तमिलनाडु में लेफ्ट प्रदर्शनों को रोकने के आरोप पर CPM का सरकार से सवाल

तमिलनाडु CPM सचिव पी. शनमुगम ने CM सी. जोसेफ विजय से मुख्य सचिव और गुजिलियामपरई तहसीलदार पर कार्रवाई की मांग की। आरोप है कि लेफ्ट प्रदर्शनों को रोकने की कोशिश

तमिलनाडु CPM सचिव पी. शनमुगम ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। उनका आरोप है कि छात्रों और वाम संगठनों के प्रदर्शनों को रोकने के लिए प्रशासनिक निर्देश जारी किए गए। CPM ने सर्कुलर वापस लेने की मांग की।

चेन्नई: तमिलनाडु में सत्तारूढ़ व्यवस्था को समर्थन देने वाली वामपंथी राजनीति और सरकार के बीच एक प्रशासनिक निर्देश को लेकर विवाद गहरा गया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी यानी CPM के राज्य सचिव पी. शनमुगम ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से मुख्य सचिव समेत कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। उनका आरोप है कि सरकारी तंत्र के जरिए लेफ्ट संगठनों और छात्रों के लोकतांत्रिक प्रदर्शनों में भागीदारी को सीमित करने की कोशिश की गई।

शनमुगम ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में उस फैसले को रद्द करने और कथित रूप से जारी सर्कुलर को पूरी तरह वापस लेने की मांग की है। उनके अनुसार, एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद स्कूल शिक्षा विभाग, उच्च शिक्षा विभाग, पुलिस और जिला प्रशासन को छात्रों तथा युवाओं को वामपंथी संगठनों की ओर से आयोजित प्रदर्शनों में शामिल होने से रोकने के लिए समन्वित कदम उठाने के निर्देश दिए गए थे।

सर्कुलर को लेकर क्या है विवाद?

CPM का कहना है कि उच्च शिक्षा विभाग से जुड़ा कथित सर्कुलर सरकारी कॉलेजों और अन्य संस्थानों को पुलिस तथा प्रशासन के साथ समन्वय करके छात्रों की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रखने की दिशा में था। पार्टी ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों में हस्तक्षेप बताया है।

शनमुगम का आरोप है कि अगर किसी सरकारी आदेश का उद्देश्य छात्रों को शांतिपूर्ण राजनीतिक प्रदर्शनों में शामिल होने से हतोत्साहित करना है, तो यह संविधान में मिले लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रभावित करता है। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार छात्रों और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को सीमित करने की कोशिश क्यों कर रही है।

दूसरी ओर, उपलब्ध रिपोर्टों में सरकार की ओर से इस आरोप पर विस्तृत आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है। इसलिए सर्कुलर की वास्तविक मंशा और उसके प्रशासनिक प्रभाव को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच और सरकार की स्पष्ट प्रतिक्रिया के बाद ही निकाला जा सकता है।

मुख्य सचिव पर कार्रवाई की मांग

CPM ने इस मामले में मुख्य सचिव सी. साई कुमार की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। पार्टी के मुताबिक, अगर विवादित निर्देश एक ऐसी बैठक से निकले जिसमें राज्य के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी शामिल थे, तो इसे केवल किसी निचले स्तर के अधिकारी की गलती बताकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता।

शनमुगम ने मुख्यमंत्री से मुख्य सचिव के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है और पूछा है कि सरकार का नियंत्रण अधिकारियों पर है या अधिकारी सरकार की नीतियां तय कर रहे हैं। उन्होंने यह भी मांग की कि जिस बैठक में यह फैसला लिया गया, उसकी भूमिका स्पष्ट की जाए और कथित आदेश को तत्काल रद्द किया जाए।

CPM इससे पहले भी इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन कर चुकी है। 22 अगस्त को पार्टी ने राज्यभर में विरोध कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की थी और मुख्य सचिव पर लेफ्ट छात्र संगठनों को निशाना बनाने का आरोप लगाया था।

सरकार से सिर्फ माफी नहीं, जवाबदेही की मांग

शनमुगम ने यह भी सवाल उठाया कि कथित निर्देश जारी होने के बाद केवल उस अधिकारी से स्पष्टीकरण क्यों मांगा गया जिसने सर्कुलर को आगे कॉलेजों तक पहुंचाया। CPM नेता के अनुसार, अगर मूल फैसला उच्च स्तर पर तैयार हुआ था तो उसकी जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है।

उन्होंने विधानसभा में उच्च शिक्षा मंत्री की ओर से मांगी गई या व्यक्त की गई माफी को भी पर्याप्त नहीं माना। उनका कहना है कि पार्टी का मुद्दा केवल माफी का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है।

CPM ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि विवादित आदेश किस स्तर पर तैयार हुआ, किस उद्देश्य से जारी किया गया और छात्रों को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने से रोकने के लिए प्रशासन को निर्देश देने का आधार क्या था।

गुजिलियामपरई तहसीलदार पर भी गंभीर आरोप

शनमुगम ने अपने पत्र में डिंडीगुल जिले के गुजिलियामपरई तहसीलदार के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की है। उनका आरोप है कि तहसीलदार ने ग्राम प्रशासनिक अधिकारियों यानी VAOs को तालुक में CPM और CPI से जुड़े लोगों की जानकारी जुटाने के निर्देश दिए।

CPM ने इस कदम को राजनीतिक गतिविधियों में शामिल लोगों को डराने और सरकारी अधिकारों के कथित दुरुपयोग के रूप में पेश किया है। पार्टी का कहना है कि प्रशासनिक अधिकारी को राजनीतिक संगठनों के सदस्यों से जुड़ी इस तरह की जानकारी जुटाने का निर्देश नहीं देना चाहिए।

इस मुद्दे पर जिला प्रशासन की ओर से पहले यह संकेत दिया गया था कि तहसीलदार को प्रशिक्षण पूरा होने के बाद स्थानांतरित किया जाएगा। बाद में उनके खिलाफ तमिलनाडु सरकारी कर्मचारी आचरण नियमों के नियम 17A के तहत स्पष्टीकरण मांगे जाने की जानकारी सामने आई।

CPM ने कार्रवाई को बताया अपर्याप्त

शनमुगम का कहना है कि केवल स्पष्टीकरण मांगना कथित गंभीर कदाचार के अनुपात में पर्याप्त कार्रवाई नहीं है। उन्होंने इसे प्रशासनिक गलती से ज्यादा गंभीर मामला बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

CPM नेता ने कानून मंत्री आर. निर्मलकुमार के उस कथन पर भी आपत्ति जताई, जिसमें कथित तौर पर तहसीलदार के कदम को व्यक्तिगत पसंद या सोच का नतीजा बताया गया था। शनमुगम का तर्क है कि अगर किसी अधिकारी ने अपने पद का इस्तेमाल राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े लोगों की जानकारी जुटाने के लिए किया, तो इसे व्यक्तिगत पसंद कहकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

पार्टी चाहती है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा हो और यह तय किया जाए कि किस अधिकारी ने किस आदेश के तहत कार्रवाई की।

छात्रों के अधिकार का मुद्दा केंद्र में

विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू छात्रों की राजनीतिक भागीदारी और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार से जुड़ा है। CPM का कहना है कि छात्रों को किसी राजनीतिक या लोकतांत्रिक आंदोलन में शामिल होने से रोकने के लिए पुलिस या शैक्षणिक संस्थानों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

पार्टी के अनुसार, विश्वविद्यालय और कॉलेज लोकतांत्रिक बहस तथा सामाजिक-राजनीतिक विचारों के आदान-प्रदान के महत्वपूर्ण स्थान हैं। यदि प्रशासन छात्रों की गतिविधियों पर राजनीतिक आधार पर निगरानी रखता है, तो इससे कैंपस की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है।

हालांकि, सरकार की ओर से यदि सुरक्षा, कानून-व्यवस्था या किसी विशेष परिस्थिति के आधार पर दिशा-निर्देश जारी किए गए हों, तो उनका पूरा संदर्भ भी महत्वपूर्ण होगा। यही वजह है कि सर्कुलर की मूल भाषा और आधिकारिक उद्देश्य सार्वजनिक होने पर विवाद की वास्तविक प्रकृति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

मुख्यमंत्री विजय पर बढ़ा राजनीतिक दबाव

इस पूरे विवाद ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के सामने राजनीतिक चुनौती भी खड़ी कर दी है। CPM सरकार को बाहर से समर्थन देने वाली पार्टी है और उसने अब प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका को लेकर सीधे मुख्यमंत्री से जवाब मांगा है।

वाम दलों ने मुख्यमंत्री से यह तय करने को कहा है कि उनकी सरकार लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता देगी या प्रशासनिक अधिकारियों के विवादित फैसलों का बचाव करेगी। इससे सत्तारूढ़ गठबंधन की राजनीतिक समीकरणों और सरकार के कामकाज पर भी ध्यान बढ़ गया है।

हाल के दिनों में CPM लगातार इस मुद्दे को उठा रही है। पार्टी ने चेन्नई में भी प्रदर्शन किया और मुख्य सचिव तथा संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग दोहराई।

आगे क्या हो सकता है?

अब नजर मुख्यमंत्री कार्यालय और राज्य सरकार की अगली कार्रवाई पर है। CPM चाहती है कि विवादित सर्कुलर वापस लिया जाए, उसकी उत्पत्ति की जांच हो और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।

यदि सरकार इस मामले पर विस्तृत जवाब देती है या प्रशासनिक आदेश की समीक्षा करती है, तो विवाद को शांत करने की दिशा में कदम उठ सकता है। दूसरी ओर, यदि CPM की मांगों पर संतोषजनक कार्रवाई नहीं होती, तो पार्टी ने पहले ही आंदोलन तेज करने का संकेत दिया है।

फिलहाल तमिलनाडु की राजनीति में यह मामला लोकतांत्रिक विरोध, प्रशासनिक अधिकारों और सरकार-समर्थक वाम दलों के बीच बढ़ती खींचतान के रूप में उभर रहा है। विवाद का अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य सरकार कथित सर्कुलर और अधिकारियों की भूमिका को लेकर क्या आधिकारिक रुख अपनाती है।

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