राजस्थान निकाय चुनाव 2026: जोधपुर में सबसे ज्यादा मतदान, जयपुर में सबसे कम; उदयपुर में 12% उछाल

राजस्थान के 309 शहरी निकायों में चुनावी मतदान पूरा हो गया। दूसरे चरण में 147 निकायों में 71.69% वोटिंग हुई। प्रमुख निगमों में जोधपुर 71.95% के साथ आगे रहा,

राजस्थान के 309 शहरी निकायों में चुनावी मतदान पूरा हो गया। दूसरे चरण में 147 निकायों में 71.69% वोटिंग हुई। प्रमुख निगमों में जोधपुर 71.95% के साथ आगे रहा, जबकि जयपुर में 63.55% मतदान हुआ और उदयपुर में करीब 12 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई।

जयपुर: राजस्थान में शहरी निकाय चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण का मतदान शुक्रवार को पूरा हो गया। इसके साथ ही राज्य के सभी 309 शहरी निकायों में वोटिंग की प्रक्रिया समाप्त हो गई। दूसरे चरण में 147 नगर निकायों में शाम 6 बजे तक 71.69% मतदान दर्ज किया गया। इस चरण में जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर और पाली समेत प्रमुख नगर निगमों में मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। कई निकायों में मतदान के पुराने आंकड़े भी पीछे छूटे।

दूसरे चरण के आंकड़ों में धोरीमन्ना नगर पालिका सबसे आगे रही, जहां 91.60% मतदान हुआ। वहीं प्रमुख नगर निगमों में जोधपुर में सबसे ज्यादा 71.95% और जयपुर में सबसे कम 63.55% वोटिंग दर्ज की गई। पिछले निकाय चुनाव की तुलना में उदयपुर में करीब 12 प्रतिशत, जोधपुर में 11 प्रतिशत और जयपुर में करीब 5 प्रतिशत मतदान बढ़ा है।

इससे पहले 9 सितंबर को पहले चरण में 162 शहरी निकायों में मतदान हुआ था, जिसमें औसत मतदान 76.41% रहा था। दोनों चरणों के प्रमुख नगर निगमों की तुलना में भरतपुर नगर निगम में सबसे अधिक 73.68% मतदान दर्ज किया गया।

अब मतदान खत्म होने के बाद राजनीतिक दल वोटिंग प्रतिशत के आधार पर अपने-अपने समीकरणों का आकलन कर रहे हैं। खासतौर पर जोधपुर और उदयपुर में पिछले चुनाव के मुकाबले मतदान में हुई बड़ी बढ़ोतरी ने राजनीतिक दलों का ध्यान खींचा है।

जयपुर: बढ़े मतदान से बीजेपी और कांग्रेस दोनों को उम्मीद

राजधानी जयपुर में इस बार 63.55% मतदान हुआ। पिछले चुनाव में जयपुर को दो नगर निगमों—हेरिटेज और ग्रेटर—में बांटा गया था। दोनों निगमों का औसत मतदान करीब 57.5% रहा था। इस लिहाज से इस बार मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई है।

बीजेपी इस बढ़े हुए मतदान को अपने पक्ष में संभावित संकेत के तौर पर देख रही है। पार्टी के सामने प्रदेश की सत्ता में होने का फायदा भी है। वहीं कांग्रेस का मानना है कि सरकार और स्थानीय प्रतिनिधियों के कामकाज को लेकर मतदाताओं में असंतोष ने मतदान बढ़ाया हो सकता है।

जयपुर में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का सांगानेर, उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी का विद्याधर नगर, मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ का झोटवाड़ा और वरिष्ठ विधायक कालीचरण सराफ का मालवीय नगर विधानसभा क्षेत्र शामिल है। चुनाव प्रचार के दौरान इन नेताओं की सक्रियता भी चर्चा में रही। इस बार जयपुर में 150 वार्डों के लिए चुनाव हुआ, जबकि पिछली बार दो निगमों को मिलाकर कुल 250 वार्ड थे। बीजेपी इसी बदलाव और सत्ता में होने के समीकरण को अपने लिए सकारात्मक मान रही है।

कांग्रेस ने कई नए चेहरों को मैदान में उतारा। पार्टी नेताओं का दावा है कि युवाओं और खासतौर पर नई पीढ़ी में सरकार को लेकर असंतोष का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है। वालसिटी में मुस्लिम उम्मीदवारों की मौजूदगी को भी कांग्रेस अपने पारंपरिक समर्थन आधार से जोड़कर देख रही है।

पिछली बार क्या हुआ था?

2020 में जयपुर को हेरिटेज और ग्रेटर नगर निगम में बांटकर चुनाव कराया गया था। हेरिटेज में 58.31% और ग्रेटर में 57.82% मतदान हुआ था। हेरिटेज के 100 वार्डों में कांग्रेस ने 47, बीजेपी ने 42 और निर्दलीयों ने 11 वार्ड जीते थे।

ग्रेटर में 150 में से बीजेपी ने 88 वार्ड जीतकर बोर्ड बनाया था। बाद में हेरिटेज की मेयर मुनेश गुर्जर को भ्रष्टाचार के मामले में पद से हटाए जाने के बाद बीजेपी ने आठ कांग्रेस पार्षदों के समर्थन से वहां भी बोर्ड बना लिया था।

जोधपुर: 11% से ज्यादा बढ़ी वोटिंग, बदले समीकरण

जोधपुर में इस बार 71.95% मतदान हुआ, जो प्रमुख नगर निगमों में सबसे ज्यादा है। पिछली बार दो नगर निगमों में औसत मतदान करीब 60.7% था। इस बार एक ही निगम के लिए चुनाव होने और मतदान में 11 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।

जोधपुर की राजनीति में केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है। मतदान बढ़ने के बाद दोनों प्रमुख दल अपने-अपने समर्थन आधार का आकलन कर रहे हैं।

पिछली बार बीजेपी-कांग्रेस के पास था एक-एक बोर्ड

2020 में जोधपुर को उत्तर और दक्षिण नगर निगम में बांटकर चुनाव कराया गया था। उत्तर में 62.64% और दक्षिण में 58.76% मतदान हुआ था। उत्तर के 80 वार्डों में कांग्रेस ने 53 सीटें जीतकर बोर्ड बनाया था।

दक्षिण में बीजेपी ने 80 में से 43 वार्ड जीते थे और बोर्ड बनाया था। कांग्रेस को 23 और निर्दलीयों को 14 वार्ड मिले थे। इस बार दोनों निगमों के स्थान पर एक निगम होने से पुराना राजनीतिक गणित बदल गया है।

कोटा: 67.66% मतदान, बीजेपी-कांग्रेस में फिर मुकाबला

कोटा में इस बार 67.66% मतदान हुआ, जो पिछले चुनाव की तुलना में 1.89 प्रतिशत अधिक है। यहां मतदान प्रतिशत में बहुत बड़ा उछाल नहीं आया, लेकिन पिछले चुनाव की तरह इस बार भी बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला माना जा रहा है।

पिछली बार कोटा को उत्तर और दक्षिण नगर निगम में बांटा गया था और दोनों जगह कांग्रेस ने बोर्ड बनाया था। इस बार एक निगम होने के कारण बीजेपी पर बोर्ड हासिल करने का दबाव है।

बीजेपी बढ़े मतदान को अपने पक्ष में मान रही है और सत्ता में होने तथा संगठन की एकजुटता को अपनी ताकत बता रही है। कांग्रेस का दावा है कि स्थानीय समस्याओं को लेकर मतदाताओं में नाराजगी है, जिसका लाभ उसे मिल सकता है।

पिछली बार निर्दलीयों ने बदला था खेल

2020 में कोटा उत्तर में कांग्रेस ने 70 में से 47 वार्ड जीते थे, जबकि बीजेपी को 14 सीटें मिली थीं। दक्षिण में बीजेपी ने 36, कांग्रेस ने 30 और निर्दलीयों ने 14 वार्ड जीते। कांग्रेस ने निर्दलीयों के समर्थन से बोर्ड बनाया था।

उदयपुर: करीब 12% बढ़ा मतदान, बीजेपी का गढ़ फिर चर्चा में

उदयपुर में इस बार 69.77% मतदान हुआ। यह पिछले चुनाव के 57.81% के मुकाबले करीब 12 प्रतिशत अधिक है। मतदान में इतनी बड़ी बढ़ोतरी ने राजनीतिक दलों का ध्यान खींचा है।

बीजेपी उदयपुर को अपना मजबूत आधार मानती है और बढ़े मतदान को सकारात्मक संकेत बता रही है। कांग्रेस का तर्क है कि शहरी समस्याओं और स्थानीय मुद्दों को लेकर लोगों में असंतोष है, इसलिए इस बार अधिक मतदाता मतदान करने पहुंचे।

पिछली बार बीजेपी ने दर्ज की थी बड़ी जीत

पिछले चुनाव में उदयपुर के 70 वार्डों में बीजेपी ने 44 वार्ड जीतकर बोर्ड बनाया था। कांग्रेस को 20 वार्ड मिले थे। मतदान केवल 57.81% रहने के बावजूद बीजेपी ने स्पष्ट बढ़त हासिल की थी।

अजमेर: मतदान पिछली बार से कम, फिर भी बीजेपी आश्वस्त

अजमेर में इस बार मतदान पिछली बार के आंकड़े तक नहीं पहुंच सका। अजमेर को बीजेपी का मजबूत क्षेत्र माना जाता है। विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी के राजनीतिक प्रभाव वाले इस शहर में पूर्व मेयर धर्मेंद्र गहलोत की बगावत ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

धर्मेंद्र गहलोत की पत्नी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में हैं। ऐसे में निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

2019 के चुनाव में अजमेर में 66.17% मतदान हुआ था। 80 वार्डों में बीजेपी ने 48 और कांग्रेस ने 18 वार्ड जीते थे। बीजेपी ने स्पष्ट बहुमत के साथ बोर्ड बनाया था।

पाली: निर्दलीयों की भूमिका फिर हो सकती है अहम

पाली में मतदान प्रतिशत करीब पिछले चुनाव के आसपास रहा। पिछले चुनाव में 71.35% मतदान हुआ था। इसके बावजूद बीजेपी को बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीयों का समर्थन लेना पड़ा था।

पिछले चुनाव में 65 वार्डों में बीजेपी ने 29, कांग्रेस ने 22 और निर्दलीयों ने 14 वार्ड जीते थे। बीजेपी को आठ निर्दलीयों का समर्थन मिला और वह बोर्ड बनाने में सफल रही।

इस बार भी मतदान के बाद दोनों दल निर्दलीयों के प्रदर्शन पर नजर लगाए हुए हैं। यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो बोर्ड गठन में निर्दलीयों की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

टोंक: 77.17% मतदान, पायलट के गढ़ में मुकाबला

टोंक नगर परिषद में इस बार 77.17% मतदान हुआ, जो पिछले चुनाव के 74.07% से 3.1 प्रतिशत अधिक है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सचिन पायलट के प्रभाव के कारण टोंक का चुनाव विशेष राजनीतिक महत्व रखता है।

2019 में 60 वार्डों में कांग्रेस ने 27, बीजेपी ने 23 और निर्दलीयों ने 10 वार्ड जीते थे। कांग्रेस ने निर्दलीयों के समर्थन से बोर्ड बनाया था।

इस बार बीजेपी बढ़े मतदान को अपने पक्ष में मान रही है, जबकि कांग्रेस का कहना है कि उसका संगठन और स्थानीय समर्थन मजबूत है। अंतिम परिणाम ही यह स्पष्ट करेंगे कि बढ़े मतदान का लाभ किस दल को मिलता है।

मतदान प्रतिशत से कितनी साफ होगी तस्वीर?

राजस्थान के इन प्रमुख शहरी निकायों में मतदान प्रतिशत ने चुनावी मुकाबले को लेकर कई संकेत जरूर दिए हैं, लेकिन केवल वोटिंग बढ़ने या घटने से किसी पार्टी की जीत तय नहीं होती। स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों की व्यक्तिगत लोकप्रियता, पार्टी संगठन, बागी उम्मीदवार और निर्दलीयों की संख्या जैसे कई कारक अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।

जयपुर में बढ़े मतदान से दोनों दल अपने-अपने दावे कर रहे हैं। जोधपुर और उदयपुर में मतदान में बड़ी वृद्धि ने राजनीतिक समीकरणों को लेकर उत्सुकता बढ़ाई है। वहीं पाली और टोंक जैसे निकायों में निर्दलीय उम्मीदवार बोर्ड गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

अब सभी की नजरें चुनाव परिणाम पर हैं। मतगणना के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि बढ़ा हुआ मतदान किस पार्टी के लिए फायदे का संकेत साबित हुआ और किन निकायों में पिछली बार के मुकाबले राजनीतिक तस्वीर बदली।

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