स्कूल-कॉलेजों में खेल अनिवार्य करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, 22 सितंबर को होगी सुनवाई

Supreme Court ने स्कूल-कॉलेजों में खेल को अनिवार्य करने की मांग पर अहम टिप्पणी की है। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी। जानें कोर्ट ने क्या कहा।

स्कूल और कॉलेजों में खेल को अनिवार्य विषय बनाने की मांग वाली याचिका की सुप्रीम कोर्ट ने सराहना की है। याचिका में बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को ध्यान में रखते हुए खेलों को स्कूली पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाने की मांग की गई है।

Sports Education in India: भारत के स्कूलों और कॉलेजों में खेल तथा शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य विषय बनाने की मांग ने अब सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया है। बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में खेलों की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हुए अदालत ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है। मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 22 सितंबर 2026 को होने वाली है।

यह मामला वर्ष 2021 में दायर एक याचिका से जुड़ा है, जिसमें खेल और फिजिकल एजुकेशन को बच्चों के शिक्षा के अधिकार से जोड़ने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता कनिष्क पांडे ने अदालत से आग्रह किया है कि खेलों को शिक्षा व्यवस्था का नियमित और अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए तथा इसे संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा के अधिकार से जोड़ा जाए।

डिजिटल दौर में खेलों से दूर हो रहे बच्चे

20 अगस्त को मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने खेलों को शिक्षा व्यवस्था में अधिक महत्व देने की जरूरत पर टिप्पणी की। सुनवाई के दौरान यह चिंता सामने आई कि डिजिटल उपकरणों और स्क्रीन टाइम के बढ़ते प्रभाव के कारण बच्चे शारीरिक गतिविधियों से दूर होते जा रहे हैं।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं। नियमित शारीरिक गतिविधियां बच्चों के स्वास्थ्य, मानसिक विकास, अनुशासन, टीमवर्क और सामाजिक कौशल के निर्माण में मदद कर सकती हैं। इसलिए स्कूल के पाठ्यक्रम में खेलों के लिए पर्याप्त समय और संसाधन उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।

मामले में अदालत की ओर से की गई सकारात्मक टिप्पणी को खेल शिक्षा से जुड़े लोगों के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी खेलों को अनिवार्य विषय घोषित नहीं किया है। फिलहाल अदालत याचिका और इससे जुड़े व्यापक नीतिगत पहलुओं पर विचार कर रही है।

एमिकस क्यूरी ने भी किया अनिवार्य खेल शिक्षा का समर्थन

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अपनी सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है। इसका उद्देश्य अदालत को खेल और शिक्षा से जुड़े नीतिगत तथा संवैधानिक पहलुओं पर स्वतंत्र सहायता उपलब्ध कराना है। एमिकस क्यूरी की ओर से पहले प्रस्तुत रिपोर्ट में स्कूलों में खेल गतिविधियों के लिए प्रतिदिन करीब 90 मिनट का समय निर्धारित करने का सुझाव दिया गया था। रिपोर्ट में खेलों को बच्चों की शिक्षा व्यवस्था का नियमित हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया था।

याचिका में खेल को मौलिक अधिकार से जोड़ने की मांग

कनिष्क पांडे की याचिका का मूल तर्क है कि बच्चों को शिक्षा देने का उद्देश्य सिर्फ अकादमिक ज्ञान तक सीमित नहीं होना चाहिए। शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक विकास भी समग्र शिक्षा का हिस्सा हैं। याचिका में खेल और शारीरिक शिक्षा को अनुच्छेद 21A के दायरे में लाने की मांग की गई है। अनुच्छेद 21A 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार से संबंधित है। इस मामले में अदालत को यह तय करना है कि खेल और शारीरिक शिक्षा को शिक्षा के अधिकार के व्यापक संवैधानिक उद्देश्य से किस हद तक जोड़ा जा सकता है। 

राज्यों में खेल बजट और सुविधाओं को लेकर सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से सुनवाई के दौरान यह भी तर्क दिया गया कि भारत में स्कूल और कॉलेज स्तर पर खेलों के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। कई संस्थानों में खेल मैदान, प्रशिक्षित कोच और आवश्यक उपकरणों की कमी बताई गई। याचिका से जुड़े तर्कों के अनुसार, बच्चों की बड़ी संख्या खेल गतिविधियों में नियमित रूप से भाग नहीं ले पाती। इसका एक कारण स्कूलों में खेलों को अकादमिक विषयों की तुलना में कम प्राथमिकता मिलना भी माना गया है।

हालांकि, भारत में विभिन्न राज्यों और केंद्र सरकार की ओर से खेलों को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग योजनाएं और कार्यक्रम चलाए जाते हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्य खेल शिक्षा लागू करने का सवाल कई प्रशासनिक और वित्तीय पहलुओं से भी जुड़ा हुआ है।

स्कूलों में रोजाना खेल के लिए समय देने का सुझाव

एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट में रोजाना करीब डेढ़ घंटे खेल गतिविधियों के लिए निर्धारित करने का सुझाव खास चर्चा में रहा है। इसके पीछे विचार यह है कि खेल को केवल वार्षिक स्पोर्ट्स डे या प्रतियोगिताओं तक सीमित रखने के बजाय रोजमर्रा की शिक्षा का हिस्सा बनाया जाए। विशेषज्ञों के अनुसार, नियमित खेल गतिविधियों से बच्चों में फिटनेस के साथ-साथ सहयोग, नेतृत्व, अनुशासन और प्रतिस्पर्धात्मक भावना विकसित हो सकती है। दूसरी ओर, इसे लागू करने के लिए स्कूलों में पर्याप्त बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षक और समय-सारिणी में बदलाव की जरूरत होगी।

सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की विस्तृत सुनवाई 22 सितंबर 2026 को करेगा। उस दौरान केंद्र सरकार, राज्यों और संबंधित शैक्षणिक संस्थाओं के पक्ष भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

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