चुनावी वर्ष में भाजपा उत्तर प्रदेश में मिशन-2027 को लेकर अपनी रणनीति को धार देने में जुट गई है। पार्टी नेतृत्व चुनावी लक्ष्य हासिल करने के लिए हर संभव रणनीति पर काम कर रहा है।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी आगामी चुनाव के लिए संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक रणनीति को भी अंतिम रूप देने में जुटी है। इसी क्रम में लखनऊ में 2 और 3 अक्टूबर को भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक प्रस्तावित है। बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता शामिल हो सकते हैं।
कार्यसमिति की बैठक को उत्तर प्रदेश में भाजपा के मिशन-2027 की तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी नेतृत्व संगठन के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ आगामी चुनाव की रणनीति पर चर्चा करेगा। इससे पहले लखनऊ में भाजपा की पिछली कार्यसमिति बैठक 14 जुलाई 2024 को आयोजित हुई थी।
विरोधी दलों के नैरेटिव का जवाब देने की तैयारी
भाजपा नेतृत्व ने प्रदेश संगठन के सामने चुनावी रणनीति की व्यापक रूपरेखा रखी है। पार्टी का जोर विपक्षी दलों की ओर से उठाए जा रहे राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों का जवाब देने तथा जमीनी स्तर पर अपना संदेश मजबूत करने पर है। राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष और प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े ने संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने, प्रभावी स्लोगन और नारों के जरिए जनता तक पहुंच बढ़ाने तथा जनसंपर्क अभियान को मजबूत करने पर जोर दिया है।
पार्टी नेताओं को रात्रि प्रवास और चौपाल जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से स्थानीय मतदाताओं से सीधे संवाद करने की रणनीति पर भी काम करने के लिए कहा गया है।
जातीय और सामाजिक समीकरण पर भी नजर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। भाजपा के सामने आगामी चुनाव में इन समीकरणों को साधने की चुनौती भी होगी। पार्टी के सामने आरक्षण, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से जुड़े मुद्दों और विभिन्न सामाजिक समूहों की राजनीतिक अपेक्षाओं जैसे विषय हैं।
ब्राह्मण और ओबीसी राजनीति से जुड़े मुद्दे भी राज्य की चुनावी चर्चा में प्रमुख बने हुए हैं। इसके अलावा संभल, रामपुर, मुरादाबाद और सहारनपुर जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में राजनीतिक ध्रुवीकरण से जुड़े मुद्दों पर भी भाजपा की रणनीति में चर्चा होने की संभावना है। अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े आरोप और अन्य स्थानीय राजनीतिक विवाद भी विपक्ष के हमलों का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में भाजपा कार्यसमिति की बैठक में इन मुद्दों पर पार्टी की राजनीतिक और संगठनात्मक लाइन तय किए जाने की संभावना है।

सहयोगी दलों के साथ सीट बंटवारा भी चुनौती
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में भाजपा के सहयोगी दल भी आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP), अपना दल (एस), राष्ट्रीय लोक दल (RLD) और निषाद पार्टी अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में संगठनात्मक गतिविधियां बढ़ा रहे हैं।
इन सहयोगी दलों की ओर से पिछड़े वर्गों के अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि आने वाले समय में सीट बंटवारे और क्षेत्रीय समीकरणों को लेकर भाजपा को अपने सहयोगियों के साथ संतुलन कायम करना होगा।
संगठन के भीतर की चुनौतियों पर भी मंथन
भाजपा के सामने केवल विपक्षी दलों की चुनौती नहीं है। पार्टी के भीतर भी संगठनात्मक स्तर पर कुछ मुद्दे चर्चा में हैं। कई जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों की ओर से अधिकारियों के खिलाफ नाराजगी सार्वजनिक रूप से सामने आती रही है। इसके अलावा क्षेत्रीय संगठन के विस्तार और पदों को लेकर भी कार्यकर्ताओं के बीच मतभेद की खबरें सामने आई हैं।
कार्यसमिति की बैठक में इन आंतरिक मुद्दों पर भी चर्चा होने की संभावना है। पार्टी नेतृत्व संगठन में बेहतर समन्वय स्थापित करने और चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने पर जोर दे सकता है।
हिंदुत्व के साथ विकास का एजेंडा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व के अपने पारंपरिक एजेंडे के साथ विकास और संगठनात्मक मुद्दों को भी प्रमुखता दे सकती है। मथुरा-वृंदावन जैसे धार्मिक केंद्रों से जुड़े मुद्दे पार्टी के राजनीतिक संदेश का हिस्सा बन सकते हैं। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के अनुसार, संगठन को जल्द ही और विस्तार दिया जाएगा। मोर्चों की क्षेत्रीय टीमों और कार्यसमिति सदस्यों की घोषणा के बाद संगठनात्मक ढांचे को पूरा करने की तैयारी है।









