Zoho फाउंडर श्रीधर वेम्बु ने अक्टूबर 2026 में AI की बढ़ती क्षमताओं और बौद्धिक नौकरियों पर इसके असर को लेकर विचार साझा किए। आंद्रेज कार्पेथी के पोस्ट के जवाब में उन्होंने इंसानों के लिए प्रकृति, देखभाल और संस्कृति से जुड़े कामों की अहमियत बताई।
भारत: Zoho के फाउंडर श्रीधर वेम्बु ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव के बीच भविष्य में इंसानी काम की भूमिका पर चर्चा की है। उनका मानना है कि सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट समेत कई बौद्धिक कार्यों पर तकनीक का दबाव बढ़ रहा है। हालांकि, उन्होंने प्रकृति की देखभाल, बच्चों के पालन-पोषण, सांस्कृतिक परंपराओं और आध्यात्मिक गतिविधियों जैसे क्षेत्रों में इंसानों के लिए नए अवसरों की संभावना भी जताई।
AI की बढ़ती क्षमता से बौद्धिक कामों पर दबाव
Zoho के फाउंडर श्रीधर वेम्बु ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तेजी से बढ़ती क्षमताओं पर चिंता और विचार साझा करते हुए कहा कि अब कई तरह के बौद्धिक कामों का भविष्य बदल सकता है। उनके अनुसार, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में भी AI की भूमिका बढ़ने से पारंपरिक कामकाज और रोजगार के तरीकों पर असर पड़ सकता है।

वेम्बु ने यह बात AI विशेषज्ञ आंद्रेज कार्पेथी के एक पोस्ट के जवाब में कही। उन्होंने आधुनिक समाज में बुद्धि को मिलने वाली प्राथमिकता पर भी सवाल उठाया और संकेत दिया कि AI की प्रगति इंसानों को अपनी क्षमताओं और काम की अहमियत पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित कर सकती है।
इंसानों के काम को चार श्रेणियों में बांटा
वेम्बु ने इंसानी गतिविधियों को समझने के लिए चार श्रेणियों का जिक्र किया—नेचर, नर्चर, कल्चर और स्क्रिप्टर। इनका संबंध प्रकृति की देखभाल, लोगों के पालन-पोषण, सांस्कृतिक गतिविधियों और आध्यात्मिक परंपराओं से है।
उन्होंने मिट्टी और पानी को संरक्षित करने, बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल, संगीत, खेल, त्योहारों और परंपराओं को आगे बढ़ाने जैसे कामों को महत्वपूर्ण बताया। उनके विचार में, ये गतिविधियां समाज के लिए जरूरी हैं और इनके जरिए आजीविका के अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं।
वेम्बु ने अपने पोस्ट में नवरात्र के दौरान ‘ललिता सहस्रनाम’ के पाठ और पूजा का भी उल्लेख किया। उन्होंने अंत में ‘ॐ श्री ललिताम्बिकायै नमः’ लिखते हुए अपनी आध्यात्मिक आस्था व्यक्त की।
आंद्रेज कार्पेथी ने AI की क्षमताओं को लेकर क्या कहा?
AI और डीप लर्निंग के क्षेत्र में काम कर चुके आंद्रेज कार्पेथी ने अपने पोस्ट में बताया कि AI की क्षमताओं को लेकर लोगों के अनुभवों में बड़ा अंतर है। उनके अनुसार, बड़ी आबादी ने अब तक बड़े भाषा मॉडल (LLM) का इस्तेमाल नहीं किया है, जबकि कुछ लोग ChatGPT जैसे टूल्स का सीमित उपयोग करते हैं।
कार्पेथी ने यह भी बताया कि टेक्नोलॉजी से जुड़े कुछ पेशेवर AI की मदद से ऐसे जटिल प्रोजेक्ट्स तेजी से पूरे होते देख रहे हैं, जिनमें पहले काफी समय लगता था। वहीं, उन्नत AI सिस्टम्स के साथ काम करने वाले विशेषज्ञ इसकी क्षमताओं और गति का अधिक गहराई से अनुभव कर रहे हैं।
उनके विचार में, AI को लेकर आम लोगों, सामान्य पेशेवरों और उन्नत सिस्टम्स पर काम करने वाले विशेषज्ञों की समझ में काफी अंतर है।
वेम्बु और कार्पेथी के विचार AI के बदलते प्रभाव के दो महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने रखते हैं। जहां एक ओर तकनीक पारंपरिक बौद्धिक कार्यों को बदल सकती है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति, देखभाल, संस्कृति और आध्यात्मिक जीवन से जुड़े कार्य इंसानी समाज में अपनी उपयोगिता बनाए रख सकते हैं।









