सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की वैधता पर सवाल उठाते हुए इसे रद्द करने पर विचार करने का संकेत दिया। अदालत ने कहा कि यह प्रथा महिलाओं की गरिमा और अधिकारों के खिलाफ हो सकती है।
New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तलाक-ए-हसन (Talaq-e-Hasan) की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह इस प्रथा को रद्द करने पर विचार कर सकती है। न्यायालय ने पूछा कि क्या महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली इस प्रथा को आधुनिक सभ्य समाज में बने रहने देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह विचार तीन जजों की पीठ के समक्ष रखा, जिसमें न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह शामिल थे। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि तीन तलाक के बाद अब तलाक-ए-हसन पर पुनर्विचार करना जरूरी हो गया है।
तलाक-ए-हसन क्या है?
तलाक-ए-हसन एक इस्लामिक प्रथा है, जिसमें पति अपनी पत्नी को तलाक देने के लिए तीन बार अलग-अलग मौकों पर 'तलाक' कहता है। इसके बाद पति और पत्नी के बीच वैवाहिक संबंध समाप्त हो जाता है। हालांकि यह प्रथा परंपरागत रूप से मानी जाती रही है, लेकिन अदालत ने इसके प्रभावों और महिलाओं पर पड़ने वाले मानसिक और सामाजिक दबावों पर सवाल उठाया है।
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी और सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तलाक-ए-हसन की वैधता को लेकर नाराजगी जताई। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या यह प्रथा सभ्य समाज में जारी रह सकती है, जबकि यह सीधे महिलाओं की गरिमा और अधिकारों पर असर डालती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पहले तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है और अब तलाक-ए-हसन को भी इसी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। न्यायालय ने संकेत दिया कि वह इस मामले को पांच जजों की संवैधानिक पीठ को भेजने पर भी विचार कर रही है।
तीन जजों की पीठ का रुख
न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि तलाक-ए-हसन पर गंभीर विचार किया जा सकता है। पीठ ने संकेत दिया कि यह प्रथा असंवैधानिक घोषित की जा सकती है।
कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि यदि यह प्रथा महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित करती है तो क्या इसे कानूनी संरक्षण देना न्यायोचित है। पीठ ने इस मुद्दे की संवैधानिक गंभीरता को ध्यान में रखते हुए इसे संविधान पीठ में भेजने की संभावना जताई।
महिलाओं की गरिमा पर प्रभाव
तलाक-ए-हसन की प्रथा महिलाओं के लिए केवल कानूनी समस्या नहीं है। इसके सामाजिक और मानसिक प्रभाव भी गंभीर हैं। अदालत ने पूछा कि क्या यह प्रथा महिलाओं की गरिमा और सम्मान को ठेस पहुंचाती है। इस प्रथा के कारण कई महिलाएं मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव और आर्थिक असुरक्षा का सामना करती हैं। कोर्ट ने इसे सभ्य समाज में अस्वीकार्य बताते हुए इसे रद्द करने पर विचार करने का संकेत दिया।
तीन तलाक और तलाक-ए-हसन का अंतर
तीन तलाक और तलाक-ए-हसन में मूल अंतर है। पहले, तीन तलाक एक ही मौके पर तीन बार 'तलाक' कहकर शादी को समाप्त किया जाता था। इसे सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में असंवैधानिक घोषित कर दिया।
तलाक-ए-हसन में यह प्रक्रिया समय के साथ तीन बार होती है, लेकिन इसका प्रभाव भी समान है। कोर्ट ने इस प्रथा को तीन तलाक के समान गंभीरता से देखा है और इसे रद्द करने की संभावना जताई है।
संविधान पीठ में भेजने पर विचार
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की वैधता पर संविधान पीठ में विचार करने का विकल्प भी रखा है। पांच जजों की संवैधानिक पीठ इस मामले की समीक्षा और निर्णय कर सकती है।











