पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच Narendra Modi यूरोप दौरे पर जा रहे हैं। यह दौरा भारत की कूटनीतिक गतिविधियों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री 43 साल में पहली बार Norway का दौरा करेंगे।
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत अपनी “एक्ट ईस्ट” और इंडो-पैसिफिक रणनीति को और मजबूत करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। इसी क्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मई के तीसरे सप्ताह में वियतनाम और दक्षिण कोरिया की महत्वपूर्ण आधिकारिक यात्रा पर जा रहे हैं।
यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यूरोप और पश्चिम एशिया के कुछ देशों की कूटनीतिक यात्रा पर हैं। इन दोनों उच्च स्तरीय यात्राओं को भारत की संतुलित विदेश नीति और बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में रणनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
इंडो-पैसिफिक में भारत की सक्रिय भूमिका
भारत का ध्यान पिछले कुछ वर्षों में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा, व्यापार और रक्षा सहयोग बढ़ाने पर केंद्रित रहा है। इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव और दक्षिण चीन सागर में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच भारत अपनी रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत कर रहा है। इसी संदर्भ में राजनाथ सिंह की यात्रा को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह भारत के “एक्ट ईस्ट नीति” को नई गति दे सकती है।
राजनाथ सिंह की पहली यात्रा वियतनाम की होगी। वियतनाम लंबे समय से भारत के साथ रक्षा और समुद्री सुरक्षा सहयोग को बढ़ाने में रुचि दिखाता रहा है।दोनों देशों के बीच रक्षा उद्योग, प्रशिक्षण और समुद्री सुरक्षा पर सहयोग बढ़ाने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस यात्रा के दौरान सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली ब्रह्मोस मिसाइल से जुड़े सहयोग पर भी आगे चर्चा हो सकती है।
वियतनाम पहले ही भारत से रक्षा उपकरण खरीदने में रुचि दिखा चुका है, खासकर समुद्री सीमाओं की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए। इससे पहले फिलीपींस भारत से ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली प्राप्त करने वाला पहला देश बन चुका है, जिससे इस रक्षा प्रणाली की वैश्विक मांग बढ़ी है। हाल ही में वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी को और गहरा करने पर सहमति बनी थी। अब रक्षा मंत्री की यह यात्रा उस संवाद को आगे बढ़ाने का काम करेगी।
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दक्षिण कोरिया यात्रा: नौसैनिक सहयोग पर बड़ा फोकस
इसके बाद रक्षा मंत्री दक्षिण कोरिया का दौरा करेंगे, जहां समुद्री सुरक्षा, जहाज निर्माण और रक्षा तकनीक सहयोग मुख्य एजेंडा में रहेगा। दक्षिण कोरिया दुनिया के सबसे उन्नत शिपबिल्डिंग देशों में से एक है और भारत के लिए यह साझेदारी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। भारत अपनी नौसैनिक क्षमताओं को बढ़ाने और आधुनिक युद्धपोत निर्माण में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में लगातार काम कर रहा है।
इस यात्रा में दोनों देशों के बीच शिपयार्ड आधुनिकीकरण, एडवांस मरीन टेक्नोलॉजी और रक्षा उत्पादन में साझेदारी जैसे विषयों पर चर्चा होने की संभावना है।
भारत और दक्षिण कोरिया के रक्षा संबंधों का सबसे सफल उदाहरण K9 वज्र तोप प्रणाली है। यह आर्टिलरी सिस्टम भारत में “मेक इन इंडिया” पहल के तहत तैयार किया गया था और इसे दोनों देशों के बीच तकनीकी साझेदारी का मजबूत मॉडल माना जाता है।








