डिजिटल आफ्टरलाइफ और ग्रिफ टेक अब वास्तविकता बन रहे हैं, जिससे AI आधारित डिजिटल ट्विन या डेथबॉट मृत व्यक्ति की आवाज़, संदेश और व्यवहार को दोहरा सकते हैं। यह तकनीक भावनात्मक जुड़ाव और शोक प्रबंधन के लिए उपयोगी है, लेकिन कानूनी, नैतिक और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी गंभीर सवाल भी खड़े करती है।
Digital Twin Technology: अब AI आधारित डिजिटल ट्विन या डेथबॉट के जरिए लोग अपने गुजर चुके प्रियजनों से संवाद कर सकते हैं। भारत और अन्य देशों में यह तकनीक तेजी से विकसित हो रही है, जिससे शोक प्रबंधन और भावनात्मक जुड़ाव संभव हुआ है। हालांकि, कानूनी सुरक्षा और नैतिक दिशा-निर्देश अभी स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए यूजर्स को निजी डेटा सौंपते समय सतर्क रहना चाहिए।
डिजिटल आफ्टरलाइफ और ग्रिफ टेक का उदय
आज के दौर में तकनीक ने कल्पना को हकीकत में बदलना शुरू कर दिया है। डिजिटल ट्विन या डेथबॉट अब किसी गुजर चुके व्यक्ति की आवाज, वीडियो, मैसेज और यादों पर आधारित बनाकर उनके साथ बातचीत का अनुभव दे सकते हैं। इस तकनीक को ग्रिफ टेक कहा जाता है। उदाहरण के लिए, AI आधारित ये अवतार किसी व्यक्ति के बोलने का अंदाज, भाव और स्वभाव को दोहराते हैं, जिससे ऐसा लगता है जैसे व्यक्ति डिजिटल रूप में जिंदा है।
Tech कंपनियां इसे शोक प्रबंधन और भावनात्मक जुड़ाव के लिए विकसित कर रही हैं। परिवार अपने खोए प्रियजनों की आवाज सुन सकते हैं या उनसे संवाद कर सकते हैं। हालांकि, यह तकनीक केवल सुकून देने के बजाय नई नैतिक और कानूनी चुनौतियां भी खड़ी कर रही है।

कानूनी और नैतिक सवाल
डिजिटल ट्विन के साथ सबसे बड़ा सवाल यह है कि मृत व्यक्ति की पहचान और आवाज़ पर किसका अधिकार है। ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देशों में अभी कोई स्पष्ट कानून नहीं है कि किसी की आवाज़, व्यक्तित्व या डिजिटल पहचान उसकी संपत्ति मानी जाएगी या नहीं। यदि AI अवतार भविष्य में व्यक्ति के खिलाफ या गलत जानकारी देने लगे, तो जिम्मेदारी किसकी होगी—परिवार की, कंपनी की या डेवलपर की?
भारत में कुछ सेलिब्रिटी जैसे करण जौहर, ऐश्वर्या राय, और अरिजीत सिंह ने पर्सनैलिटी राइट्स के तहत अपनी पहचान की सुरक्षा के लिए कानूनी कदम उठाए हैं। लेकिन आम नागरिकों के लिए अभी ऐसी स्पष्ट कानूनी सुरक्षा मौजूद नहीं है।
मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक असर
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि डिजिटल अवतार से लगातार संवाद करने से शोक को कम करने की बजाय बढ़ावा मिल सकता है। व्यक्ति भावनात्मक रूप से इस तकनीक पर निर्भर हो सकता है, जिससे closure पाना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, जब यूजर अपने निजी डेटा को AI प्लेटफॉर्म पर सौंपते हैं, तो यह भी अनिश्चित है कि कंपनी बंद होने या बेच दिए जाने पर उनका डिजिटल अवतार क्या होगा।










