शंकराचार्य बनने के नियम और परंपरा: माघ मेले में अविमुक्तेश्वरानंद पर उठे सवाल

शंकराचार्य बनने के नियम और परंपरा: माघ मेले में अविमुक्तेश्वरानंद पर उठे सवाल

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में माघ मेला 2026 के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच विवाद खड़ा हो गया है। 19 जनवरी, सोमवार को प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस चस्पा किया और 24 घंटे के भीतर यह स्पष्ट करने को कहा कि वे शंकराचार्य कैसे हैं।

लखनऊ: प्रयागराज में माघ मेला 2026 के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच बहस छिड़ गई है। प्रशासन ने सोमवार, 19 जनवरी को एक नोटिस जारी किया और 24 घंटे में यह स्पष्ट करने को कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य कैसे हैं। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया गया और कहा गया कि उनके पोस्टरों पर ‘शंकराचार्य’ शब्द का इस्तेमाल नियमों का पालन न करने जैसा माना जा सकता है।

स्वामी के आश्रम के मीडिया प्रतिनिधि योगीराज ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पहले ही पट्टाभिषेक संपन्न हो गया था। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि शंकराचार्य कैसे बनते हैं और कौन बन सकता है।

शंकराचार्य कौन बन सकता है?

हिंदू धर्म में शंकराचार्य बनने की परंपरा प्राचीन और सुसंगठित है। इसे अखाड़े की परंपरा और मठाम्नाय महानुशासनम् ग्रंथ में विस्तार से वर्णित किया गया है। इन नियमों के अनुसार शंकराचार्य बनने के लिए व्यक्ति को कुछ अनिवार्य शर्तों को पूरा करना होता है:

  • संन्यासी होना आवश्यक – शंकराचार्य बनने के लिए व्यक्ति का संन्यासी होना अनिवार्य है। इसके लिए गृहस्थ जीवन का पूर्ण त्याग आवश्यक माना जाता है।
  • दंडी संन्यासी होना – शंकराचार्य वही बन सकता है जो दंडी संन्यासी हो, अर्थात शरीर, मन और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता हो।
  • विद्वान होना – शंकराचार्य बनने के लिए व्यक्ति को चारों वेदों और छह वेदांगों का ज्ञाता होना चाहिए।
  • विदेश यात्रा न की हो – परंपरा के अनुसार शंकराचार्य वही बन सकता है जिसने कभी समुद्र पार न किया हो, यानी विदेश यात्रा नहीं की हो।

शंकराचार्य बनने की प्रक्रिया में गुरु की भूमिका सबसे अहम होती है। गुरु ही अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। इसके अलावा प्रतिष्ठित संतों की सभा और काशी विद्वत परिषद की सहमति भी आवश्यक मानी जाती है। यही परंपरा सुनिश्चित करती है कि शंकराचार्य पद केवल योग्य और परिपक्व संत को ही मिले।

चयन प्रक्रिया और पदवी

देश में चार प्रमुख शंकराचार्य पीठें हैं, जिनमें दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और उत्तर चारों पीठों के अपने-अपने नियम और उत्तराधिकार प्रणाली है। प्रत्येक पीठ के शंकराचार्य को अपनी पीठ के अनुसार वेदों के संरक्षण और धार्मिक ज्ञान के प्रचार का दायित्व सौंपा जाता है।

  • गुरु की घोषणा – उत्तराधिकारी तय करने का सबसे पहला नियम यही है कि गुरु स्वयं घोषणा करे।
  • संन्यास और तपस्या – योग, ध्यान और कठोर तपस्या के बिना पदवी संभव नहीं है।
  • संतों की सभा और विद्वत परिषद की मुहर – चयन के लिए शिष्यों और विद्वानों की सहमति अनिवार्य है।

शंकराचार्य केवल एक धार्मिक पद नहीं, बल्कि संन्यासियों और संतों के लिए आदर्श की पहचान है। यह पद आध्यात्मिक ज्ञान, तपस्या और समाज में धर्म और वेदों के प्रचार का दायित्व देता है। विशेषज्ञों के अनुसार, माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर उठे सवाल से यह स्पष्ट होता है कि शंकराचार्य बनने की परंपरा और नियम आज भी सख्ती से पालन किए जाते हैं।

 

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