बिहार के राजगीर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय का पर्यावरण-अनुकूल और नेट-जीरो परिसर लगातार देश-विदेश के लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मनमोहन के नालंदा विश्वविद्यालय पहुंचने की जानकारी सामने आई है। विश्वविद्यालय परिसर के भ्रमण के दौरान उन्होंने यहां अपनाई गई पर्यावरणीय तकनीकों, हरित बुनियादी ढांचे और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े प्रयासों की सराहना की। उन्होंने इस मॉडल को दूसरे शिक्षण संस्थानों के लिए भी उपयोगी बताते हुए इसके अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया।
नालंदा विश्वविद्यालय का नया परिसर राजगीर की प्राकृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बीच विकसित किया गया है। विश्वविद्यालय के आधिकारिक विवरण के मुताबिक पूरा परिसर करीब 455 एकड़ में फैला है और इसे प्रकृति के साथ सामंजस्य रखते हुए नेट-जीरो मॉडल पर तैयार किया गया है। परिसर में बड़े पैमाने पर जल निकाय, हरित क्षेत्र, सौर ऊर्जा और जैविक ऊर्जा जैसी व्यवस्थाएं विकसित की गई हैं। विश्वविद्यालय का उद्देश्य ऊर्जा, पानी, कचरा और कार्बन उत्सर्जन के स्तर पर अधिक टिकाऊ व्यवस्था तैयार करना है।
जस्टिस मनमोहन के दौरे के दौरान परिसर की डिजाइन और पर्यावरणीय व्यवस्था को लेकर विशेष जानकारी दी गई। विश्वविद्यालय में प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल को कम करने और उपलब्ध संसाधनों का दोबारा उपयोग करने की दिशा में कई तकनीकों को अपनाया गया है। इस वजह से नालंदा विश्वविद्यालय का नया कैंपस केवल पढ़ाई और शोध के लिए बनाए गए भवनों का समूह नहीं है, बल्कि इसे एक ऐसे पर्यावरणीय मॉडल के रूप में विकसित किया गया है जिसमें आधुनिक तकनीक और पारंपरिक भारतीय ज्ञान दोनों को जोड़ा गया है।
नालंदा विश्वविद्यालय के नेट-जीरो मॉडल की खास बात यह है कि यहां ऊर्जा उत्पादन और खपत के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है। विश्वविद्यालय के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार परिसर में 6.5 मेगावाट का सोलर फार्म स्थापित किया गया है। इसके साथ ही 1.5 मेगावाट का बायोगैस प्लांट भी परिसर की ऊर्जा जरूरतों और टिकाऊ व्यवस्था का हिस्सा है। सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों के इस्तेमाल से पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम किया गया है।
परिसर में पानी के संरक्षण पर भी विशेष जोर दिया गया है। विश्वविद्यालय के अनुसार करीब 100 एकड़ क्षेत्र में जल निकाय विकसित किए गए हैं। बारिश के पानी को संरक्षित करने और उसका उपयोग करने के लिए पारंपरिक आहर-पइन प्रणाली को आधुनिक जल प्रबंधन व्यवस्था के साथ जोड़ा गया है। इस तरह बारिश के पानी को केवल बह जाने देने के बजाय उसे परिसर के जल तंत्र का हिस्सा बनाया जाता है। विश्वविद्यालय के कैंपस विवरण में इसे नेट-जीरो व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है।
नालंदा विश्वविद्यालय के परिसर में बने कमल सागर जल निकाय को भी इसी पर्यावरणीय मॉडल का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। विश्वविद्यालय के मुताबिक यह जल निकाय स्थल की प्राकृतिक बनावट और जल निकासी व्यवस्था को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। बारिश के पानी को विभिन्न चैनलों के जरिए जलाशय तक पहुंचाया जाता है। इससे एक तरफ जल संरक्षण होता है तो दूसरी तरफ परिसर के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में मदद मिलती है।
कैंपस की इमारतों के निर्माण में भी पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। विश्वविद्यालय के आधिकारिक विवरण के अनुसार सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाली पकी हुई मिट्टी की ईंटों के स्थान पर Compressed Stabilized Earth Blocks यानी CSEB का इस्तेमाल किया गया है। इसके लिए परिसर से निकाली गई मिट्टी का उपयोग किया गया। इससे निर्माण सामग्री के स्तर पर स्थानीय संसाधनों के उपयोग और पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने की कोशिश की गई है।
भवनों की डिजाइन में भी ऊर्जा की बचत को ध्यान में रखा गया है। मोटी कैविटी दीवारों, प्राकृतिक रोशनी और हवा के बेहतर इस्तेमाल जैसी तकनीकों को अपनाया गया है। विश्वविद्यालय की जानकारी के अनुसार भवनों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि तापमान को नियंत्रित रखने के लिए पारंपरिक एयर-कंडीशनिंग पर निर्भरता कम की जा सके। इसके साथ ही Desiccant Enhanced Evaporative Air-Conditioning यानी DEVAP जैसी तकनीकों का भी इस्तेमाल किया गया है।
कचरा और अपशिष्ट जल प्रबंधन भी इस परिसर की महत्वपूर्ण विशेषताओं में शामिल है। विश्वविद्यालय ने Decentralized Wastewater Treatment यानी DEWAT प्रणाली को अपनाया है। इसका उद्देश्य अपशिष्ट जल का उपचार कर उसे उपयोगी बनाना है। इस तरह पानी के इस्तेमाल के बाद उसे सीधे बाहर निकालने के बजाय उपचारित कर दोबारा उपयोग करने की दिशा में काम किया जाता है। विश्वविद्यालय अपने परिसर को नेट-जीरो वाटर और नेट-जीरो वेस्ट के लक्ष्य से भी जोड़ता है।
नालंदा विश्वविद्यालय का यह मॉडल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां आधुनिक तकनीक को स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। आहर-पइन जैसी पारंपरिक जल प्रबंधन व्यवस्था इसका एक उदाहरण है। प्राचीन भारत में जल संरक्षण के लिए स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप कई प्रणालियां विकसित की गई थीं। नए नालंदा परिसर में इन्हीं अवधारणाओं को आधुनिक इंजीनियरिंग और तकनीक के साथ इस्तेमाल करने का प्रयास किया गया है।
न्यायमूर्ति मनमोहन द्वारा इस मॉडल की सराहना को उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण संदेश के तौर पर देखा जा सकता है। विश्वविद्यालयों और बड़े शिक्षण संस्थानों में बड़ी संख्या में छात्र, शिक्षक और कर्मचारी रहते हैं। ऐसे परिसरों में ऊर्जा और पानी की खपत भी काफी अधिक होती है। यदि इन संस्थानों में नवीकरणीय ऊर्जा, वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल उपचार और कचरा प्रबंधन की टिकाऊ व्यवस्था विकसित की जाए तो पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को कम किया जा सकता है।
नालंदा विश्वविद्यालय का परिसर इसी सोच को व्यवहार में उतारने की कोशिश करता है। विश्वविद्यालय के आधिकारिक विवरण में इसे नेट-जीरो एनर्जी, नेट-जीरो एमिशन, नेट-जीरो वाटर और नेट-जीरो वेस्ट की दिशा में विकसित परिसर बताया गया है। इसके लिए सौर ऊर्जा, जल निकाय, जल संरक्षण, अपशिष्ट जल उपचार, ऊर्जा दक्ष भवन और जैव विविधता संरक्षण जैसी व्यवस्थाओं को एक साथ जोड़ा गया है।
यह परिसर नालंदा की प्राचीन ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के बीच भी एक प्रतीकात्मक संबंध स्थापित करता है। प्राचीन नालंदा दुनिया के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में शामिल था, जहां अलग-अलग क्षेत्रों से विद्यार्थी और विद्वान अध्ययन के लिए आते थे। आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय उसी ऐतिहासिक विरासत को आधुनिक उच्च शिक्षा, शोध और वैश्विक अकादमिक संवाद के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। हाल में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने भी BRICS Chief Justices’ Forum में प्राचीन नालंदा को संवाद और विचार-विमर्श के आदर्श से जोड़ते हुए इसे “living Nalanda University” के रूप में देखने की बात कही थी।
नए परिसर के निर्माण में पर्यावरणीय दृष्टिकोण को शुरुआत से ही महत्व दिया गया है। संसद में उपलब्ध एक रिपोर्ट के अनुसार विश्वविद्यालय का स्थायी परिसर climate-responsive passive architectural design, energy-efficient systems, व्यापक water management, ecological planning, green mobility और carbon footprint कम करने के सिद्धांतों से जुड़ा है। इससे स्पष्ट होता है कि परिसर की पर्यावरणीय व्यवस्था केवल बाद में जोड़ी गई सुविधा नहीं है, बल्कि इसके मास्टर प्लान और डिजाइन का हिस्सा रही है।
विश्वविद्यालय में जल निकायों और हरित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा परिसर के माइक्रो-इकोसिस्टम को बेहतर बनाने में मदद करता है। पेड़-पौधों, जल स्रोतों और प्राकृतिक क्षेत्रों को भवनों के साथ इस तरह जोड़ा गया है कि पूरा कैंपस एक बड़े पारिस्थितिक तंत्र की तरह काम करे। इससे गर्मी को नियंत्रित करने, बारिश के पानी को रोकने और जैव विविधता को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
नालंदा विश्वविद्यालय पहले भी अपने पर्यावरणीय मॉडल के लिए प्रशंसा हासिल कर चुका है। विश्वविद्यालय की प्रेस रिलीज में उल्लेख है कि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडलों को परिसर का भ्रमण कराया गया और उन्हें नेट-जीरो ऊर्जा, जल संरक्षण और हरित बुनियादी ढांचे के बारे में जानकारी दी गई। विश्वविद्यालय के अनुसार परिसर को GRIHA से संबंधित मान्यताएं भी मिली हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जून 2024 में नए नालंदा विश्वविद्यालय परिसर के उद्घाटन के दौरान इसके पर्यावरणीय मॉडल को रेखांकित किया था। PIB के अनुसार परिसर में सोलर प्लांट, पेयजल और घरेलू जल उपचार संयंत्र, पानी के पुनर्चक्रण की व्यवस्था तथा 100 एकड़ जल निकायों सहित कई पर्यावरण-अनुकूल सुविधाएं हैं।
ऐसे में जस्टिस मनमोहन का परिसर का दौरा केवल एक शैक्षणिक संस्थान के भ्रमण तक सीमित नहीं माना जा सकता। यह दौरा न्यायपालिका और शिक्षा जगत के बीच संवाद की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। पर्यावरण संरक्षण अब केवल वैज्ञानिक या प्रशासनिक विषय नहीं रह गया है। इसका संबंध नागरिकों के अधिकार, सार्वजनिक नीति, विकास और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से भी जुड़ता है। ऐसे में उच्च शिक्षण संस्थानों में पर्यावरणीय जिम्मेदारी का मॉडल विकसित करना व्यापक सामाजिक महत्व रखता है।
नालंदा विश्वविद्यालय का अनुभव दूसरे विश्वविद्यालयों के लिए अध्ययन का विषय बन सकता है। खासकर ऐसे संस्थानों के लिए जहां बड़े परिसर हैं और बिजली, पानी तथा कचरे की मात्रा अधिक है। सौर ऊर्जा उत्पादन, बारिश के पानी का संरक्षण, अपशिष्ट जल का उपचार, स्थानीय निर्माण सामग्री का इस्तेमाल और ऊर्जा दक्ष भवन जैसी व्यवस्थाओं को अलग-अलग स्तर पर अपनाया जा सकता है।
इस मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल एक तकनीक पर निर्भरता नहीं है। ऊर्जा के लिए सौर और बायोगैस, पानी के लिए जल निकाय और पारंपरिक आहर-पइन, भवनों के लिए passive design और CSEB, तथा अपशिष्ट के लिए DEWAT जैसी कई व्यवस्थाओं को एक साथ जोड़ा गया है। इससे एक ऐसा समग्र मॉडल तैयार होता है जिसमें परिसर की अलग-अलग जरूरतें एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय की यह पहल पर्यावरण संरक्षण को शिक्षा व्यवस्था के साथ जोड़ने का उदाहरण भी है। विश्वविद्यालय में Ecology and Environmental Studies से जुड़ी अकादमिक गतिविधियां भी संचालित होती हैं। इससे छात्रों को केवल किताबों में पर्यावरण संरक्षण पढ़ने के बजाय अपने आसपास एक बड़े स्तर पर टिकाऊ व्यवस्था को देखने और समझने का अवसर मिलता है। विश्वविद्यालय के प्रशासनिक विवरण में Ecology and Environmental Studies को उसके प्रमुख स्कूलों में शामिल किया गया है।
जस्टिस मनमोहन के दौरे के दौरान जिस तरह नेट-जीरो परिसर की सराहना और दूसरे संस्थानों को इसके अध्ययन की बात सामने आई है, उससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में टिकाऊ बुनियादी ढांचे को और अधिक महत्व दिया जा सकता है। विश्वविद्यालय केवल शिक्षा देने की जगह नहीं होते, बल्कि वे समाज के लिए नए प्रयोगों और नीतिगत सोच के केंद्र भी बन सकते हैं।
नालंदा का यह परिसर इसी दृष्टि से एक प्रयोगशाला की तरह देखा जा सकता है, जहां आधुनिक शिक्षा, भारतीय ज्ञान परंपरा और पर्यावरणीय स्थिरता को एक साथ रखने की कोशिश की गई है। आने वाले वर्षों में यदि इस मॉडल के अनुभवों का अध्ययन दूसरे संस्थानों द्वारा किया जाता है, तो ऊर्जा बचत, जल संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन कम करने के क्षेत्र में इसका व्यापक इस्तेमाल संभव हो सकता है।
फिलहाल नालंदा विश्वविद्यालय का नेट-जीरो परिसर बिहार के लिए भी एक महत्वपूर्ण पहचान बन चुका है। राजगीर की ऐतिहासिक धरती पर विकसित यह आधुनिक परिसर शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। जस्टिस मनमोहन की ओर से इसकी सराहना और अन्य संस्थानों को इस मॉडल का अध्ययन करने का संदेश इसी व्यापक सोच को आगे बढ़ाने वाला कदम माना जा सकता है।









