राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित कुलहरियों की ढाणी और पिलानी खुर्द गांवों के बीच ऐसा अनूठा रिश्ता है जो वर्षों से भाईचारे की मिसाल बना हुआ है। दोनों गांवों के लोग एक-दूसरे को परिवार की तरह मानते हैं और इसी वजह से आज तक इन गांवों के बीच कभी वैवाहिक संबंध नहीं हुए हैं।
राजस्थान: झुंझुनूं जिले की मंडावा पंचायत समिति के दो गांव "कुलहरियों की ढाणी और पिलानी खुर्द" के बीच पीढ़ियों से चला आ रहा भाईचारा आज भी लोगों के लिए उदाहरण है। दोनों गांवों के लोगों ने आपसी सम्मान और संबंधों को इतना मजबूत बना लिया है कि वे एक-दूसरे को परिवार का सदस्य मानते हैं। इस वजह से अब तक इन गांवों के बीच शादी-ब्याह का रिश्ता नहीं हुआ। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा कई दशकों से कायम है, जहां लोग रिश्तों के आधार पर एक-दूसरे को दादा-दादी, ताऊ-ताई, भाई-बहन जैसे संबोधनों से पुकारते हैं। इस अनोखी सामाजिक परंपरा ने दोनों गांवों के बीच प्रेम, विश्वास और एकता की मिसाल कायम की है, जो आधुनिक दौर में भी बरकरार है।
एक ही गोत्र सा रिश्ता, अद्भुत एकता की मिसाल
झुंझुनूं जिले के कुलहरियों की ढाणी और पिलानी खुर्द गांवों के बीच सामाजिक संबंध इतने गहरे हैं कि लोग एक-दूसरे को एक ही गोत्र का मानते हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि जैसे हिंदू समाज में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होता है, वैसे ही इन गांवों के लोग भी आपस में शादी नहीं करते।
यहां जाट, ब्राह्मण, राजपूत, मेघवाल, नाई समेत कई जातियां निवास करती हैं, लेकिन विविधता के बावजूद दोनों गांवों में एकता, सहयोग और सौहार्द का वातावरण हमेशा कायम रहा है। यह परंपरा सामाजिक एकजुटता की मिसाल मानी जाती है।
साझा पहचान, साझा संस्थान
ढाणी और पिलानी खुर्द के अटूट रिश्ते की मिसाल है यहां की ग्राम सेवा सहकारी समिति, जिसका नाम दोनों गांवों के नाम पर रखा गया है — ‘ढाणी-पिलानी सहकारी समिति’। दिलचस्प बात यह है कि इसका कार्यालय कुलहरियों की ढाणी की राजस्व सीमा में स्थित है, लेकिन संचालन पिलानी खुर्द पंचायत के अधीन होता है। यह व्यवस्था दोनों गांवों की पारस्परिक समझ, सहयोग और विश्वास को दर्शाती है। गांव के लोग बताते हैं कि हर निर्णय में दोनों गांव समान रूप से भागीदारी निभाते हैं।
अलग पहचान, मगर रिश्ता वही पुराना
ग्रामीणों के अनुसार, लगभग 40 वर्ष पहले तक कुलहरियों की ढाणी और पिलानी खुर्द एक ही राजस्व गांव हुआ करते थे। प्रशासनिक कारणों से बाद में ढाणी को अलग राजस्व गांव का दर्जा मिला, लेकिन सामाजिक और भावनात्मक जुड़ाव जस का तस बना रहा। आज भी दोनों गांवों के लोग खुद को एक ही परिवार का हिस्सा मानते हैं और यही वजह है कि उनके बीच विवाह संबंध नहीं किए जाते। यह अनोखी परंपरा आज भी आपसी एकता और सम्मान की मिसाल बनी हुई है।









