Udhayanidhi Stalin के सनातन धर्म को लेकर दिए गए बयान के बाद राजनीतिक विवाद फिर से तेज हो गया है। उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि सनातन धर्म समाज को विभाजित करता है और इसे समाप्त किए जाने की बात कही थी।
लखनऊ: तमिलनाडु की राजनीति और राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर सनातन धर्म को लेकर बयानबाज़ी ने बड़ा सियासी विवाद खड़ा कर दिया है। इस बहस के केंद्र में हैं Udhayanidhi Stalin, जिन्होंने सनातन धर्म को लेकर अपनी पुरानी टिप्पणी को दोहराते हुए इसे सामाजिक विभाजन से जोड़ दिया, जबकि उनकी इस टिप्पणी पर उत्तर प्रदेश के नेता Brij Bhushan Sharan Singh ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
उदयनिधि स्टालिन का बयान और विवाद की शुरुआत
Udhayanidhi Stalin, जो DMK के वरिष्ठ नेता हैं, ने हाल ही में एक बार फिर सनातन धर्म को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह व्यवस्था समाज में असमानता और विभाजन को बढ़ावा देती है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों के खिलाफ किसी भी व्यवस्था को खत्म करने की बात करना उनके अनुसार वैचारिक बहस का हिस्सा है।
उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई, और विभिन्न दलों ने इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं। यह पहली बार नहीं है जब उदयनिधि स्टालिन के इस तरह के बयान पर विवाद हुआ हो। इससे पहले भी 2023 में उनके इसी तरह के बयान ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था।
बृजभूषण शरण सिंह की तीखी प्रतिक्रिया

उदयनिधि स्टालिन के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए Brij Bhushan Sharan Singh ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म पर हर युग में सवाल उठाए गए हैं, लेकिन यह परंपरा और संस्कृति समय के साथ और मजबूत हुई है। उन्होंने उदयनिधि स्टालिन पर निशाना साधते हुए उन्हें “रावण और हिरण्यकश्यप के विचारों से प्रेरित” करार दिया और कहा कि इस तरह की सोच भारतीय संस्कृति और परंपरा के खिलाफ है। उनके अनुसार सनातन धर्म को खत्म करने जैसी बातें केवल वैचारिक भ्रम फैलाने का प्रयास हैं और यह कभी सफल नहीं हो सकता।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर देश में धार्मिक और वैचारिक राजनीति को गरमा दिया है। एक ओर जहां Udhayanidhi Stalin सामाजिक समानता और सुधार की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके बयान को धार्मिक भावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने भी इस तरह के बयानों पर आपत्ति जताई है, जबकि समर्थकों का कहना है कि यह एक वैचारिक बहस है, जिसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए।
DMK लंबे समय से सामाजिक न्याय, भाषा और क्षेत्रीय पहचान के मुद्दों पर राजनीति करती रही है। पार्टी का दावा है कि उसका उद्देश्य समाज में समानता और अधिकारों की रक्षा करना है। हालांकि, धर्म से जुड़े बयानों को लेकर पार्टी अक्सर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ जाती है।










