Akka Review: महिलाओं के राज में खून और सत्ता की लड़ाई, कीर्ति सुरेश-राधिका आप्टे की सीरीज कितनी दमदार?

कीर्ति सुरेश और राधिका आप्टे की वेब सीरीज 'अक्का' में महिलाओं का राज, सत्ता की लड़ाई और खूनखराबे की कहानी है। जानें कैसी है कहानी, एक्टिंग और निर्देशन।

कीर्ति सुरेश और राधिका आप्टे की वेब सीरीज 'अक्का' 30 अक्टूबर को नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो गई है। महिलाओं की सत्ता, पुरानी दुश्मनी और बदले की कहानी पर बनी इस सीरीज में दमदार अभिनय है, लेकिन कहानी की कुछ कमजोरियां भी हैं।

  • Movie Review: अक्का
  • कलाकार: कीर्ति सुरेश , राधिका आप्टे , तन्वी आजमी , मोनिका पंवार , अंशुमान पुष्कर , विशाक नायर , महेश मांजरेकर , छाया कदम , बी. जयश्री , निवेदिता भार्गव और पूर्णिमा इंद्रजीत
  • लेखक: धर्मराज शेट्टी
  • निर्देशक: धर्मराज शेट्टी
  • निर्माता: यशराज फिल्म्स एंटरटेनमेंट
  • रिलीज डेट: 30 अक्तूबर
  • रेटिंग: 3.5/5

Akka Review: अगर किसी शहर में सदियों से सिर्फ महिलाओं का शासन हो और अपराध की दुनिया के फैसले भी वही लेती हों, तो वहां सत्ता की लड़ाई कैसी होगी? नेटफ्लिक्स की नई वेब सीरीज 'अक्का' इसी कल्पना पर बनी है। कीर्ति सुरेश, राधिका आप्टे और तन्वी आजमी की इस सीरीज में परिवार, विरासत और बदले की कहानी दिखाई गई है। धर्मराज शेट्टी के निर्देशन में बनी यह क्राइम थ्रिलर अपनी अलग दुनिया से ध्यान खींचती है, लेकिन क्या कहानी भी उतनी ही असरदार है?

कहानी: जहां बेटियों को मिलती है गद्दी, बेटों का नहीं चलता जोर

'अक्का' की कहानी 1985 के पेरनुरु शहर की है। यह दक्षिण भारत का एक काल्पनिक शहर है, जहां करीब 800 साल से महिलाओं की हुकूमत चली आ रही है। यहां राज करने वाली महिला को अक्का कहा जाता है। उसके बाद गद्दी पर उसकी बेटी बैठती है। बेटों को सत्ता में हिस्सा नहीं दिया जाता। शहर के बड़े फैसले हों या अपराध का कारोबार, हर जगह महिलाओं की चलती है।

पेरनुरु तीन इलाकों मल्लेमार, हेरकाडा और पेरप्लाडी में बंटा हुआ है। इन इलाकों के परिवारों में कई पीढ़ियों से दुश्मनी चली आ रही है। येरुमा और कठवा समुदायों का पुराना इतिहास भी इस लड़ाई से जुड़ा है। कहानी आगे बढ़ने पर पता चलता है कि यहां सत्ता हासिल करना जितना मुश्किल है, उसे बचाए रखना उससे भी बड़ी चुनौती है।

तन्वी आजमी ने मुत्थाका का किरदार निभाया है, जिसका शहर में काफी दबदबा है। उसके बाद भवानी (कीर्ति सुरेश) पर परिवार की विरासत संभालने की जिम्मेदारी आती है। वहीं मुंबई से पेरनुरु पहुंची रुद्रा (राधिका आप्टे) किसी के बनाए नियमों पर चलने को तैयार नहीं है। वह अपनी जगह खुद बनाना चाहती है। भवानी अपने परिवार की सत्ता बचाने में लगी है, जबकि रुद्रा पुराने तौर-तरीकों को चुनौती देती है। दोनों के बीच शुरू हुई अनबन आगे चलकर खून-खराबे और बदले तक पहुंच जाती है।

कहानी की शुरुआत अच्छी है। महिलाओं के राज वाली यह दुनिया देखने में भी अलग लगती है। परेशानी तब आती है, जब एक साथ कई परिवारों और उनके पुराने झगड़ों की बातें सामने आने लगती हैं। कौन किससे नाराज है और किसकी दुश्मनी कितनी पुरानी है, इसे समझने में थोड़ा वक्त लगता है। कुछ किरदार अचानक ऐसे फैसले ले लेते हैं, जिनकी वजह कहानी ठीक से नहीं बताती।

अभिनय: कीर्ति सुरेश ने संभाली कमान, राधिका आप्टे भी पीछे नहीं

भवानी के किरदार में कीर्ति सुरेश का काम अच्छा है। उनका किरदार ज्यादा बोलने के बजाय अपने व्यवहार से रौब दिखाता है। चेहरे पर सख्ती और बातचीत में ठहराव रखकर कीर्ति अपने किरदार को मजबूत बनाती हैं। उनके कपड़े और चलने-बोलने का तरीका भी उस दुनिया के हिसाब से रखा गया है, जहां एक महिला के फैसले से पूरे परिवार का भविष्य तय होता है।

राधिका आप्टे ने रुद्रा का किरदार निभाया है। रुद्रा किसी से दबने वाली महिला नहीं है। उसे जो बात गलत लगती है, वह सामने कह देती है। राधिका ने उसके गुस्से और बगावती तेवर को अच्छे से निभाया है। हालांकि उन्हें ऐसे किरदारों में पहले भी देखा जा चुका है, इसलिए इस बार उनका अंदाज बहुत अलग नहीं लगता।

तन्वी आजमी मुत्थाका के किरदार में अच्छी लगी हैं। उन्हें देखकर लगता है कि उनका किरदार लंबे समय से सत्ता संभालता आया है। उनका बोलने का तरीका और चेहरे के भाव इस भूमिका के साथ जंचते हैं। मुत्थाका के युवा दिनों को मोनिका पंवार ने निभाया है और वह भी अपनी भूमिका में ध्यान खींचती हैं।

अंशुमान पुष्कर, विशाक नायर, महेश मांजरेकर और छाया कदम भी सीरीज का हिस्सा हैं। सभी ने अपने हिस्से का काम ठीक किया है, लेकिन कुछ किरदारों को कहानी में ज्यादा जगह नहीं मिल पाई। उनकी पिछली जिंदगी और आपसी रिश्तों के बारे में थोड़ा और दिखाया जाता, तो कई घटनाओं को समझना आसान होता।

Akka Review: महिलाओं के राज में खून और सत्ता की लड़ाई, कीर्ति सुरेश-राधिका आप्टे की सीरीज कितनी दमदार?

निर्देशन: शहर की दुनिया अच्छी बनाई, कहानी कहीं-कहीं उलझी

'अक्का' का लेखन और निर्देशन धर्मराज शेट्टी ने किया है। उन्होंने ऐसा शहर दिखाने की कोशिश की है, जहां पुरुषों के बजाय महिलाएं सत्ता चलाती हैं। शहर के मकान, बाजार और लोगों के पहनावे में पुराने दौर की झलक मिलती है। इन चीजों पर मेहनत की गई है। सीरीज में 'अंकम' नाम की एक परंपरा भी है। इसके तहत अलग-अलग घरानों के लोग अपना हक साबित करने के लिए खूनी मुकाबले में उतरते हैं। ऐसे दृश्य कहानी में तनाव बढ़ाते हैं और बताते हैं कि पेरनुरु में ताकत और सम्मान के लिए लोग किस हद तक जा सकते हैं।

लेकिन कहानी सुनाने का तरीका हर जगह उतना अच्छा नहीं रहा। कुछ घटनाएं इतनी जल्दी आगे बढ़ती हैं कि दर्शक उनके पीछे की वजह समझने से पहले ही अगले मोड़ पर पहुंच जाते हैं। मुत्थाका के परिवार के बारे में काफी कुछ बताया गया है, जबकि बाकी घरानों को समझने का उतना मौका नहीं मिलता।

सीरीज की शूटिंग, सेट और कपड़ों पर किया गया काम पर्दे पर नजर आता है। बैकग्राउंड म्यूजिक भी लड़ाई और तनाव वाले दृश्यों में अच्छा असर छोड़ता है। फिर भी कई जगह कहानी की उलझन देखने का मजा कम कर देती है।

Akka Review: सीरीज देखने में मजा आएगा या नहीं?

अगर आपको गैंगस्टर ड्रामा, परिवारों की पुरानी दुश्मनी और सत्ता के लिए होने वाली लड़ाई पर बनी कहानियां पसंद हैं, तो 'अक्का' देख सकते हैं। यहां एक अलग बात यह है कि लड़ाई के केंद्र में पुरुष नहीं, बल्कि महिलाएं हैं। कीर्ति सुरेश और राधिका आप्टे के आमने-सामने आने वाले दृश्य भी देखने लायक हैं। हालांकि, सीरीज देखते समय किरदारों और उनके रिश्तों पर ध्यान देना पड़ता है। कहानी में कई मोड़ आते हैं, लेकिन हर मोड़ उतना असर नहीं छोड़ता। कुछ जगह लगता है कि घटनाओं को थोड़ा समय देकर दिखाया जाता, तो बात ज्यादा अच्छी तरह समझ आती।

'अक्का' में कलाकारों ने अपना काम अच्छे से किया है और पर्दे पर दिखाई गई दुनिया भी दिलचस्प है। कमी इसकी कहानी कहने के तरीके में रह जाती है। जिन दर्शकों को अलग तरह की क्राइम थ्रिलर पसंद हैं, वे इसे मौका दे सकते हैं।

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