सीकर में सर माधव स्कूल की शिफ्टिंग के विरोध में महापंचायत हुई। प्रिंसिपल विनीता भावुक होकर रो पड़ीं और कहा कि वह बच्चों की शिक्षा के लिए संघर्ष करती रहेंगी। छात्रों और अभिभावकों ने रैली निकालकर विरोध जताया।
सीकर: राजस्थान के सीकर जिले में स्थित ऐतिहासिक सर माधव स्कूल के स्थानांतरण को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। शुक्रवार को इस मुद्दे पर परशुराम पार्क के बाहर एक विशाल महापंचायत का आयोजन किया गया, जिसमें शिक्षक संगठनों, छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों ने भाग लिया।
महापंचायत में स्कूल की शिफ्टिंग के खिलाफ जोरदार विरोध देखने को मिला और इसके बाद एक आक्रोश रैली भी निकाली गई, जो कल्याण मंदिर तक पहुंची।
महापंचायत में उमड़ा जनसैलाब, लगे नारे
महापंचायत में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए और उन्होंने स्कूल को उसके पुराने भवन से स्थानांतरित किए जाने के फैसले का विरोध किया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने नारेबाजी करते हुए मांग की कि स्कूल को उसके मूल स्थान पर ही रखा जाए।
कार्यक्रम में शिक्षक संघ शेखावत, छात्र संगठन SFI सहित कई सामाजिक और शैक्षणिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यह स्कूल सिर्फ एक शिक्षा संस्थान नहीं बल्कि सीकर की ऐतिहासिक धरोहर है।
प्रिंसिपल विनीता भावुक, बोलीं— “बच्चों के लिए लड़ती रहूंगी”
इस पूरे विवाद के बीच स्कूल की प्रिंसिपल विनीता महापंचायत में भावुक हो गईं। उन्होंने कहा कि यह संस्थान 1938 से लगातार शिक्षा प्रदान कर रहा है और यहां से अब तक लाखों छात्र पढ़कर निकल चुके हैं।
उन्होंने बताया कि वे पिछले आठ वर्षों से इस स्कूल में कार्यरत हैं और इस दौरान उन्होंने गरीब और वंचित तबके के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया है। भावुक होते हुए उन्होंने कहा—
“मेरी पोस्टिंग चाहे कहीं भी कर दी जाए, चाहे बाड़मेर या जैसलमेर भेज दिया जाए, लेकिन मैं बच्चों की शिक्षा के लिए हमेशा लड़ती रहूंगी।”
इस बयान के दौरान वे रो पड़ीं, जिससे सभा में मौजूद लोग भी भावुक हो गए।
स्कूल में 199 छात्र और सीमित स्टाफ, बढ़ी चिंता
प्रिंसिपल के अनुसार वर्तमान में स्कूल में 199 छात्र पढ़ रहे हैं और केवल 13 स्टाफ सदस्य कार्यरत हैं। स्कूल को अब सीकर के एसके अस्पताल के पीछे स्थित सैनी प्राथमिक स्कूल में स्थानांतरित किया गया है, जिससे छात्रों और अभिभावकों में असंतोष है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि नई जगह पर पहुंचना छात्रों के लिए कठिन होगा और इससे उनकी पढ़ाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

छात्रों और अभिभावकों का विरोध प्रदर्शन
महापंचायत के बाद परशुराम पार्क से लेकर कल्याण मंदिर तक एक आक्रोश रैली निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में छात्र और उनके अभिभावक शामिल हुए। रैली के दौरान प्रदर्शनकारियों ने स्कूल को उसके मूल भवन में ही बनाए रखने की मांग दोहराई।
छात्रों ने कहा कि स्थानांतरण से उनकी पढ़ाई बाधित होगी और यात्रा में अधिक समय लगेगा, जिससे विशेषकर छोटे बच्चों को परेशानी होगी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1899 में हुआ था स्कूल की स्थापना
सर माधव स्कूल का इतिहास 19वीं सदी के अंत से जुड़ा हुआ है। जानकारी के अनुसार, इस स्कूल की स्थापना 1899 में सीकर के राव राजा माधव सिंह ने अकाल राहत के तहत की थी।
यह भवन लंबे समय तक शिक्षा का केंद्र रहा और बाद में इसका स्वामित्व भगवान कल्याण मंदिर के अधीन माना गया। पहले शिक्षा विभाग इस भवन का किराया देता था, लेकिन बाद में यह भुगतान बंद कर दिया गया, जिसके बाद कानूनी विवाद शुरू हुआ।
अदालतों में लंबी कानूनी लड़ाई, सुप्रीम कोर्ट का फैसला
इस मामले में लंबे समय तक जिला अदालत और हाईकोर्ट में सुनवाई चलती रही। अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां मंदिर प्रबंधन के पक्ष में निर्णय आया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद स्कूल भवन के स्वामित्व को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई और इसी आधार पर स्थानांतरण की प्रक्रिया शुरू की गई।
कल्याण मंदिर के महंत विष्णु प्रसाद शर्मा ने कहा कि यह मामला कई वर्षों से न्यायालय में विचाराधीन था और अब सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय उनके पक्ष में आया है।
सुरक्षा व्यवस्था सख्त, 80 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात
महापंचायत और विरोध प्रदर्शन को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए। क्षेत्र में 80 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई ताकि किसी भी प्रकार की कानून व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न न हो।
प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने भीड़ पर नजर बनाए रखी और कार्यक्रम को शांतिपूर्ण तरीके से नियंत्रित किया।
सामाजिक और शैक्षणिक बहस तेज
इस पूरे मामले ने सीकर में शिक्षा व्यवस्था, ऐतिहासिक भवनों के उपयोग और न्यायालय के फैसलों के क्रियान्वयन को लेकर एक व्यापक बहस छेड़ दी है।
एक पक्ष का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन आवश्यक है, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए समाधान निकाला जाना चाहिए।
शिक्षाविदों का मानना है कि ऐसे मामलों में प्रशासन को संतुलित नीति अपनानी चाहिए ताकि शिक्षा प्रभावित न हो और ऐतिहासिक धरोहरों का भी संरक्षण हो सके।












