झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव और पूर्व आईएएस अधिकारी आरएस शर्मा की पहचान केवल एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि तकनीक और सार्वजनिक सेवाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने वाले अधिकारियों में भी रही है। करीब 35 वर्षों तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में काम करने के बाद सेवानिवृत्त हुए आरएस शर्मा अब भी डिजिटल तकनीक और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े नए प्रयोगों में सक्रिय हैं। आधार व्यवस्था को देशभर में लागू करने से लेकर कोविड महामारी के दौरान टीकाकरण के लिए डिजिटल सिस्टम तैयार करने और अब झारखंड के दूरदराज इलाकों में टेली-आईसीयू की सुविधा पहुंचाने तक उनका सफर तकनीक के जरिए सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर बनाने पर केंद्रित रहा है।
आरएस शर्मा का नाम आधार परियोजना से जुड़ी शुरुआती महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के कारण देशभर में चर्चा में आया। उन्होंने नंदन एम. नीलकेणि के साथ मिलकर आधार को तैयार करने और उसे देशभर में लागू करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे पहले और बाद में उन्होंने प्रशासन तथा तकनीक के क्षेत्र में कई जिम्मेदारियां संभालीं। वह भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई के अध्यक्ष भी रहे। उनके काम में तकनीक का इस्तेमाल केवल सरकारी व्यवस्था को डिजिटल बनाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम लोगों तक सेवाओं की पहुंच बढ़ाने पर भी जोर रहा।
सेवानिवृत्ति के बाद भी तकनीक से उनका जुड़ाव खत्म नहीं हुआ। वह आईआईटी कानपुर में अतिथि प्रोफेसर के तौर पर टेक्नोलॉजी और पॉलिसी रेगुलेशन से जुड़े विषयों पर विद्यार्थियों के साथ काम कर रहे हैं। इसी दौरान कंप्यूटर साइंस के प्रोफेसरों और विद्यार्थियों के सहयोग से ‘डिस्कवरी ऑफ डॉक्टर’ प्लेटफॉर्म तैयार किया जा रहा है। इस पहल के पीछे विचार यह है कि मरीज अपनी जरूरत के अनुसार उपयुक्त डॉक्टर की जानकारी डिजिटल माध्यम से आसानी से खोज सके।
आरएस शर्मा के मुताबिक स्वास्थ्य क्षेत्र में एक तरफ ऐसे विशेषज्ञ डॉक्टर हैं जिनके पास मरीज देखने के लिए पर्याप्त समय नहीं है, जबकि दूसरी तरफ ऐसे विशेषज्ञ भी हैं जिनके पास समय उपलब्ध है लेकिन उनके पास मरीज आसानी से नहीं पहुंच पाते। डॉक्टर और मरीज के बीच इस दूरी को कम करने में डिजिटल प्लेटफॉर्म मददगार हो सकता है। ‘डिस्कवरी ऑफ डॉक्टर’ इसी समस्या को तकनीक के जरिए संबोधित करने की कोशिश है। अभी यह पहल शुरुआती चरण में है और आगे इसे व्यापक स्तर पर विकसित किए जाने की संभावना बताई गई है।
इसी डिजिटल सोच का एक और उदाहरण झारखंड में शुरू हुआ टेली-आईसीयू है। राज्य के चार जिलों खूंटी, लातेहार, गुमला और चतरा में 10-10 बेड वाले टेली-आईसीयू की शुरुआत की गई है। इन केंद्रों का उद्देश्य ऐसे इलाकों के मरीजों तक विशेषज्ञ चिकित्सा सलाह पहुंचाना है, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता सीमित है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन आईसीयू में इलाज करा रहे मरीजों को रिम्स के विशेषज्ञ डॉक्टर ऑनलाइन चिकित्सकीय सलाह दे सकेंगे।
टेली-आईसीयू की अवधारणा खास तौर पर झारखंड जैसे राज्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, जहां कई ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में मरीजों को गंभीर बीमारी की स्थिति में विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। किसी मरीज को गंभीर हालत में बड़े शहर या मेडिकल कॉलेज तक ले जाने में समय लग सकता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर आईसीयू की सुविधा और दूर बैठे विशेषज्ञ डॉक्टरों से संपर्क की व्यवस्था इलाज की प्रक्रिया में उपयोगी साबित हो सकती है।
आरएस शर्मा ने झारखंड में इस व्यवस्था को स्थापित करने में भूमिका निभाई है। उनकी मुलाकात श्रीकांत राधामुनि से कोविड काल के दौरान दोबारा हुई थी। राधामुनि ने सन माइक्रोसिस्टम्स की नौकरी छोड़कर भारत आकर आधार परियोजना में तकनीकी जिम्मेदारी निभाई थी। बाद में उन्होंने 10-बेड आईसीयू मॉडल पर काम शुरू किया, जिसका इस्तेमाल दूरदराज के क्षेत्रों में टेली-कम्युनिकेशन के माध्यम से विशेषज्ञ चिकित्सा सहायता पहुंचाने के लिए किया जा रहा था। इस मॉडल को झारखंड के लिए उपयोगी मानते हुए आरएस शर्मा ने इसे राज्य में लागू कराने की दिशा में पहल की।
झारखंड में टेली-आईसीयू की शुरुआत के लिए राज्य स्तर पर अधिकारियों और कोल इंडिया से भी सहयोग लिया गया। इसके बाद चार जिलों में 10-10 बेड वाले टेली-आईसीयू की सुविधा शुरू की गई। राज्य सरकार की योजना आगे अन्य जिलों तक भी इस सुविधा का विस्तार करने की है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक तीन महीने में राज्य के और जिलों में यह सुविधा उपलब्ध कराने की योजना बताई गई है।
आरएस शर्मा की कहानी का एक महत्वपूर्ण अध्याय कोविड महामारी के दौरान शुरू हुआ। 2020 में जब देश कोविड महामारी से जूझ रहा था, उस समय डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर टीकाकरण व्यवस्था को संचालित करने की जरूरत महसूस हुई। आरएस शर्मा ने उस समय कोविड से निपटने में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल को लेकर प्रस्तुति दी थी। बाद में 2021 में जब देश में टीकाकरण की तैयारी शुरू हुई तो उन्हें टीकाकरण के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करने की जिम्मेदारी मिली।
उनकी ओर से तैयार किए गए डिजिटल सिस्टम ने बड़े पैमाने पर टीकाकरण प्रक्रिया के प्रबंधन में भूमिका निभाई। इसके बाद स्वास्थ्य क्षेत्र में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल का दायरा और बढ़ा। आरएस शर्मा को नेशनल हेल्थ अथॉरिटी का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया गया और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन को लागू करने की प्रक्रिया में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार इस डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था के माध्यम से देशभर में करोड़ों लोगों का स्वास्थ्य डेटा उपलब्ध हुआ है।
यह पूरा सफर इस बात को भी दिखाता है कि प्रशासनिक जिम्मेदारी से बाहर आने के बाद भी आरएस शर्मा का काम तकनीक और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ा हुआ है। आधार के समय जिस डिजिटल पहचान व्यवस्था पर काम हुआ, कोविड के दौरान उसी तरह की तकनीकी सोच को स्वास्थ्य क्षेत्र में इस्तेमाल किया गया और अब टेली-आईसीयू के माध्यम से विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं को दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
झारखंड में डिजिटल हेल्थ के विस्तार की दिशा में केवल टेली-आईसीयू ही नहीं, बल्कि कई अन्य पहल भी शुरू की जा रही हैं। डिजिटल हेल्थ कॉन्क्लेव के दौरान मुख्यमंत्री डिजिटल हेल्थ योजना, एचआरआईएस और झारखंड ई-हेल्थ पोर्टल जैसी व्यवस्थाओं की शुरुआत की गई। मरीजों के ऑनलाइन पंजीकरण, भुगतान, डॉक्टर से मिलने का समय लेने और जांच रिपोर्ट डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराने जैसी सुविधाओं को भी विकसित करने की दिशा में काम हो रहा है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को केवल बड़े शहरों और मेडिकल कॉलेजों तक सीमित रखने के बजाय जिला और ग्रामीण स्तर तक डिजिटल माध्यम से जोड़ना है। टेलीमेडिसिन और टेली-आईसीयू के जरिए किसी छोटे अस्पताल में भर्ती मरीज को विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श दिलाया जा सकता है। इससे स्थानीय चिकित्सकों को भी गंभीर मरीजों के उपचार में विशेषज्ञ सलाह मिल सकती है।
झारखंड के ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों के लिए यह व्यवस्था इसलिए भी अहम है क्योंकि कई क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता सीमित है। अगर स्थानीय अस्पताल में आईसीयू बेड उपलब्ध हो और वहां मौजूद मेडिकल टीम को रिम्स या किसी बड़े मेडिकल संस्थान के विशेषज्ञों से ऑनलाइन मार्गदर्शन मिल सके, तो मरीज को शुरुआती स्तर पर बेहतर निगरानी और उपचार मिल सकता है। हालांकि ऐसी व्यवस्था की प्रभावशीलता उसके तकनीकी ढांचे, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों, इंटरनेट कनेक्टिविटी और अस्पतालों की क्षमता पर भी निर्भर करेगी।
आरएस शर्मा का मौजूदा प्रयास ‘डिस्कवरी ऑफ डॉक्टर’ प्लेटफॉर्म से भी जुड़ा है। इसका उद्देश्य मरीजों और डॉक्टरों के बीच मौजूद सूचना की कमी को कम करना है। कई बार मरीज को यह जानकारी नहीं होती कि उसकी बीमारी के लिए किस तरह के विशेषज्ञ से संपर्क किया जाए या किसी विशेषज्ञ डॉक्टर तक पहुंच कैसे बनाई जाए। डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए इस प्रक्रिया को सरल बनाने की कोशिश की जा रही है। अगर यह व्यवस्था बड़े स्तर पर लागू होती है तो मरीज अपनी जरूरत के मुताबिक विशेषज्ञों की जानकारी हासिल कर सकेंगे।
तकनीक के इस्तेमाल को लेकर आरएस शर्मा का दृष्टिकोण उनके पूरे करियर में दिखाई देता है। झारखंड में प्रशासनिक जिम्मेदारियों के दौरान भी उन्होंने ई-गवर्नेंस और डिजिटल व्यवस्थाओं को बढ़ावा देने पर जोर दिया था। बाद में आधार, दूरसंचार नियमन, कोविड टीकाकरण और डिजिटल स्वास्थ्य जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में उनकी भूमिका रही। अब सेवानिवृत्ति के वर्षों बाद भी उनका फोकस तकनीक के जरिए लोगों तक सेवाएं पहुंचाने पर बना हुआ है।
झारखंड में शुरू हुए टेली-आईसीयू को इसी लंबे सफर की एक नई कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। एक समय देश की डिजिटल पहचान से जुड़ी व्यवस्था को मजबूत करने में भूमिका निभाने वाले आरएस शर्मा अब स्वास्थ्य सेवाओं को डिजिटल माध्यम से दूरदराज के मरीजों तक पहुंचाने की कोशिश से जुड़े हैं। वहीं ‘डिस्कवरी ऑफ डॉक्टर’ जैसी पहल डॉक्टर और मरीज के बीच मौजूद दूरी को कम करने की दिशा में एक अलग प्रयोग है।
आने वाले समय में झारखंड में टेली-आईसीयू और डिजिटल हेल्थ की सुविधाओं का विस्तार होने पर ग्रामीण और दूरदराज के मरीजों को इसका लाभ मिल सकता है। राज्य सरकार की योजना अन्य जिलों तक भी टेली-आईसीयू पहुंचाने की है। ऐसे में आरएस शर्मा का तकनीकी अनुभव और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ डिजिटल तकनीक का यह मेल झारखंड में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग बन सकता है।
आरएस शर्मा की यात्रा की खास बात यह है कि उनके काम के अलग-अलग पड़ावों में तकनीक एक साझा कड़ी के रूप में दिखाई देती है। आधार से डिजिटल पहचान, कोविड के दौरान टीकाकरण की डिजिटल व्यवस्था, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन और अब टेली-आईसीयू तथा डॉक्टर खोजने वाले प्लेटफॉर्म तक उनका काम लगातार इस सवाल के इर्द-गिर्द रहा है कि तकनीक का इस्तेमाल आम लोगों तक जरूरी सेवाएं तेजी और बेहतर तरीके से पहुंचाने के लिए कैसे किया जा सकता है। झारखंड में टेली-आईसीयू की शुरुआत इसी सोच का नया उदाहरण है।











