ऐतिहासिक अनुभव बनाना चाहते हैं, लेकिन निर्देशन में अनुभव की कमी कई जगह दिखाई देती है। फिल्म कई बार टीवी-ड्रामा जैसी लगती है, जहां संवाद और भावनाएं जरूरत से ज्यादा नाटकीय हो जाती हैं। हालांकि क्लाइमैक्स को उन्होंने प्रभावी ढंग से संभाला है, जो फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा माना जा सकता है।
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी सह्याद्रि पहाड़ियों और किलों को खूबसूरती से दिखाती है, लेकिन कलर टोन और एडिटिंग में असमानता दिखती है। बैकग्राउंड स्कोर औसत है, लेकिन संगीत जोड़ी अजय-अतुल का काम फिल्म को ऊंचाई देता है। उनके बनाए गीत और शिवाजी महाराज का थीम संगीत दर्शकों में जोश भर देता है। हालांकि VFX और एक्शन सीक्वेंस में आधुनिक और पुरानी तकनीक का मिश्रण फिल्म को असंतुलित बनाता है।
कमजोरियां: लंबाई और एडिटिंग बड़ी समस्या
फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी लंबाई और धीमी एडिटिंग है। तीन घंटे से ज्यादा की अवधि कई जगहों पर खिंची हुई महसूस होती है। कई दृश्य बिना ट्रांजिशन के आगे बढ़ते हैं, जिससे कहानी की निरंतरता टूटती है। कुछ एक्शन सीन प्रभावशाली होने के बावजूद लॉजिक और संरचना की कमी से कमजोर पड़ जाते हैं।
‘राजा शिवाजी’ एक ऐसी फिल्म है जो तकनीकी पूर्णता से ज्यादा भावनाओं पर आधारित है। इसमें कई खामियां हैं—कहानी कहने का असंतुलन, एडिटिंग की कमजोरी और कुछ ओवरड्रामैटिक दृश्य। लेकिन जब भी स्क्रीन पर शिवाजी महाराज का स्वराज्य और उनका साहस दिखता है, फिल्म अपनी कमियों से ऊपर उठ जाती है।








