भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने टेकओवर फाइनेंसिंग से जुड़े नियमों को आसान बना दिया है, जिसके बाद अधिग्रहण और विलय (M&A) सौदों के लिए बैंकों की फंडिंग बढ़ने लगी है।
RBI Takeover Financing Rules: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के टेकओवर फाइनेंसिंग से जुड़े नियमों में बदलाव के बाद घरेलू बैंकों के लिए कारोबार के नए अवसर खुल रहे हैं। अब भारतीय बैंक कंपनियों के अधिग्रहण और विलय यानी मर्जर एंड एक्विजिशन (M&A) सौदों में पहले की तुलना में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उद्योग से जुड़े अनुमानों के मुताबिक, करीब ₹2 लाख करोड़ के संभावित बाजार में घरेलू बैंकों की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। नए नियम लागू होने के बाद भारतीय बैंकों ने एक दर्जन से अधिक सौदों में ₹10,000 करोड़ से ज्यादा की फंडिंग की है।
इससे पहले अधिग्रहण के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने वाले इस बाजार में विदेशी बैंकों, प्राइवेट क्रेडिट फंडों और कंपनियों के अपने संसाधनों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। घरेलू बैंकों पर लागू वित्तपोषण संबंधी सीमाओं के कारण वे कई बड़े सौदों में अपनी पूरी क्षमता से भाग नहीं ले पाते थे। नियमों में बदलाव से अब इस स्थिति में परिवर्तन आने की संभावना है।
RBI के नए नियमों से क्या बदला?
भारतीय रिजर्व बैंक के नए प्रावधानों के तहत घरेलू बैंक निर्धारित शर्तों के अधीन किसी अधिग्रहण के स्वतंत्र मूल्यांकन के 75 फीसदी तक वित्तपोषण कर सकते हैं। यह सुविधा सूचीबद्ध और गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के अधिग्रहण से जुड़े सौदों के लिए भी प्रासंगिक है। हालांकि, इस तरह की फंडिंग सभी कंपनियों को स्वतः उपलब्ध नहीं होती। बैंकों को उधार लेने वाली कंपनी की वित्तीय स्थिति, कर्ज चुकाने की क्षमता, लीवरेज और जोखिम प्रबंधन जैसे पहलुओं का मूल्यांकन करना होता है। इसके अलावा, संबंधित नियामकीय शर्तों का पालन भी जरूरी है।
नियमों में ढील का उद्देश्य बैंकिंग क्षेत्र को अधिग्रहण से जुड़ी वित्तीय जरूरतों में अधिक भागीदारी का अवसर देना है। इससे कंपनियों को सौदों के लिए घरेलू वित्तीय संस्थानों से पूंजी जुटाने के विकल्प बढ़ सकते हैं।
₹2 लाख करोड़ के बाजार में कितनी है संभावना?
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उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, भारत में अधिग्रहण फाइनेंसिंग का संभावित बाजार लगभग ₹2 लाख करोड़ का है। पिछले तीन वर्षों में देश में मर्जर और एक्विजिशन सौदों का सालाना मूल्य औसतन 50 अरब डॉलर रहा है। इन सौदों में अधिग्रहण करने वाली कंपनियों को अक्सर बड़ी रकम की जरूरत होती है। कई मामलों में पूरी राशि अपने संसाधनों से जुटाना मुश्किल होता है, इसलिए बैंक और अन्य वित्तीय संस्थान कर्ज उपलब्ध कराते हैं।
नए नियमों के बाद भारतीय बैंकों को इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर मिल रहा है। इससे कॉरपोरेट लोन कारोबार में विविधता आ सकती है और बड़े अधिग्रहण सौदों में घरेलू बैंकों की भूमिका मजबूत हो सकती है। हालांकि, वास्तविक बाजार आकार और बैंकों की हिस्सेदारी भविष्य में होने वाले सौदों तथा कर्ज की मांग पर निर्भर करेगी।
SBI सहित कई भारतीय बैंक सक्रिय
देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) अधिग्रहण फाइनेंसिंग के क्षेत्र में सक्रिय दिखाई दे रहा है। उपलब्ध उद्योग संबंधी जानकारी के अनुसार, बैंक ने लगभग एक दर्जन सौदों में भागीदारी की है। इनमें कुछ सौदे पूरे हो चुके हैं, जबकि अन्य अलग-अलग चरणों में हैं। इसके अलावा HDFC बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, ICICI बैंक, एक्सिस बैंक और RBL बैंक भी इस कारोबार में भाग ले रहे हैं। विदेशी बैंकों में HSBC, सिटीबैंक, MUFG और बार्कलेज जैसे संस्थानों की मौजूदगी बनी हुई है।
इससे स्पष्ट है कि नए नियम घरेलू बैंकों के लिए अवसर बढ़ा रहे हैं, लेकिन बाजार में प्रतिस्पर्धा भी जारी है। विदेशी बैंकों के पास बड़े कॉरपोरेट सौदों का अनुभव और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क जैसे फायदे हैं। ऐसे में भारतीय बैंकों को अपनी वित्तपोषण क्षमता और जोखिम आकलन को मजबूत करना होगा।









